MP की ऐसी चुनावी माया, जिसने दिग्गजों को भी हार का स्वाद चखाया

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मध्य प्रदेश में आने वाले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जिसमें कई सियासी दिग्गजों की किस्मत दांव पर लगी होगी। मध्य प्रदेश के चुनाव ऐतिहासिक तौर पर बड़े-बड़े दिग्गजों के हारने के भी गवाह रहे हैं। इसी मध्य प्रदेश में कभी मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह हारे थे तो कांग्रेस के सीएम पद के चेहरे कमलनाथ को भी एक बार हार का मुंह देखना पड़ा था और तो और राजमाता विजयाराज सिंधिया ने भी एक बार इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ीं, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। पिछले लोकसभा चुनाव में सिंधिया घराने के ज्ज्योतिरादित्य सिंधिया इस परिवार की अजेय मानी जाने वाली गुना सीट से हार गए। ऐसे में हम आपको बताएंगे कुछ सबसे बड़े उथल-पुथल के बारे में, जिसमें दिग्गजों को भी हार का सामना करना पड़ा था। आइए जानते हैं, इनसे जुड़ी कुछ रोचक बातें।

1996 में यहां से मध्यप्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री चुनाव मैदान में थे। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह अपनी पार्टी से लड़ रहे थे तो बीजेपी ने अपने पूर्व मुख्यमंत्री वीरेन्द्र कुमार सकलेचा को चुनाव मैदान में उतारा था। दोनों एक दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में थे। दलित आंदोलन के चलते इस वक्त विंध्य क्षेत्र में बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा भी अपना वर्चस्व बढ़ाती जा रही थी। यहां से बसपा ने सुखलाल कुशवाहा को मैदान में उतार दिया। जातीय समीकरण और त्रिकोणीय मुकाबले की वजह से जब सतना लोकसभा सीट का रिजल्ट आया तो मध्य प्रदेश की सियासत में भूचाल मच गया। दोनों पूर्व मुख्यमंत्री चुनाव हार गए और जीत बसपा उम्मीदवार सुखलाल कुशवाहा के खाते में आई। इस चुनाव में बीजेपी के वीरेन्द्र सकलेचा दूसरे नंबर पर थे, तो अर्जुन सिंह तीसरे नंबर पर थे। ये अर्जुन सिंह के लंबे राजनीतिक करियर की दूसरी हार थी। हालांकि, इसके बाद अर्जुन सिंह की पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया और 1998 का लोकसभा चुनाव उन्होंने मध्य प्रदेश की होशंगाबाद सीट से लड़ा, लेकिन यहां भी अर्जुन सिंह का दुर्भाग्य साथ रहा। वो बीजेपी के उम्मीदवार सरताज सिंह से चुनाव हार गए। इसके बाद 1999 में पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा यहां से चुनाव लड़ने आए। वो जीत गए, लेकिन अगली बार उनकी जगह फिर सरताज सांसद बन गए।

कमलनाथ का दांव हुआ फेल

मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा सीट कमलनाथ का गढ़ है, यहां बीजेपी का हर दांव फेल हो जाता है। वो 9 बार इसी क्षेत्र से लोकसभा में जीत दर्ज कर चुके, लेकिन एक बार उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा था। दरअसल, 1997 में छिंदवाड़ा लोकसभा का उपचुनाव सनसनी भरा रहा। चार बार के सांसद कमलनाथ को साल 1996 में हवाला कांड में नाम आने के बाद कांग्रेस ने छिंदवाड़ा से टिकट नहीं दिया। कमलनाथ ने अपनी पत्नी अलका नाथ को टिकट दिलाया और अलका नाथ भारी मतों से चुनाव जीत गईं। 

 सुंदरलाल पटवा ने मारी थी बाजी

कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब कमलनाथ को दिल्ली में सांसद रहने के चलते लुटियंस जोन में मिला बड़ा बंगला खाली करने का नोटिस मिल गया। ऐसा कहा जाता कमलनाथ ये बगंला खाली नहीं करना चाहते थे वो चाहते थे कि ये बंगला अलका नाथ को मिल जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस बंगले की खातिर उन्होंने अपनी पत्नी से संसद की सदस्यता से इस्तीफा दिलवा दिया और खुद छिंदवाड़ा से उपचुनाव में प्रत्याशी बन गए। तब तक वो हवाला कांड के दाग से बरी भी हो चुके थे। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। सरकार होने के फायदा भी उन्हें मिलने की पूरी उम्मीद थी। इसी बीच भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा दांव चलते हुए अपने मध्य प्रदेश के सबसे बड़े नेता सुंदरलाल पटवा को कमलनाथ के खिलाफ चुनाव मैदान में उतार दिया। नतीजा ये हुआ कि 73 साल के पटवा ने कमल नाथ को 38 हजार से ज्यादा वोटों से हरा दिया और विधानसभा में लगातार उपस्थिति दर्ज कराने वाले और दो बार के मुख्यमंत्री पटवा पहली बार संसद की सीढ़ियां चढ़े। हालांकि, एक साल बाद 1998 के चुनाव में कमलनाथ ने उन्हें डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों से हराकर बदला ले लिया। लेकिन अगले ही साल पटवा होशंगाबाद से जीतकर फिर लोकसभा पहुंच गए।

राजनीति के रण में अजेय योद्धा भी हारे 

शिवराज सिंह चौहान वैसे तो राजनीति के रण में अजेय योद्धा रहे हैं, लेकिन वो एक बार दिग्विजय सिंह से चुनाव हार गए। तब वो स्टेट की राजनीति में ज्यादा चर्चित नहीं थे। दिग्विजय उस समय मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में दो पारी खेल चुके थे। 2003 के विधानसभा चुनाव में दिग्विजय के शासन को उखाड़ फेंकने का जिम्मा तो बीजेपी ने उमा भारती को दिया था, लेकिन दिग्विजय को उनके ही गढ़ राघौगढ़ सीट में चुनौती देने के लिए शिवराज सिंह को उतारा था। शिवराज सिंह इस चुनाव में 21,164 वोटों से हार गए थे।

जब माधवराव सिंधिया ने अटल बिहारी को हराया

मध्यप्रदेश की सियासत में पूर्व केन्द्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया उन नेताओं में से एक हैं। 1984 के लोकसभा चुनाव में ग्वालियर संसदीय सीट से कांग्रेस ने माधवराव सिंधिया को उम्मीदवार बनाया था और बीजेपी के कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी ग्वालियर सीट से ही चुनाव लड़े और फिर जब रिजल्ट आया तो अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव हार गए थे। माधवराव सिंधिया ने उन्हें करीब पौने दो लाख वोटों से हराया था। इतना ही नहीं सिंधिया वंश की पारंपरिक सीट रही गुना में करीब 3 दशक बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में सिंधिया पैलेस के बाहर का कोई प्रत्याशी जीता। ज्योतिरादित्य सिंधिया को बीजेपी के केपी यादव ने हरा दिया, जो कभी ज्योतिरादित्य के सांसद प्रतिनिधि भी रहे हैं। कृष्णपाल सिंह उर्फ केपी यादव ने ज्योतिरादित्य को 1 लाख 25 हजार 549 वोटों से हराया। हालांकि 2020 में उन्होंने पाला बदलकर बीजेपी जॉइन कर ली।

इंदिरा गांधी ने विजयाराजे सिंधिया को हराया

1980 में रायबरेली में इंदिरा गांधी के सामने मध्य प्रदेश की राजमाता विजयाराजे सिंधिया को चुनाव लड़वाया गया था। तब वो करीब पौने दो लाख वोटों से हार गयी थीं। 

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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