Film Director Bimal Roy : जिंदगी छूटी पर लत न छूटी

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महान फिल्मकार बिमल रॉय जिनके पास दो चीजें थीं एक दीवानगी और एक लत।

 

कैसे बनीं 'दो बीघा जमीन'

साल 1952 और जगह कोलकाता... जहां पैडल वाले नहीं... रिक्शे को हाथों से खींचते हुए दौड़ना पड़ता। इन रिक्शेवालों को देखकर सलिल चौधरी को एक कहानी सूझी। सलिल चौधरी जो एक म्यूजिक डायरेक्टर थे पर वो स्टोरी राइटिंग भी करते। उन्होंने 'रिक्शावालाटाइटल से एक कहानी बंगाली भाषा में लिखी। ये कहानी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की कविता – 'द्वि बीघा जोमी' पर बेस्ड थी। सलिल चौधरी ये कहानी लेकर बिमल रॉय के पास पहुंचे, कहा – 'मेरी इच्छा है कि आप इस पर एक फिल्म बनाएं।' बिमल रॉय कहानी सुनकर बेहद उत्सुक हुए। दरअसल, उन दिनों बिमल रॉय ने भी मुंबई में हुए पहले इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में एक इटेलियन फिल्म ‘बाइसिकल थीव्स’ देखी। जिसके बाद वो ये तय कर चुके थे कि उन्हें भी कोई ऐसी ही रियल लोकेशन पर फिल्म बनानी है। बिमल रॉय ने जब सलिल चौधरी की कहानी सुनी तो बोले - 'सलिल, अगर तुम फिल्म का म्यूजिक भी दोगे, तो मैं ये फिल्म जरूर बनाऊंगा।ये पहली बार था जब सलिल चौधरी किसी हिंदी फिल्म के लिए म्यूजिक दे रहे थे। फिल्म के एडिटर और स्क्रीनप्ले राइटर ऋषिकेश मुखर्जी थे। उस वक्त तक ऋषिकेश मुखर्जी डायरेक्टर नहीं बने थे। रिक्शेवाले 'शंभू महतोका किरदार इंडस्ट्री में अपने पैर जमाने की जद्दोजहद कर रहे एक्टर बलराज साहनी ने निभाया था। बलराज साहनी कोलकाता की गलियों में रिक्शा लेकर ऐसे दौड़े कि पैरों में फफोले पड़ गए। उनकी एक्टिंग देख लोग दंग रह गए थे। रिक्शेवाले 'शंभू महतोकी पत्नी के रोल में थीं एक्ट्रेस निरूपा रॉय। निरूपा रॉय ने उस वक्त कहा था कि 'ये पहली फिल्म है जिसमें रोने का सीन शूट करते वक्त मुझे ग्लिसरीन की जरुरत ही नहीं पड़ी।' फिल्म बनी और उसने इतिहास रचा। ये पहली बार था जब किसी फिल्म को देश ही पूरी दुनिया में ढेरों अवार्ड मिले। हजार साल बाद भी अगर 100 बेहतरीन फिल्म की लिस्ट बनेगी तो उसमें इस फिल्म का नाम जरूर होगा। फिल्म थी साल 1953 की 'दो बीघा जमीन'

टैलेंटसीकर थे बिमल रॉय

बिमल रॉय को सात बार बेस्ट डायरेक्टर और चार बार बेस्ट फिल्म का फिल्मफेयर का खिताब मिला। इन्हें छह बार अलग-अलग कैटेगरी में नेशनल अवार्ड भी मिले।बिमल रॉय वो टैलेंटसीकर थे जिन्होंने गुलजार, धर्मेंद्र, आशा पारेख, नाजिर हुसैननबेंदु घोषऋषिकेश मुखर्जी जैसे एक से बढ़कर एक टैलेंट फिल्म इंडस्ट्री को दिए। वो बिमल रॉय जिनके पास दो चीजें थीं एक दीवानगी और एक लत...। दीवानगी उन्हें अमर बना गई और लत की वजह से वो बेहद कम उम्र में दुनिया छोड़ कर चले गए।

जमींदार के बेटे थे, परिवारवालों ने हड़पी जमीन

ढाका का सुआपुर गांवजो अब बांग्लादेश का हिस्सा है। यहीं पर एक जमींदार फैमिली में 12 जुलाईसाल 1909 को बिमल रॉय का जन्म हुआ। अभी होश संभाला ही था कि पिता का निधन हो गया। इसके बाद घर पर पारिवारिक विवाद हुआ और इन्हें अपनी जमींदारी से बेदखल होना पड़ा। उम्र 22 – 23 की रही होगी तब वो कोलकाता आ गए। दरअसल उनका मन थियेटर और सिनेमा की तरफ था। तय किया कि फिल्मों में ही काम करेंगे।

बतौर सिनेमेटोग्राफर शूरू किया फिल्मी सफर 

कोलकाता के फेमस न्यू थियेटर्स स्टूडियो से जुड़े और यहां पर फिल्म मेकिंग की बारीकियां सीखने लगे। साल 1934 की 'चंडीदास', 'डाकू मंसूर', 1935 की 'देवदास', 1936 की 'मायाऔर 1940 की 'मीनाक्षीजैसी फिल्मों में बतौर सिनेमेटोग्राफर काम किया। फिर वो सिनेमेटोग्राफी के साथ फिल्मों का डायरेक्शन भी करने लगे। पर उन्होंने मसाला फिल्में नहीं बनाई। वो कहानियां - जो आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी थीं। ये समानंतर फिल्मों के आने से भी पहले की बात है।

वो फिल्मों बनाई जो समाज का आईना होतीं

साल 1941 की डॉक्यूमेंट्री - 'Tins for India' में दिखाया कि कैसे फैक्ट्रियों में टिन प्लेट की पतली शीट को एक केरोसिन के डिब्बे में बदला जाता है। फैक्ट्रियों के मजदूरों के हालातों से रूबरू कराया। साल 1943 की अंग्रेजी फिल्म 'बंगाल फेमिनसे बंगाल के अकाल की फुटेज को रिकॉर्ड किया। साल 1945 की 'हमराहीसे एक प्रेम कहानी के जरिए समाज को बांटती अमीरी और गरीबी के फर्क को समझाया। साल 1948 की 'अंजानगढ़से बिहार में आदिवासियों की जमीन हथियाना चाह रहे ताकतवर राजनेताओं का पर्दाफाश किया। साल 1949 की 'मंत्रमुग्धसे हिंदू धर्म के आडंबरों पर हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की। ये वो कहानियां थीं जिन्होंने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया था।

खोला अपना प्रोडक्शन हॉउस

साल 1950 अब बिमल रॉय मुंबई शिफ्ट हो गए। यहां बॉम्बे टॉकीज से जुड़े। बॉम्बे टॉकीज के मालिक हिमांशू रॉय ने साल 1952 की फिल्म ‘मां’ बनाने को कहा। फिल्म तो बनी पर बिमल रॉय फिल्म बनाने के दौरान दबाव महसूस कर रहे थे। वो खुले तौर में अपने मन की फिल्म नहीं बना पाए। फैसला किया अपना प्रोडक्शन हाउस खोलेगें, और यहीं वो वक्त था जब डायरेक्टर का एक महान फिल्मकार बनने का सफर शुरू हुआ।

11 बार जीता फिल्मफेयर

साल 1953 में किसानों पर जमीदारों के अत्याचार की कहानी कहती फिल्म 'दो बीघा जमीनबनाई। ये इंडियन सिनेमा की पहली ऐसी फिल्म थी जिसे दुनिया पर के फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया। कई अवार्ड मिले। 'बेस्ट फिल्मऔर बिमल रॉय को 'बेस्ट डायरेक्टरका 'फिल्मफेयरअवार्ड मिला। 'दो बीघा जमीनको डायरेक्ट करते–करते बिमल रॉय ने साल 1953 की 'परिणीताभी बना ली। महान लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की कहानी पर बेस्ड इस फिल्म ने नाम भी कमाया और पैसा भी। ये लगातार दूसरी बार था जब किसी फिल्म के लिए बिमल रॉय को फिल्मफेयर अवार्ड मिला। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के एक और बंगाली नॉवेल पर बेस्ड साल 1954 में 'बिराज बहुबनाई। इस फिल्म के लिए भी उन्हें फिल्मफेयर मिला। यानी भारत के पहले तीन 'फिल्मफेयरअवार्ड्स लगातार तीन साल तक बिमल रॉय ने ही जीते। साल 1955 की फिल्म 'देवदास' जो शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर ही बेस्ड थी उसे फिल्मफेयर तो नहीं मिला पर नेम-फेम-मनी में कोई कमी न रही। साल 1958 की 'मधुमतीइंडियन सिनेमा की पहली ऐसी फिल्म थी जो पुनर्जन्म की कहानी पर बेस्ड थी जिसने फिल्मफेयर के नौ अवार्ड अपने नाम किए। जिसमें से एक अवार्ड बेस्ट डायरेक्टर का भी शामिल था। यानी बिमल रॉय का ये चौथा फिल्मफेयर अवार्ड था। साल 1959 में 'सुजाताके लिए पांचवी बार फिल्मफेयर का बेस्ट डायरेक्ट का अवॉर्ड मिला। साल 1960 में डेमोक्रेसी पर कटाक्ष करती हुई हल्के मूड की फिल्म 'परखके लिए छठी बार फिल्मफेयर का अवार्ड मिला। ये दूसरी बार था जब बिमल रॉय ने लगातार तीन सालों तक फिल्मफेयर का खिताब अपने नाम किया। साल 1962 की 'प्रेम पत्रफ्लॉप हो गई। लेकिन उन्हीं दिनों वो साल 1963 की फिल्म 'बंदिनीपर काम कर रहे थे। एक बार फिर बिमल रॉय के डायरेक्शन का जादू चला। 'बंदिनी' छह फिल्मफेयर अवार्ड्स ले गई।

सिगरेट पीने की थी आदत, हुआ कैंसर

'बंदिनी' में लीड रोल में अशोक कुमार और नूतन थीं। नए कलाकार धर्मेन्द्र को भी मौका दिया था। यहीं से धर्मेन्द्र भी स्टार बनकर उभरे और महान गीतकारलेखकफिल्मकार गुलजार की नींव भी इसी फिल्म के गाने – 'मोरा गोरा अंग लइलेसे पड़ी थी। ये वो वक्त था जब बिमल रॉय अपने असिस्टंट ‘गुलजार’ के साथ माघ मेल पर बेस्ड एक फिल्म की तैयारी कर रहे थे। जिसका नाम अमृत कुंभ की खोज था। कुछ शूटिंग कर ली गई थी पर गुलजार जानते थे कि ये फिल्म नहीं पूरी होगी। और ये बात बिमल रॉय भी जानते थे कि वो फिल्म पूरी नहीं कर पाएंगे। इसके पीछे वजह थी ज्यादा सिगरेट पीने से बिमल रॉय को कैंसर हो गया था। 

17 साल की मनोबिना को देखा तो देखते रह गए

आखिरी दिनों में साथ में पत्नी मनोबिना थीं। बिमल रॉय जब 28 साल के थे तब एक शादी के फंक्शन में 17 साल की मनोबिना को पहली बार देखा तो देखते ही रह। मनोबिना उस जमाने में शानदार फोटोग्राफर हुआ करती थीं। वो जब 12 साल की थीं तब उनके पिता ने उन्हें एक कैमरा गिफ्ट किया। देखते ही देखते उनकी दिलचस्पी फोटोग्राफी में बढ़ी और उसे ही अपना करियर बना लिया। उनकी कई तस्वीरें मशहूर पत्रिकाओं में छपा करती थीं। बिमल रॉय और मनोबिना की मुलाकातें हुई प्यार हुआ और दोनों ने शादी कर ली। दोनों के चार बच्चे हुए एक बेटा और तीन बेटियां।

56 साल की उम्र में छोड़ दी दुनिया

बिमल राय की दो चीज़ेंएक सिगरेट और दूसरी फिल्म के प्रति उनकी दीवानगीआखिरी सांस तक उनके साथ रही। सिगरेट छोड़ी नहीं तो कैंसर के चलते मात्र 56 साल की उम्र में चल बसे। वहीं उनकी फिल्में उन्हें आजहमारी पीढ़ी और हमारे बाद आने वाली सौ पीढ़ियों तक के लिए अमर कर गईं। इनके निधन के बार ऋषिकेश मुखर्जी ने जब साल 1966 की 'अनुपमा' डायरेक्ट की जो बिमल रॉय को ही समर्पित की।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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