Emergency की सेंसरशिप, बैन की गई फिल्में और फिल्मी हस्तियों के बेबाकी वाले किस्से

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25 जून साल 1975, देश में आपातकाल, नागरिको के फंडामेंटल राइट्स को खत्म कर दिया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लग गई थी। पूर्व पीएम इंदिरा गांधी के शासनकाल में लगाई गई इमरजेंसी के समय विरोधी दलों के नेताओं के लिए जेल उनका नया घर बन गया था। आकंड़े गवाही देते हैं कि उस समयांतराल में करीब 1 लाख से ज्यादा लोग जेल गए थे। अखबारों में कौन सी खबर छपेगी, ये भी सरकार के कंट्रोल में था। जाहिर है। इसका जमकर विरोध भी हुआ था, कई नामी अखबारों ने इसके विरोध में पहले संपादकीय पृष्ठ और फिर पूरा-पूरा पन्ना तक खाली छोड़ना शुरू कर दिया था। पत्रकारों को भी जेल में डाला गया था।

ऐसे में सिनेमा इसके प्रभावों से अछूता कैसे रहता, तो सिनेमा जगत और उससे जुड़े लोगों के लिए भी नियम बनाए गए। सिनेमा जगत से जुड़े लोगों को आपातकाल के समर्थन वाले अभियानों में जुड़ने को कहा गया और जो नहीं जुड़े, उन्हें परेशान किया गया। आपातकाल के दौरान किशोर कुमार के गानों को आकाशवाणी पर बैन लगा दिया था। आईकॉनिक फिल्म शोले की जो एडिंग हम जानते हैं, वो आपातकाल की वजह से ऐसी है।

किशोर कुमार के गाने बैन क्यों हुए, शोले की एडिंग क्यों बदली गई, इसके साथ-साथ देवानंद, शत्रुघ्न सिन्हा कैसे उस समय रियल हीरो साबित हुए थे, आज हम आपको उन असलियतो से वाकिफ कराएंगे और कैसे भारत कुमार के नाम से मशहूर मनोज कुमार ने आपातकाल में मुकदमा किया और बाद में जीता भी इससे भी रुबरु कराएंगे। आपातकाल के दौर में जब जबरन सिनेमा का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किए जाने की कोशिशें हो रही थी, तब कई फेमस सितारों ने इसका विरोध किया था। जाहिर है जब देश में इमरजेंसी हो, तो भला समाज का आइना कहा जाने वाला सिनेमा इससे कैसे अछूता रहेगा।

पहले तो हम आपको इमरजेंसी के दौरान बैन हुई फिल्मों के बारे में बताते हैं। मीडिया रिपोट्स के मुताबिक अमृत नाहटा की फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ 1974 में सेंसर बोर्ड के पास पहुंची थी। इस फिल्म पर आरोप था कि इसमें इंदिरा गांधी-संजय गांधी के साथ सरकार की नीतियों पर भी तंज कसे गए। सेंसर बोर्ड ने फिल्म पर 51 कट भी लगाए थे। और कथित तौर पर तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री को आदेश देकर संजय गांधी ने फिल्म के प्रिंट सेंसर से गुडगांव स्थित अपनी मारुती फैक्ट्री पर मंगवा लिया और फिल्म के प्रिंट जलवा दिए। ये उसी दौर की शुरूआत थी जब आपातकाल लग गया था।

हालांकि जब आपातकाल के बाद तब्दीली के साथ फिल्म रिलीज हुई, तो फ्लॉप रही थी। लेकिन संजय गांधी और वीसी शुक्ला फिल्म के ओरिजनल प्रिंट जलाने के दोषी पाए गए थे। और अदालत ने उन्हें 2 साल की सजा सुनाई। मामला सुप्रीम कोर्ट मे पहुंचा और संजय गांधी की जमानत याचिका खारिज करके उन्हें एक महीने के लिए दिल्ली तिहाड़ जेल भेजा गया। इसी तरह साल 1975 में फिल्म आंधी, जिसे पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की बायोग्राफी समझा जा रहा था, उसे भी बैन कर दिया गया। और फिल्म नसबंदी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। इमरजेंसी हटने के बाद ये फिल्में रिलीज हो सकीं।

वैसे इस तरह का रवैया सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं था। एक्टर, डायरेक्टर और राइटर्स के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। लेजेंडरी सिंगर किशोर कुमार के गानों को इमरजेंसी के दौरान आकाशवाणी पर बैन कर दिया गया था। कारण था कि उन्होंने आपातकाल के फेवर में तैयार किए गए 20 प्वाइंट्स प्लान को गाने से इंकार कर दिया था। जिसके रिजल्ट में उनके गानों को आकाशवाणी पर बैन झेलना पड़ा था।

पत्रकार रंजन दास गुप्ता के एक लेख में ऐसा जिक्र मिलता है कि भारत कुमार की छवि कायम करने वाले मनोज कुमार से आपातकाल के फेवर में डॉक्यूमेंट्री बनाने का दबाव डाला गया था। जिसपर वो काफी नाराज हुए थे। सिर्फ ये ही नहीं बताया जाता है कि इस डॉक्यूमेंट्री को उनकी करीबी दोस्त रहीं अमृता प्रीतम ने लिखा था। मनोज कुमार उनपर भी काफी नाराज हुए थे। भले ही मनोज कुमार फैंस के दिलों पर राज करते हो, लेकिन उनके ऐसा करने पर उनकी फिल्म 10 नंबरी पर बैन लगा दिया गया।

लेकिन मनोज कुमार शांत नहीं रहे। उन्होंने फिल्म की रिलीज के लिए दिल्ली आकर न्यायालय में याचिका दायर की, जिसे 1977 में जीता भी। उस समय ऐसी हिम्मत दिखाने वाले वो इकलौते अभिनेता थे। वैसे आपातकाल पर डॉक्यूमेंट्री बनाने को लेकर सत्यजीत रे पर भी दबाव डाला गया, उस समय के एंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट्स ये बात बताते है, लेकिन सत्यजीत रे सिर्फ देश में ही नहीं विदेशों में भी नाम कमां चुके थे, तो उनको हैरेस करना इतना आसान नहीं था।

इसी के साथ कई प्रसिद्ध लोग रहे जिन्होंने आपातकाल का खुलकर विरोध किया। जिसमें एक्टर-डायरेक्टर उत्पल दत्त ने अपने कई बैन किए नाटकों को संचालित किया था। और इमरजेंसी के विरोध में चल रहे अभियानों को सपोर्ट किया था। इमरजेंसी ने फिल्म इंडस्ट्री को बुरी तरह प्रभावित किया था। सेंसर बोर्ड के जरिए ऐसे नियम लागू किए गए थे, जो बेहद बेतुके थे। जैसे कि फिल्म में से शराब की बोतल और खून के धब्बे की तस्वीर भी काट दिया गया था। फिल्म में टोटल एक्शन सीक्वेंस नंबर को 6 और उसकी ड्यूरेशन को 90 सेकेंड्स कर दिया। फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को सरकारी गाइडलाइन का पालन करने की सख्त हिदायत दी गई, जिसने भी ऐसा न किया। उसे दंडित किया गया।

वैसे इस सेंसरशिप से जुड़ा एक किस्सा बेहद फेमस है, जोकि अमिताभ बच्चन से जुड़ा हुआ है, क्योंकि इमरजेंसी से दौरान हुई इस सेंसरशिप का गुनाहगार उन्हें समझा जाता था। एक इंटरव्यू में जब अमिताभ बच्चन से पूछा गया कि वो मीडिया से 15 साल दूर रहे, तो इस पर वो खुद बताते हैं कि कि जब देश में आपातकाल की घोषणा हुई, तो कुछ लोगों ने सोचा, गलत सोचा कि आपातकाल में आई सेंसरशिप मेरी देन है। उन्हें लगा ये आदमी इंदिरा गांधी का करीबी है और प्रेस सेंसरशिप में शामिल है। इसलिए हमें अमिताभ बच्चन को बैन लगाने की जरुरत है। इसलिए उन्होंने मेरे बारे में लिखना, मेरी तस्वीरें छापना बंद कर दिया। जिस फिल्म की कास्ट में मेरा नाम होता, वहां भी वो कौमा लगा देते।

जिसके बाद वो कहते है कि उनका ऐसा मानना है कि अगर मीडिया उन्हें बैन कर सकती है तो वो भी मीडिया को बैन कर सकते है। हालाकिं 15 साल बाद जब उन्होंने राजनीति का रुख किया तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और वो मीडिया के सामने आए। सेंसरशिप से ही जुड़ी एक मीटिंग बॉलीवुड इंडस्ट्री से जुड़े सभी फेमस लोगों के साथ रखी गई थी, बताया जाता है कि उस मीटिंग से देवानंद नदारत रहे थे। देवानंद की बायोग्राफी में ऐसा जिक्र मिलता है कि उन्हें अपनी फिल्म देश-परदेश की शूटिंग के लिए जब लंदन जाना था, तो उन्हें परेशान और अपमानित किया गया। हालांकि इसके खिलाफ उनके भाई चेतन और विजय, जोकि खुद भी फिल्मकार थे। दोनों ने उनका साथ दिया।

इस सब में शत्रुघ्न सिन्हा और डैनी डेंगजोपा ने भी उनका साथ दिया था, जिसके चलते शत्रुघ्न सिन्हा पर किसी भी फिल्म में काम करने को लेकर प्रतिबंध लगा दिया गया था। वैसे कम ही लोग ये बात जानते हैं कि देवानंद ने आपातकाल के समर्थन में चलाए अभियानों का विरोध किया था और राष्ट्रवादी पार्टी भी बनाई थी।

अनुपम चोपड़ा अपनी किताब शोले द मेकिंग ऑफ ए क्लासिक में इस बात की जिक्र करती हैं कि फिल्म शोले की एंडिंग को भी बदला गया था। जो शोले फिल्म हम देखते है। उसमें आखिर में जय की मौत के बाद वीरु गब्बर पकड़ लेता है और ठाकुर को सौंप देता है। और ठाकुर उसे पुलिस के हवाले कर देता है। जबकि वो खुद एक सीन में कहता है कि गब्बर को वो मारेगा, तो ये एडिंग सेंसरशिप की वजह से हुई थी, जिसे डायरेक्टर रमेश सिप्पी ने अलग से शूट किया था, क्योंकि ये फिल्म इमरजेंसी के टाइम आई थी और सेंसरबोर्ड ये नहीं चाहता था कि फिल्म में दिखाया जाए कि पुलिस का पूर्व अफसर किसी अपराधी को खुद सजा दे। बोर्ड को लगा ऐसा दिखाने से फिल्म का माहौल खराब हो सकता है।

खैर 25 जून 1975 से शुरू हुआ आपातकाल 21 महीने तक चला और 21 मार्च 1977 को जाकर खत्म हुआ। सिनेमा के लेकर उस समय काफी कुछ हुआ। लेकिन इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने जो स्टैंड उस समय लिए वो आज के लोगों के लिए मिशाल है

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