Cemetery में दफनाने के लिए नहीं मिली जगह तो इन देशों ने अपनाए कौन से तरीके|

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   इंसां की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं.

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद।

शायर कैफ़ी आज़मी का ये शेर इंसान की मौत होने के बाद उसके शव के अंतिम संस्कार की मान्यताओं का जिक्र करता है। परंपराओं के मुताबिक हिंदू शव को जलाते हैं। इस्लाम और ईसाई धर्म को मानने वाले शवों को दफनाते हैं। लेकिन अब दुनियाभर में कब्रिस्तान के लिए जमीन कम पड़ रही है।

शवों को दफनाने के लिए जमीन की कमी मानव जाति के सामने परंपरा, धार्मिक मान्यता और शव संस्कार से जुड़े अहम प्रश्न खड़े करता है। इसके लिए दुनिया भर के देशों ने अलग-अलग तरीके अपनाए है।

लेकिन इसके पहले एक कहानी.....

इतिहासकार थॉमस लैकर की किताब 'शवों के साथ क्या किया जाए' जो ग्रीक विचारक डायोजिनिस से प्रेरित है।

किताब के मुताबिक

एक बार ग्रीक विचारक डायोजिनिस के शिष्यों ने उनसे पूछा

कि मरने के बाद उनके शव का वो क्या करें।

उन्होंने कहा, "मेरे शव को शहर की दीवार पर रख देना"

शिष्यों ने कहा,

"शव को चिड़िया और जानवर नोच कर खा जाएंगे."

डायोजिनिस ने कहा,

"मेरे हाथों में लाठी दे देना, मैं उन्हें भगा दूंगा."

शिष्य बोले, "पर आप तो मर चुके होंगे"

डायोजिनिस ने जवाब दिया,

"मरने के बाद मेरे शव के साथ क्या होता है उसकी मुझे चिंता क्यों होनी चाहिए?"

लेकिन डायोजिनिस के शिष्यों ने उनके शव के साथ ऐसा नहीं किया. शायद ऐसा करना उन्हें अमानवीय लगा होगा।

लेकिन सवाल ये है कि जब शरीर में आत्मा है ही नहीं तो शव का संस्कार क्यों जरूरी है?

थॉमस लैकर अपनी किताब में लिखते हैं,

"ऐसा इसलिए क्योंकि सदियों से उन्हें जो संस्कृति और मान्यताएं मिली है, ये उसको नकारने जैसा होता। मरने वाले के शव संस्कार को कई समुदायों में उसकी नश्वरता का प्रतीक माना जाता है।’

अब वही बात ...........

शवों को दफनाने के लिए सिंगापुर लंदन, न्यूयॉर्क, यरूशलम, इस्तांबुल, सिडनी जैसे दुनियाभर के कई शहरों में बढ़ती आबादी के कारण शवों को दफनाने के लिए जमीन कम पड़ रही है। तो इसके लिए शव संस्कार से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं को बिना पीछे छोड़े अलग-अलग तरीके के कब्रिस्तान बनाने का चलन बढ़ रहा है।

अभी हाल ही में ब्राजील के महान फुटबॉलर पेले का निधन हो गया था। इनके शव को शानदार होटल जैसे दिखने वाले दुनिया के सबसे ऊंचे 10 मंजिला कब्रिस्तान मेमोरियल क्यूमेकिनल सेमेट्री में दफनाया गया। ब्राजील के साओ पाउलो शहर में 40 हजार स्क्वायर मीटर में फैले इस कब्रिस्तान में रेस्त्रा, एक पूजा घर, म्यूजियम जैसी कई सुविधाएं हैं। 1991 में खुले इस कब्रिस्तान में 18 हजार लोगों के शवों को दफनाने की जगह है।

ग्रीस के एथेंस में कब्र तीन साल के लिए किराए पर मिलती है, जिसके बाद उसमें से अवशेषों को निकालकर या तो ख़त्म कर देते हैं या फिर कलश में भरकर एक ख़ास जगह पर रख दिया जाता है। वहीं एशिया का सबसे बड़ा कब्रिस्तान दिल्ली के तुगलकाबाद में है। नाम सेंट थॉमस क्रिश्चियन सेमेट्री। इसमें दो पैरलल दीवारों में कुल 150 लोगों को दफनाने की जगह है।

वहीं जापान के योकोहामा शहर में होटल आफ दी डेथ बना है। यहां कब्रिस्तान में जगह न होने पर शवों को यहीं पर रखा जाता है।

हांगकांग में वे शव जो साल 2015 से दफन हैं उनको निकालकर जला दिया गया है जमीन की कमी कारण यहां पर सीढ़ीनुमा खेतों की तरह कब्रिस्तान बनाए जाते है। 

कुछ देशों में शवों को सीधे दफनाने के बजाए उनको जला कर उसकी राख को एक कलश में लेकर एक छोटे बक्से में रख देते हैं। इसके बाद जगह मिलने पर उस कलश को दफनाया जाता है। जिससे कम जगह में ज्यादा बक्से दफन किए जा सकें।

वहीं साल 2019 में इजराइल में एक पहाड़ के अंदर एक अंडरग्राउंड सुरंग बनाई गई। इस सुरंग में बड़े-बड़े हॉल में शवों को दफनाया गया।

इतिहासकार थॉमस लैकर लिखते हैं कि

शव संस्कार के अलग-अलग तरीकों के पीछे परंपराएं और मान्यताएं हैं जो समुदाय में रहने और खुद की पहचान बनाए रखने की इंसान की कोशिश है। लेकिन वक्त के साथ चीज़ें बदल रही हैं

ऐसे में सवाल उठता है कि शहरीकरण और दफनाने के लिए कम पड़ती ज़मीन के बीच क्या शव संस्कार के तरीके बदलेंगे।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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