Director Raj Khosla : कई सुपरहिट फिल्में बनाकर कहलाए 'ट्रेंडसेटर डायरेक्टर'

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अपने दौर के ग्रेट एक्टर और डायरेक्टर गुरुदत्त एक फिल्म बनाना चाहते थे। ये उनकी ड्रीम प्रोजेक्ट थी। फिल्म का नाम रखा गया - राज। एक्टर फाइनल हुए - सुनील दत्त और वहीदा रहमान। पहले इस फिल्म से सुनील दत्त अलग हुए। तो गुरुदत्त ने खुद ही बतौर हीरो बनने की सोची। लोकेशन फाइनल हुई शिमला। लेकिन गुरु दत्त को लगा कि जिस तरह की वो फिल्म बनाना चाह रहे हैं। वो फिल्म वैसी बन नहीं रही है। आखिर फिल्म बंद हो गई। कुछ साल बीते।

एक डायरेक्टर ने गुरु दत्त से उसी फिल्म की स्क्रिप्ट मांग ली। कहा 'इस कहानी पर मैं फिल्म बनाना चाहता हूं'। गुरुदत्त ने दे भी दी। स्क्रिप्ट में समय के हिसाब फेरबदल किया।

अब हीरो मनोज कुमार थे और हीरोइन साधना। फिल्म बनी और अपने वक्त की सबसे बड़ी हिट साबित हुई। फिल्म थी, साल 1964 में रिलीज हुई ‘वो कौन थी’। और वो डायरेक्टर थे, राज खोसला। वो डायरेक्टर जिसको अपने दौर का ट्रेंडसेटर माना जाता था। जिसकी फिल्मों में महिला किरदारों की अहम भूमिका होती थी। इनकी फिल्मों में गानों की अलग अहमियत भी होती थी। फिल्मों से प्यार करने वाला ये डायरेक्टर फिर भी न जाने को क्यों फिल्म इंडस्ट्री से नफरत करता था।  

31 मई, साल 1925 को लुधियाना, पंजाब में जन्मे राज खोसला को बचपन से ही फिल्मों की तरफ रुझान था। सिंगर बनना चाहते थे तो संगीत की शिक्षा ली। 19 साल की उम्र में रेडियो में गाना भी गाने लगे। सपनों में रंग भरने के लिए पंख फैलाए तो रास्ता मुंबई की तरफ ले गया। मुंबई पहुंचे तो सबसे पहले रंजीत स्टूडियो गए। यहां पर वॉइस टेस्ट दिया। जिसमें पास भी हो गए। लेकिन रंजीत स्टूडियो के मालिक सरदार चंदू लाल ने उन्हें गाने का मौका नहीं दिया। इसके पीछे कारण था कि रंजीत स्टूडियो उस समय पैसों तंगी से जूझ रहा था। उसे ऐसे सिंगर की तलाश थी जिसका नाम हो। तो ये मौका राज को नहीं अपने दौर के दिग्गज सिंगर मुकेश को मिला। इसके बाद राज के संघर्ष का दौर शुरू हुआ।

तभी इनकी मुलाकात एक्टर देवानंद से हुई। दरअसल, देवानंद और राज खोसला पंजाब से ही थे। ऐसे में देवानंद ने राज खोसला की मदद की। और उनकी मुलाकात गुरुदत्त से करवाई। उस दौरान गुरुदत्त देवानंद को बतौर हीरो लेकर साल 1951 में रिलीज हुई फिल्म 'बाजी' बना रहे थे। राज खोसला गुरुदत्त के असिस्टेंट बन गए और अपने बॉलीवुड के सफर की शुरुआत की।तीन साल गुरुदत्त के साथ काम करने के बाद राज खोसला ने देवानंद और गीता बाली को लेकर साल 1954 में रिलीज हुई फिल्म 'मिलाप' डायरेक्ट की। ये फिल्म हिट रही तो देवानंद ने इनके साथ एक और फिल्म की। जिसका नाम था साल 1956 में रिलीज हुई 'सीआईडी'। राज खोसला के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म ने सिल्वर जुबली मनाई तो गुरुदत्त ने खुश होकर भेंट स्वरूप एक कार राज खोसला को गिफ्ट की।

साल 1969 में रिलीज हुई फिल्म 'दो रास्ते' में एक गाना था 'छुप गये सारे नजारे...' इस गाने पर भीगते - नाचते राजेश खन्ना और मुमताज के सीन को आज भी बॉलीवुड के सबसे आइकॉनिक सीन में रखा जाता है। जो राज खोसला की ही कल्पना थी।

खुद एक सिंगर बनना चाहते थे इस वजह से राज खोसला की फिल्मों में म्यूजिक भी उम्दा होता था।

चाहे फिल्म 'वो कौन थी' का 'लग जा गले..' हो या फिर अपने समय से आगे की बनी फिल्म साल 1966 की 'मेरा सायाके गाने 'तू जहां-जहां चलेगा...' और 'झुमका गिरा रे...' हो।

साल 1966 में रिलीज हुई फिल्म 'दो बदन' का गाना 'लो आ गई उनकी याद ...' हो या फिर साल 1971 में रिलीज हुई फिल्म 'मेरा गांव मेरा देश' का गाना 'मार दिया जाए...' हो। 'बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा ....' साल 1980 में रिलीज हुई फिल्म 'दोस्ताना' का ये गाना आज भी दोस्ती का एंथम है। ये सभी गाने आज भी सुपर हिट हैं। इसके पीछे डायरेक्टर राज खोसला का ही कमाल था।

राज खोसला को अपनी फिल्मों में महिला किरदारों के दमदार किरदारों के लिए हमेशा याद किया जाता है। इसलिए इन्हें हीरोइन का डायरेक्टर भी कहा जाता था। करियर में करीब 27 फिल्मों का डायरेक्शन किया। और अपने नाम राज की तरह ही चार दशकों तक इंडस्ट्री पर राज किया। राज खोसला एक राइटर भी थे। कई फिल्मों की कहानी लिखी। साल 1972 की फिल्म 'दो चोर' को प्रोड्यूस भी किया।

राज खोसला के कद को इससे भी समझा जा सकता है कि डायरेक्टर महेश भट्ट उनको अपना गुरु मानते हैं। महेश भट्ट ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें पहली बार काम राज खोसला ने ही दिया था। फिर बाद में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर उन्होंने अपना काम शुरू किया।

80 का दशक खतम होते-होते फिल्मों का दौर बदल चुका था। इस बदलाव के कारण राज खोसला की लगातार तीन फिल्में फ्लॉप हो गईं। जिसके बाद वो टूट से गए।

साल 1989 में उन्होंने फिल्म नकाब बनाई जिसके बाद उनका इंडस्ट्री से मोहभंग हो गया। गम को भुलाने के लिए शराब को सहारा बनाया। और शराब की वजह से दिनों दिन उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। 9 जून, साल 1991 में 66 साल की उम्र में एक दमदार डायरेक्टर ने दुनिया को अलविदा कह दिया। 

राज खोसला के बारे में कहा जाता है कि उन्हें 'फिल्मों से तो प्यार था, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री से लगाव नहीं था।'

इस बारे में महेश भट्ट ने एक इंटरव्यू में बताया था कि 'राज खोसला कहते थे कि, मुझे फिल्म मेकिंग से प्यार है, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री से नफरत है। ये हारा हुआ खेल है, जिसमें जीत किसी की नहीं होती'

बेटी सुनीता खोसला भल्ला ने पिता के नाम "द राज खोसला फाउंडेशन" की स्थापना की।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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