Dhirubhai Ambani : 'बड़े सपने ही पूरे हुआ करते हैं'

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ये वो दौर थाजब किसी नुक्कड़ या चौराहे में एक कप चाय सिर्फ 25 पैसे में मिल जाती थी। लेकिनएक शख्स जिसके पास ज्यादा पैसे नहीं नहीं थे फिर भी वो चार गुना ज्यादा दाम देकर एक कप चाय पीने शहर के बड़े होटल में जाता। उनसे इसकी वजह पूछी गई। तो बताया - ‘ताकि मैं बिजनेस की बारीकियों को समझ सकूं।’

ये शख्स होटल में आने वाले बड़े-बड़े व्यापारियों के बीच होने वाली बातों को बड़े गौर से सुनता। 

उनका जुनून ही था कि, पकोड़े बेचेपेट्रोल पंप में नौकरी की। फिर एकदिन सबकुछ छोड़कर कर वो किया जो वो करना चाहते थे - बिजनेस।

आज कहानी हजारों करोड़ों का साम्राज्य खड़ा करने वाले धीरूभाई अंबानी की।

गुजरात के जूनागढ़ के एक छोट से गांव चोरवाड़ में हीरालाल अंबानी अपनी पत्नी जमनाबेन के साथ रहते थे। हीरालाल पेशे से शिक्षक थे। इनके चार बच्चे हुए। इनमें से एक थे 28 दिसंबरसाल 1932 को जन्में धीरजलाल हीरालाल अंबानी। जिन्हें धीरूभाई अंबानी कहा जाता। फैमली बेहद सामान्य थी। अर्थिक संकट के बीच 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। पिता और घर में पैसे की मदद हो सकेइसके लिए फल और सब्जी का ठेला लगाया पर बिक्री नहीं होती। इसके बाद पकोड़े बेचने लगे। पर किस्तमये भी काम नहीं चला। इन दो असफलताओं के बाद धीरूभाई के पिता ने उन्हें नौकरी करने की सलाह दी।

धीरूभाई के बड़े भाई रमणीकभाई अंबानी यमन में नौकरी करते थे। तो साल 1949 में वो 17 साल की उम्र में यमन चले गए। पहला काम पेट्रोल पंप पर मिला। अपनी काबिलियत के दम पर दो ही साल में एक कंपनी में मैनेजर बन गए। लेकिनउनका नौकरी में मन नहीं लगता। उनको बिजनेस करना था। वो हमेशा यही सोचते, किसी तरह से बिजनेस मैन बन सकूं। इसलिए साल 1956 में वो भारत लौट आए। ऐसा कहा जाता है कि तब उनकी जेब में सिर्फ 1000 रुपये थे। भारत आने के बाद वो मुंबई गए। कई इलाकों में घूमे। उन्हें समझ आया कि वो पॉलिएस्टर और मसालों का बिजनेस कर सकते हैं। 1958 के आसापास अपने चचेरे भाई चंपकलाल दमानी के साथ दो कमरों का ऑफिस खोला और रिलायंस कॉर्पोरेशन फर्म बनाकर भारत के मसाले विदेश में और विदेश का पॉलिएस्टर भारत में बेचते। लक्ष्य मुनाफे पर नहीं प्रोडक्ट की क्वालिटी पर होता।

साल 1955 में धीरूभाई के जीवन में कोकिला आईं। एक इंटरव्यू में कोकिलाबेन ने बताया था कि 'धीरूभाई का प्यार करने का अंदाज बिलकुल अलग था। वो अच्छे बिजनेसमैन के साथ एक अच्छे पति भी थे।'

उन्होंने बताया था कि, ‘एक बार मैं गांव (चोरवाड़) से यमन के लिए निकली। वहां पहुंचने से पहले उनका (धीरूभाई) फोन आया। मुझे कहा किकोकिलामैंने तुम्हारे लिए एक गाड़ी ली है। मैं तुम्हें लेने आ रहा हूं। बताओ गाड़ी का रंग क्या होगाफिर थोड़ी देर में कहामैं बता दूं - इट इज़ ब्लैकलाइक मी।’

धीरूभाई की फैमली गुजरात से शिफ्ट होकर मुंबई के एक छोटे से अपार्टमेंट में रहती। उनके चार बच्चे हुए। दो बेटे - मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी और दो बेटियां नीना कोठारी और दीप्ति सल्गाओकर।

अपनी धुन के पक्के धीरूभाई ने साल 1965 में सूत के व्यापार में हाथ डाला। जिसमें नुकसान की ज्यादा आशंका थी। पर जोखिम उठाया और जल्द ही वो बॉम्बे सूत व्यापारी संगठन के संचालक बन गए। 

साल 1966 में अहमदाबाद के नैरोड़ा में कपड़ा मिल की नींव रखी। ‘विमल’ ब्रांड की शुरुआत की जो की उनके बड़े भाई रमणिकभाई अंबानी के बेटेविमल अंबानी के नाम पर थी। ये ब्रांड भारत के घरों तक पहुंचा। 

इसके बाद धीरूभाई सफलता की सीढ़ी चढ़ते गए। इंडिया में इक्विटी कल्ट को शूरू करने का श्रेय इन्हीं को ही जाता है। साल 1977 में रिलायंस ने आईपीओ जारी किया तब 58,000 से ज्यादा इन्वेस्टर ने पैसे लगाए। धीरुभाई ये यकीन दिलाने में सफल रहे की उनकी कंपनी के शेयर खरीदने से सिर्फ फायदा मिलेगा।

अपने इप्लाइंज के साथ-साथ दोनों बेटों का भी साथ मिला। और नए मौकों का पूरा फायदा उठाकर ‘रिलायन्स’ सफल तरीके से आगे बढ़ी

साल 2002 से पहले फोन से बात करने के लिए कहीं ज्यादा पैसे देने पड़ते थे। पर 600 रुपये में सिम और 15 पैसे प्रति मिनट बात करने की सुविधा दी।

साल 19961998 और 2000 में ‘पॉवर 50 – मोस्ट पावरफुल पीपल इन एशिया’ की 50 लोगों की इंडेक्स में शामिल हुए।

धीरुभाई को दूसरा हार्टअटैक पड़ा तो अस्पताल में भर्ती कराया गया। इससे पहले भी साल 1986 में हार्टअटैक पड़ चुका था। जिससे दाएं हांथ में लकवा मार गया था। 6 जुलाईसाल 2002 को धीरुभाई ने दुनिया से अलविदा कह दिया।

पत्नी कोकिलाबेन ने एक बार बताया था कि ‘उन्होंने (धीरूभाई) बहुत ऊंचा मुकाम हासिल किया। पर कभी भी घंमड नहीं किया। वो शानदार टीम लीडर थे। उनके केबिन में कोई भी आ सकता था। अपनी समस्या बता सकता था।’

धीरुभाई ने जो कंपनी कुछ पैसे से खड़ी की थी आज उसमें लाखों लोग काम कर रहे हैं। अमीर लोगों की इंडेक्स में धीरूभाई के बेटे मुकेश अंबानी एशिया के पहले और दूनिया में 9वें नंबर पर आते हैं।

निधन के 14 साल बाद साल 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित धीरूभाई आंबानी का कहना था कि ‘बड़े सपने देखिएक्योंकि बड़े सपने देखने वालों के सपने ही पूरे हुआ करते हैं।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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