Chipko Movement : जब महिलाओं ने कहा - ‘पहले हमारे शरीर को काटो’

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तारीख थी 26 मार्च और साल था 1973जब उत्तराखंड के चमोली के रैणी गांव में ढाई हजार पेड़ों की नीलामी हुई। ठेकेदार के आदेश पर जब मजदूर वहां पेड़ काटने पहुंचे तो उन्होंने देखा की गांव की महिलाएं पेड़ों से चिपकी थीं। ताकि अगर ये पेड़ काटे जाए तो मशीन पहले उन्हें काटे। इस तरह से एक आंदोलन की शुरुआत हुई और जिसकी गूंज ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भी नींद उड़ा दी।

हिंदी शब्द 'चिपको' जिसका मतलब 'चिपके रहनेया 'गले लगाना'। पेड़ों पर कुल्हाड़ी न चले इसके लिए महिलाएं पेड़ से चिपक जाया करतीं थी। पेड़ काटने वालों को ये संदेश देना कि पेड़ों को काटने से पहले हमारे शरीर को काटना होगा

साल 1970 में अलकनंदा नदी की भीषण बाढ़ ने जोशीमठ के रैणी गांव के पास पेंग मुरेंडा जंगल को बुरी तरह से तहस नहस कर दिया। चार साल बाद साल 1974 को वन विभाग ने ऋषिकेश के एक ठेकेदार ठेका दिया गया 4.70 लाख रुपये का।

इसके ऐवज 2500 हजार पेड़ों को काटना था। जो बाढ़ से तहस नहस हुए 680 हेक्टेयर से ज्यादा मुरेंडा जंगल में लगे थे।

पेड़ कटने की जानकारी पर पास के रैणी गांव की महिलाओं ने महिला मंडल की प्रधान गौरा देवी के साथ इस कटाई का विरोध किया। 26 मार्च 1974 को ठेकेदार के मजदूर जब पेड़ काटने के लिए वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि महिलाएं पेड़ों को गले लगाईं खड़ीं थी। फिर मजदूरों को वहां से लौटना पड़ा। चिपको आंदोलन की इस महत्वपूर्ण घटना से पहले इसकी चिंगारी साल 1973 को उत्तराखंड के चमोली जिले में लग चुकी थी। कई ग्रामीणों ने इलाहाबाद की एक कंपनी को 14 ऐश के पेड़ काटने से रोका था। चमोली जगह पहले उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा था। साल 2000 में यूपी से अलग होकर उत्तराखंड एक अलग राज्य बना था।

26 मार्च 1974 का दिन चिपको आंदोलन के लिए इसलिए महत्वपूर्ण थाक्योंकि इसमें पहली बार महिलाओं ने पुरुषों के बिना ही मोर्चा संभाला।

गौरा देवी से साथ पहुंची महिलाएं मजदूरों के पहले पेड़ों तक पहुंच गईं और उनसे लिपट गईं जिससे मजदूरों को वापस हो जाना पड़ा।

चमोली जिले से शुरू हुआ चिपको आंदोलन धीरे-धीरे पूरे उत्तराखंड और फिर यूपी में फैल गया। पहाड़ पर लोग पेड़ों को बचाने के लिए पेड़ों से लिपट रहे थे। इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा तो थी ही साथ में इनवायरमेंटलिस्ट सुंदरलाल बहुगुणागौरा देवी और चंडी प्रसाद भट्ट भी मुख्य भूमिका निभा रहे थे। इसके बाद पर्यावरण को बचाने का लंबा संघर्ष का दौर शुरू हुआ। सुंदरलाल बहुगुणागौरा देवी और चंडी प्रसाद भट्ट को कई बार जेल भी जाना पड़ा। धीरे-धीरे ये आंदोलन हिमाचल प्रदेशकर्नाटकराजस्थानबिहार के साथ पूरे देश में फैला। इस आंदोलन के तहत पर्यावरण को बचाने के लिए आवाज उठने लगी और इस गूंज ने तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की भी नींद उड़ा दी।

बाद में आंदोलन को तब बड़ी जीत मिली जब साल 1980 में इंदिरा गांधी ने हिमालय के वनों में पेड़ों की कटाई पर 15 सालों का बैन लगा दिया।

साल 1925 में पैदा हुई गौरा देवी जो इस आंदोलन में महिलाओं का जा प्रमुख चेहरा थीं। जिनको चिपको वुमन भी कहा गया। 12 साल की उम्र में रैणी के मेहरबान सिंह से शादी हुई 10 साल बाद पति का निधन हो गया। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी उठाने के साथ समाज को पर्यावरण को बचाने का संदेश दिया।  

आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सुंदरलाल बहुगुणा चिपको आंदोलन के बाद दुनिया भर में वृक्षमित्र के नाम से फेमस हुए। आंदोलन के बाद उन्हें अमेरिका की फ्रेंड ऑफ नेचर संस्था ने साल 1980 में सम्मानित किया। इसके अलावा भी पर्यावरण रक्षा के लिए उन्हें कई अवार्ड मिल चुके हैं।

पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने और जीवन के लिए पेड़ बहुत बनाए जरूरी है इसलिए पेड़ों को कटने थे और हो सके तो पौधों को लगाएं भी।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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