Freedom Fighter Durgavati Devi : क्रांतिकारियों की भाभी ने अंग्रेजों को चटाई थी धूल

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महान क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की पत्नी दुर्गावती देवी उर्फ दुर्गा भाभी जो क्रांतिकारियों की मदद करतीं और उनके लिए योजनाएं बनातीं। कई आंदोलन किए। पति देश के लिए शहीद हो गए तो उन्होंने करीब 70 साल का जीवन अकेले गुजारा।

अक्टूबर 1930, गवर्नर हाउस, लैमिंगटन रोड, मुंबई

गवर्नर हाउस में अंग्रेजी फौज का सख्त पहरा था। तभी एक तेज रफ्तार कार में कुछ लोग गेट के सामने आकर गोलियां चलाने लगते हैं। उनका इरादा भगत सिंह की फांसी रुकवाने के लिए पुलिस कमिश्नर लार्ड हैली की हत्या करने का था। इस हमले में लार्ड हैली तो बच गए, लेकिन पुलिस अफसर सार्जेंट टेलर और उनकी पत्नी मारे गए। अंग्रेजों को पता चला कि हमले में एक महिला भी शामिल है, क्योंकि जल्दबाजी में उनकी साड़ी का एक टुकड़ा फटकर वहीं रह गया था। तब ब्रिटिश मीडिया में लिखा गया, ये पहली महिला उग्रवादी का अटैक था।’

ये महिला लाहौर की रहने वालीं महान क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की पत्नी दुर्गावती देवी उर्फ दुर्गा भाभी थीं। वो दुर्गा भाभी जो क्रांतिकारियों की मदद करतीं और उनके लिए योजनाएं बनातीं।

जासूस बनकर सूचनाओं का आदान-प्रदान करतीं। जेल गईं। कई आंदोलन किए। इनके पति देश के लिए शहीद हुए और उन्होंने अपने पति के बिना करीब 70 साल का जीवन अकेले गुजारा और आजादी के बाद बीसियों साल गुमनामी में गुजार दिए।  

07 अक्टूबर, साल 1907, कौशांबी के शहजादपुर गांव में ब्राह्मण फैमिली में दुर्गावती देवी का जन्म हुआ।

ये गांव आजादी से पहले इलाहाबाद का हिस्सा हुआ करता था। अपने माता-पिता की इकलौती संतान दुर्गावती देवी को उनके एक रिश्तेदार ने पाला, क्योंकि बचपन में मां का निधन हो गया और पिता पंडित बांके बिहारी भट्ट जो इलाहाबाद में जिला न्यायाधीश थे, उन्होंने पत्नी के निधन के बाद गृहस्थ जीवन से संन्यास ले लिया।

साल 1918 में दुर्गावती देवी जब 11 साल की हुईं तो उनकी शादी एक संपन्न गुजराती फैमिली में 14-15 साल की उम्र के भगवती चरण वोहरा के साथ हो गई। 

भगवती चरण वोहरा, के पिता शिव चरण वोहरा, लाहौर में रेलवे में बड़े अफसर थे। अंग्रेजों से वफादारी की तो उन्हें ‘राय बहादुर’ का खिताब भी मिला। भगवतीचरण वोहरा के परिवार के पास लाहौर में तीन-तीन मकान थे। लाखों की संपत्ति थी। चाहते तो पूरी जिंदगी एशोअराम से बिताते पर

जब साल 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बारे में सुना तो भगवतीचरण वोहरा ने देश को आजाद कराने का प्रण लिया। साल 1921 में गांधीजी ने आवाज लगाई तो असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। 

भगवती चरण वोहरा पढ़े लिखे थे ऐसे में भगवती चरण वोहरा जिस स्कूल-कालेज में पढ़ते वहां अपनी पत्नी दुर्गावती देवी का एडमिशन करा देते। दुर्गावती देवी ने बीए किया लाहौर के एक कॉलेज में हिंदी की टीचर बन गईं।

ये वो वक्त था जब भगवती चरण वोहरा का गांधीजी की विचारधारा से मोह भंग हो गया और वो लाहौर के नेशनल कॉलेज से बीए कर रहे थे।

‘राष्ट्र की परतंत्रता और उससे मुक्ति के प्रश्न’ नाम से एक स्टडी सर्किल चला रहे थे।

भगत सिंह और सुखदेव भी तब लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ रहे थे और इस स्टडी सर्किल के सदस्य थे।

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ यानी की HSRA जिसकी नींव साल 1924 में कानपुर में पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, शचींद्र नाथ बख्शी, जोगेश चंद्र चटर्जी जैसे महान क्रांतिकारियों ने रखी।

वहीं बाद में इस एसोसिएशन के चंद्रशेखर आजाद, शचीन्द्रनाथ सान्याल, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव सदस्य बनें।

भगवती चरण वोहरा के साथ दुर्गावती देवी भी इस एसोसिएशन का हिस्सा बनीं। और जब साल 1926 में भगत सिंह ने भगवती चरण वोहरा के साथ मिलकर ‘नौजवान भारत सभा’ का गठन किया तो इसमें दुर्गावती देवी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दुर्गावती देवी ने साल 1926 को लाहौर में करतार सिंह सराभी की शहादत की वर्षगांठ मनाई तो वो पहली बार चर्चा में आईं। साल 1929 में 63 दिनों तक भूख हड़ताल करते-करते क्रांतिकारी जतिन दास ने जेल में जब दम तोड़ दिया तो दुर्गावती देवी ने ही उनका अंतिम संस्सकार किया। 

क्रांतिकारियों की बैठकें अक्सर, भगवती चरण वोहरा और दुर्गावती देवी के घर पर ही होती। भगवती चरण वोहरा की पत्नी होने के नाते सभी क्रांतिकारी आदर पूर्वक दुर्गावती देवी को ‘दुर्गा भाभी’ कहते। भगवती चरण वोहरा और दुर्गावती देवी ने अपनी सारी पूंजी क्रांतिकारियों के लिए खर्च कर दी। साल 1928 में दुर्गावती देवी एक लड़के की मां भी बनीं जिसका नाम शची रखा।

भगवती चरण वोहरा बम बनाने माहिर थे तो पत्नी दुर्गावती देवी बखूबी पिस्टल चलाना जानती थीं। चंद्रशेखर आजाद जो अपने पास पाइंट 32 एसपी की पिस्टल रखते वो दुर्गावती देवी ने ही उनको दी थी।

क्रांतिकारियों की पूरी टीम में भगवती चरण वोहरा और दुर्गावती देवी महत्वपूर्ण योजनाकार के रूप में उभरे। दुर्गावती देवी बमों को सब्जियों की टोकरी में रख कर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचातीं।

साल 1928 में जब साइमन के विरोध प्रदर्शन में हुए लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय शहीद हुए तब दुर्गावती देवी ने कहा कि लालाजी पर लाठीचार्ज का आदेश जिस अंग्रेज अफसर ने दिया था, उसकी मौत से ही बदला लिया जाएगा। लालाजी पर लाठी बरसाया जाना राष्ट्र का अपमान है। स्कॉट को मारना ही होगा।’

इस काम के लिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव तैयार थे। हमला भी किया गया पर स्कॉट की जगह सांडर्स को मार दिया गया।

ये वो वक्त था जब भगवती चरण वोहरा कोलकाता गए हुए थे। भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद को पुलिस की नजरों से बचाकर सुरक्षित जगह ले जाना था। ये जिम्मेदारी दुर्गा भाभी ने उठाई।

भगत सिंह ने अपना पूरा हुलिया बदला, दाढ़ी और बाल कटवा दिए। हैट पहनी, लंबा कोट पहना, वो किसी अंग्रेज अफसर की तरह लग रहे थे।

वहीं दुर्गावती देवी भगत सिंह की पत्नी बनीं उन्होंने कीमती साड़ी और हाई हील की चप्पल पहनकर लाहौर रेलवे स्टेशन से फर्स्ट क्लास डिब्बे का टिकट लिया। भगत सिंह और दुर्गा भाभी, पत्नी-पत्नी तो राजगुरु उनके नौकर बने और उन्होंने थर्ड क्लास का टिकट लिया। चंद्रशेखर आजाद ने संन्यासी का वेश बनाया। इस बात की पूरी आशंका थी कि लाहौर रेलवे स्टेशन पर एनकाउंटर हो सकता है। ऐसे में बच्चे को लेकर चलना ठीक नहीं था।

लेकिन दुर्गावती देवी ने कहा कि देश के लिए मर मिटना, इससे अच्छी शहादत मेरे बच्चे को और क्या मिल सकती है।’

आखिरकार सभी लोग अंग्रेजों के सख्त पहरे के बाद कोलकाता पहुंच गए। वहां दुर्गावती देवी अपने पति भगवती चरण वोहरा से मिलीं और कुछ वक्त के बाद वो लोग लाहौर फिर से आ गए।

8 अप्रैल, साल 1929, अंग्रेजी हुकूमत को जगाने के लिए भगत सिंह ने दिल्ली असेंबली में बम फेंका और खुद को अंग्रेजों के आगे सरेंडर कर दिया।

मामले की सुनवाई के लिए भगत सिंह को लाहौर की एक जेल से दूसरे जेल ले जाया जाता। भगवती चरण वोहरा और दुर्गावती देवी ने योजना बनाई की रास्ते में बम मारकर भगत सिंह को छुड़ा लिया जाएगा। साल 1930 में टेस्ट करते वक्त बम अचानक फट गया जिसे हादसे में  भगवती चरण वोहरा शहीद हो गए।

दुर्गावती देवी को पति भगवती चरण वोहरा के जाने का गम था पर उससे भी बड़ा काम भगत सिंह को जेल से छुड़ाने का था। वो अलग-अलग नामों से भगत सिंह से जेल में मिलने जातीं और एक जासूस की तरह उनको क्रांतिकारियों की गुप्त सूचना देतीं। भगत सिंह की रिहाई के लिए दुर्गावती देवी ने आंदोलन किए गांधीजी से भी मिलीं, पर कोई फायदा नहीं हुआ। आखिरकार अंग्रेजों ने फैसला सुनाया कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाएगी।

इस फैसले के खिलाफ गवर्नर हाउस, लैमिंगटन रोड, मुंबई में पुलिस कमिशनर लार्ड हैली को मारने के लिए गोलियां चलाई। जिसके बाद उन्हें कई दिनों तक फरार रहना पड़ा। दुर्गावती देवी अकेली पड़ चुकी थीं। कोई ठिकाना नहीं था। बेटे को किसी अपने को देकर दुर्गा भाभी अकेले ही निकल पड़ीं।

सत्यनारायण शर्मा अपनी किताब 'क्रांतिकारी दुर्गा भाभी' में लिखते हैं, बम विस्फोट में अपने पति की शहादत के बाद वो अपने एक परिचित केवल कृष्ण के घर पर 15 दिनों तक एक मुस्लिम महिला बन कर रहीं। पड़ोसियों से कहा गया कि वो पर्दानशीं हैं। उनके शौहर केवल कृष्ण के मित्र हैं और उस समय हज पर गए हैं। वो जब तक नहीं आ जाते वो हमारे साथ रहेंगी।’

बाद में उन्होंने सरेंडर कर दिया। जेल में उन्हें पहली रात खूंखार महिला अपराधियों के साथ रखा गया। पुलिस को कोई सबूत नहीं मिला तो दिसंबर साल 1932 को रिहा दिया गया। साल 1936 में दुर्गा भाभी लाहौर से गाजियाबाद आ गईं और वहां प्यारेलाल गर्ल्स हाई स्कूल में पढ़ाने लगीं।

साल 1940 में लखनऊ में एक मांटेसरी स्कूल की स्थापना की, तब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस भवन का उद्घाटन किया था। अप्रैल, 1983 में उन्होंने पढ़ाना बंद कर दिया क्योंकि अब वो अस्वस्थ रहने लगी थीं। बीसियों साल गुमनामी में रहकर 15 अक्टूबर साल 1999 को 92 साल की उम्र में

इस आयरन लेडी ने दुनिया से अलविदा कह दिया। जब- जब महिला क्रांतिकारियों का जिक्र होता है, तो दुर्गा भाभी का नाम गर्व के साथ लिया जाता है।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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