सोवियत संघ की मदद से चीन बना, अब फिर रूस से क्यों हो रहा सुधार?

Home   >   खबरमंच   >   सोवियत संघ की मदद से चीन बना, अब फिर रूस से क्यों हो रहा सुधार?

23
views

व्लादिमीर पुतिन ने हाल ही में पांचवीं बार रूस के राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली थी. शपथ लेने के बाद अपने पहले विदेश दौरे के लिए चीन को चुनने का पुतिन का फैसला चर्चा में बना हुआ है. यात्रा के दौरान की तस्वीरों में दोनों देशों में जो दोस्ती नज़र आ रही है. कभी हालात इसके बिल्कुल उलट थे. दोनों के बीच तलवारें खिंची थीं. हालांकि एक दौर में रूस और चीन दोनों ही दुनिया की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट ताकतें रहीं. बीजिंग तो अब भी खुद को कम्युनिस्ट कहता है. लेकिन दोनों के तौर-तरीके काफी अलग हो चुके. दोस्ती, मतभेद, मनमुटाव, सुलह और फिर दोस्ती का सफर तय करते हुए कारवां यहां तक पहुंचा है.  


इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो पाएंगे कि 50 के दशक में सोवियत संघ और चीन के रिश्ते बेहतर थे. इन दो बड़े देशों के एक साथ होने के चलते कम्युनिस्ट पार्टी की सेना ताकतवर हो गई थी. जब साल 1949 में माओ ने रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना की. माओ जिनका पूरा नाम माओत्से तुंग था. ये वो दौर था जब सोवियत यूनियन के टॉप लीडर्स अमेरिका का मुकाबला करने और एशिया में कम्यूनिस्ट ग्रुप्स को बढ़ाने का प्लान कर रहे थे. चीन इसके लिए बिल्कुल सही पार्टनर था. लेकिन, उस वक्त माओ के सामने भी चीन को नए सिरे से डेवलप करने की चुनौती थी, क्योंकि जापानीज़ से जंग लड़ते चीन ने सालों बिता दिए थे. इसलिए चीन को भी सोवियत यूनियन की मदद की जरुरत थी.
 
माओ जो कभी चीन से बाहर नहीं निकले थे, वो आर्थिक मदद मांगने के लिए सोवियत यूनियन पहुंचे. रूस के लीडर तब जोसेफ स्टालिन थे. माओ के मॉस्को पहुंचने पर तब स्टालिन ने उनकी मेहमान नवाजी नहीं की, बल्कि एक दूर-दराज के गेस्ट हाउस में ठहरा दिया और लंबा इंतजार करवाया. ये वो दौर था जब सोवियत संघ पावरफुल था और चीन को गुलाम देश के तौर पर देखा जाता था. हफ्तेभर से कुछ ज्यादा समय बाद दोनों नेताओं की मुलाकात हुई और दोनों देशों के बीच एक करार हुआ और आखिरकार चीन को आर्थिक मदद मिल गई. करार का नाम था ‘साइनो-सोवियत ट्रीटी ऑफ़ फ्रेंडशिप, अलायंस एंड म्यूचुअल असिस्टेंस'. ये कम्युनिस्ट ‘मार्शल प्लान’ था, जिससे ड्रैगन को पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों को नाकाम करने में मदद मिली थी. मॉस्को ने चीन को जो मदद की, उससे वहां के स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप मिलना शुरू हुआ. कई टेक्निकल इक्विपमेंट्स भी उपलब्ध कराए गए. सोवियत यूनियन ने अपने देश के सैकड़ों इंजीनियर वहां भेजे ताकि चीन में इंडस्ट्रीज़ डेवलप की जा सके.

लेकिन, फिर वक्त ने करवट ली और साल 1958 के बाद दोनों देशों के बीच मतभेद की शुरुआत हुई. चीन ने अपनी ग्रेट लीप फॉर्वर्ड रणनीति पर आगे बढ़ना शुरू किया. कट्टरपंथी आर्थिक एजेंडे को मजबूत करने लगा. लेकिन सोवियत संघ में हालात बदल रहे थे. सोवियत संघ के नेता ख्रुश्चेव ताकत बढ़ाने के साथ और कट्टर स्टालिन समर्थकों को किनारे लगाने में सफल रहे. साल 1953 में जब स्टालिन का निधन हुआ, तब सत्ता की कमान निकिता ख्रुश्चेव के हाथों में आ गई. इनकी छवि सुधारवादी नेता की बनी. वो स्टालिन की साम्यवादी नीतियों के विरुद्ध समाजवाद नीति को बढ़ाना चाहते थे. लेकिन माओ इसके घोर विरोधी थे. यही नीति दोनों देशों के रिश्तों के बीच टर्निंग पॉइंट थी.

आखिरकार चीन को अहसास हुआ कि ग्रेट लीप फॉर्वर्ड नीति उसके लिए कितनी बड़ी भूल थी. वहां के इतिहासकारों के अलावा चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी ने खुद इसे गलत बताया. इसी नीति के कारण लाखों लोगों की जान गई. तेजी से औद्योगीकरण को बढ़ावा देने वाली इस नीति के कारण चीन में हजारों गौरेया का भी कल्तेआम हुआ जिसका बुरा असर खेती पर पड़ा. किसानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए. देश में अकाल पड़ गया. इस तरह चीन के अड़ियल रवैये के चलते माओ और ख्रुश्चेव के बीच नफरत बढ़ती गई. एक दिन ऐसा भी आया जब चीन और सोवियत के बीच खाई इतनी गहरी हो गई, जिसे दुनियाभर में दुश्मनी के तौर पर जाना गया. दोनों देशों ने राजनयिक सम्बंध तोड़ लिए. प्रतिद्वंद्विता बढ़ गई.
 
अलग होने के बाद चीन ने साल 1966 में सांस्कृतिक क्रांति का आगाज किया. जिसे ख्रुश्चेव के उत्तराधिकारी लियोनिद ब्रेझनेव ने “स्थिर और खतरनाक” माना. जिसके बाद दोनों देशों की सीमा पर कई झड़प शुरू हुईं. और फिर आखिर साल 1969 में सोवियत यूनियन और चीन के बीच वॉर शुरू हो गई. साल के मार्च महीने में चीन ने सोवियत यूनियन पर हमला किया. सोवियत यूनियन को बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि, चीन हमला कर देगा. उसी साल अगस्त में चीन के दूसरे कोने कहे जाने वाले शिनजियांग के साथ सीमा पर नया संघर्ष शुरू हो गया. सोवियत संघ ने सख्ती बरतनी शुरू की. बयान जारी होने लगे. चीन को लगने लगा था कि उस पर परमाणु हमला किया जा सकता है. यहां से चीन की मानसिता बदलनी शुरू हो गई.

साल 1976 में माओ की मौत के बाद नए चीन का नया उदय होने लगा. शियाओपिंग के नेतृत्व में बदलाव होने लगा. समाजवाद के विचार को बढ़ावा दिया जाने लगा. लम्बे समय तक चली अदावत के बाद दोनों देशों के रुख में पॉजिटिव चेंजेस आने लगे. जिसके चलते साल 2001 में, रूस और चीन ने अच्छे पड़ोसी होने और फैंडली कोऑपरेशन से जुड़ी एक ट्रीटी साइन की. इसके बाद चीन ने धीरे-धीरे सम्बंधों को बेहतर करने का काम किया. रूस चीन का अहम सहयोगी बन गया. पिछले 2 दशकों में चीन में एविएशन इंडस्ट्री को डेवलप करने में रूस ने काफी मदद की. मदद करने के मामले में सिर्फ रूस नही नहीं, चीन ने भी हाथ आगे बढ़ाए. कंज्यूमर गुड्स के मामले में चीन रूस का बड़ा एक्सपोर्टर है. इस तरह चीन रूस का व्यापारिक भागीदार है. अब दोनों ही देश एक-दूसरे मुल्क के नेताओं का स्वागत रेड कार्पेट पर करते हैं. मौजूदा समय में अमेरिका और यूरोपियन यूनियन को काउंटर करने के लिए रूस ने चीन से संबंधों को बेहतर किया है. चीन अमेरिका के बाद दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है. साथ ही चीन लगातार अपनी सेना विस्तार कर रहा है, जिसमें रूस काफी सहयोग कर रहा है. इसके अलावा यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगे प्रतिबंधों को दरकिनार कर चीन रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल भी खरीद रहा है. जो कि भारत के लिए भी चिंता का सबब है, क्योंकि भारत ने रणनीतिक तौर पर अमेरिका से नजदीकियां बढ़ाई हैं. इसका असर कुछ हद तक भारत के रूस  के साथ संबंधों पर भी पड़ा है. 

 

Comment

https://manchh.co/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!