Cyril Radcliffe : जिनसे किए थे भारत के दो टुकड़े, वो कभी दोबारा लौटकर नहीं आया

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30 मार्च की तारीख इतिहास में ऐसे शख्स के जन्मदिन के नाम पर दर्ज है जिसने दुनिया के सबसे बड़े और विवादास्पद बंटवारे की लकीर खींची। ये शख्स इसके पहले कभी भारत नहीं आए थे। इनको भारत की संस्कृतिउसकी पृष्ठभूमि और लोगों के बारे में कुछ भी नहीं पता था। यहां तक की ये भी जानकारी नहीं थी कि पंजाब कहां है और बंगाल कहां है। बस अंग्रेजों ने भारत को बांटने का जिम्मा सौंप दिया। आज कहानी सिरिल रेडक्लिफ की, जिनकी एक लकीर खींचने के बाद आज तक का सबसे बड़ा विस्थापन हुआ।

17 अगस्त साल 1947 यानी पाकिस्तान की आजादी के तीन और भारत की आजादी के दो दिनों के बाद जब भारत-पाकिस्तान के बीच खींची गई सीमा रेखा रेडक्लिफ लाइन का औपचारिक तौर पर ऐलान कर दिया गया। भारत के दो टुकड़े कर दिए गए। दुनिया के नक्शे में पाकिस्तान का वजूद आ गया। लाखों लोग पैदल और बैलगाड़ियों के सहारे अपने पुरखों की जमीन छोड़कर पलायन को मजबूर हो गए। रेलगाड़ियों की छतों पर भी पैर रखने की जगह नहीं थी।

सांप्रदायिक दंगों में कितने लोग मर गए कितने घर तबाह हो गए इसका आज भी कोई हिसाब नहीं है।

इस लकीर को खींचने वाले व्यक्ति सिरिल रेडक्लिफ थे। 30 मार्च साल 1899 को जन्मे सिरिल रेडक्लिफ ब्रिटेन के वेल्स में रहते थे और ऑक्सफोर्ड से पढ़ाई करने के बाद एक फेमस एडवोकेट बने। इन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं। वे सार्वजनिक तौर पर अच्छे भाषण देने के लिए भी जाने जाते हैं।

18 जुलाई साल 1947 यानी अभी आजादी मिलने में  28 दिनों का वक्त था तब इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट पास हुआ। इसके बाद आनन-फानन ब्रिटेन से बुलाए गए सिरिल रेडक्लिफ और उनसे कहा गया कि भारत के दो टुकड़े करने हैं। रेडक्लिफ इससे पहले न कभी भारत आए थे और न ही उन्हें यहां की भौगोलिक स्थिती और संस्कृति की समझ थी। बस भारत को बांटने का जिम्मा सौंप दिया गया। उनकी ये ड्यूटी थी कि वे भारत और पाकिस्तान के बीच इस तरह से सीमा रेखा खींचें कि भारत के हिस्से में अधिकांश सिख और हिंदू आएं। और पाकिस्तान के हिस्से में ज्यादातर मुस्लिम इलाके। इतना बड़ा काम करने लिए रेडक्लिफ के पास बहुत कम वक्त था। नौ अगस्त साल 1947 जब रेडक्लिफ ने अपना काम निपटाकर ये नक्शे सौंप दिए।

बीबीसी खबर के मुताबिक मशहूर पत्रकार और लेखक कुलदीप नैय्यर ने में लंदन में जाकर सिरिल रेडक्लिफ से बातचीत कि थी

मुझे 10-11 दिन ही मिले थे सीमा रेखा खींचने के लिए। उस वक्त मैंने बस एक बार हवाई जहाज से दौरा किया था। जिलों के नक्शे तक नहीं थे मेरे पास।

उन्होंने कहा था कि, दो-तीन साल का समय मिल जाता, तो मैं अपना काम और बेहतर से कर पाता।

जब रेडक्लिफ को पता चला कि उनके काम से दोनों ही पक्ष खुश नहीं हैंबंटवारे से लाखों लोगों की जान गई है। तब रेडक्लिफ ने बंटवारे के काम के लिए मिली फीस नहीं ली। उन्हें अफसोस था वे एक संवेदनशील व्यक्ति थे। उन्होंने वो सब दस्तावेज और नक्शे जला दिए जो बंटवारे के गवाह थे ।

ऐसा माना जाता है कि रेडक्लिफ शालीन और बिना पक्षपात करने वाले व्यक्ति थे। लेकिन वो अपने काम को ठीक तरह से अंजाम दे नहीं पाए।

भारत की आजादी के बाद रेडक्लिफ को ब्रिटेन में कई तरह की वैधानिक जिम्मेदारियां दी गईं। वे कई जगह के ट्रस्टीगवर्नरचेयरमैन बने। बंटवारे जैसी त्रासदी से दुखी रेडक्लिफ कभी दोबारा भारत या पाकिस्तान नहीं गए।

एक अप्रैल साल 1977 को 78 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया से अलविदा कह दिया।

पाकिस्तान और भारत कई जंग लड़ चुके हैं। इन लड़ाइयों में दोनों तरफ के लाखों लोग मारे गए। जो दो पीढ़ी पहले तक एक साथ रहते थे। 75 साल पहले हुए बंटवारे का खामियाजा आज की पीढ़ियां भी झेल रही हैं।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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