कैसे हुआ आज़ाद भारत का पहला लोकसभा चुनाव ? जानें दिलचस्प किस्से

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अगले साल यानी 2024 में देश में आम चुनाव होंगे, लेकिन क्या आपको पता है कि भारत में पहली बार आम चुनाव कब हुए थे?

अगले साल यानी 2024 में देश में आम चुनाव होंगे, लेकिन क्या आपको पता है कि भारत में पहली बार आम चुनाव कब हुए थे? आम चुनाव से हमारा मतलब लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections) से है। तो आजादी के बाद, भारत में पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 के बीच कराए गए थे। इन चार महीनों में देशवासियों ने पहली बार अपने मन की सरकार चुनी। उस वक्त चुनाव प्रचार का तरीका भी बहुत अलग था। सड़क पर चुनाव प्रचार के लिए गाड़ी के साथ बैलगाड़ी से भी लोग चुनाव प्रचार के लिए जाया करते थे। दीवारों को पोस्टरों और नारों से पाट दिया जाता था। कहीं-कहीं तो गायों की पीठ पर लिखकर पार्टी के लिए वोट मांगे गए। 

1947 में ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी मिलने के दो साल बाद यानी 1949 में चुनाव आयोग बना और मार्च, 1950 में सुकुमार सेन को भारत का पहला चुनाव आयुक्त बनाया गया। सुकुमार की नियुक्ति के एक महीने बाद ही जनप्रतिनिधि कानून पास कर दिया गया था। जनप्रतिनिधि कानून में चुनाव लड़ने वाले नेताओं के लिए नियम, कानून और उनके अधिकार तय किए गए हैं। इसके बाद 1951-52 में भारत में पहली बार आम चुनाव हुए। इस चुनाव प्रक्रिया ने भारत को एक नए मुकाम पर लाकर खड़ा किया। भारत में चुनाव इसलिए भी खास था, क्योंकि पश्चिमी देशों में जहां कुछ विशेष (पढ़ें-लिखे अमीर) लोगों के पास ही वोटिंग का अधिकार था, वहीं नया-नया आज़ाद हुआ भारत 21 साल से ऊपर के अपने हर नागरिक को वोट डालने का अधिकार दे रहा था। बाद में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने वोटिंग की उम्र को 21 से घटाकर 18 साल कर दिया था। पहले आम चुनाव में कुल 1874 उम्मीदवारों ने अपनी ताकत दिखाई। चुनाव में करीब 17 करोड़ लोगों ने भाग लिया था। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस के अलावा, श्रीपाद अमृत डांगे की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भारतीय जनसंघ (जो बाद में बीजेपी बन गई), आचार्य नरेंद्र देव, जेपी और लोहिया की अगुआई वाली सोशलिस्ट पार्टी, आचार्य कृपलानी की किसान मजदूर प्रजा पार्टी समेत कुल 53 छोटे-बड़े दल मैदान में थे। इस पहले आम चुनाव में 45.7 प्रतिशत मतदान हुआ।

वोटर्स का रजिस्ट्रेशन कराना चुनौतीपूर्ण था

ऐसा देश जहां करीब हर 10 में से बमुश्किल 2 लोग भी पढ़े-लिखे नहीं थे, वहां वोटिंग के कॉन्सेप्ट के बारे में लोगों को समझाना एक बड़ा टास्क था। सबसे पहले घर-घर जाकर वोटर्स का रजिस्ट्रेशन कराना अपने आप में बहुत चुनौतीपूर्ण था। क्योंकि बहुत सी महिलाओं को अपना नाम बताने में झिझक थी। वो नाम पूछने पर अपना परिचय फलां की पत्नी या फलां की मां के तौर पर देती थीं। इसका परिणाम ये हुआ कि करीब 80 लाख महिलाओं का नाम वोटर लिस्ट में नहीं लिखा जा सका। पश्चिमी देशों के अधिकतर मतदाता उम्मीदवार को उनके नाम से पहचान सकते थे लेकिन भारत में वोट देने के योग्य आबादी में 85 प्रतिशत लोग ऐसे थे, जो पढ़-लिख नहीं सकते थे। इन लोगों का रजिस्ट्रेशन करवाना एक बड़ी चुनौती थी। इस समस्या से निपटने के लिए चुनाव आयोग ने हर पार्टी को एक अलग चुनाव चिह्न दिया। ये चिन्ह बैलों की जोड़ी, दीपक, मिट्टी का लैम्प जैसे जनता की ज़िंदगी से जुड़े हुए थे। इसलिए इन चुनाव चिह्नों को समझ पाना जनता के लिए आसान था। हर उम्मीदवार के लिए अलग मतपेटी बनाई गई और उनमें उनके चुनाव चिन्ह छापे गए। वोटर अपने पसंद के उम्मीदवार के निशान वाली मतपेटी में अपना मतपत्र डाल सकता था।

 सिनेमाघरों में दिखाई मतदान प्रक्रिया की डॉक्यूमेंटरी फिल्म 

प्रसिद्ध लेखक और इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया आफ़्टर गांधी’ में लिखते हैं, ‘पूरे भारत में कुल 2 लाख 24 हज़ार मतदान केंद्र बनाए गए थे। इसके अलावा लोहे की 20 लाख से ज्यादा मतपेटियां बनाई गई थीं। जिसके लिए 8200 टन इस्पात का इस्तेमाल किया गया था। कुल 16500 लोगों को मतदाता सूची बनाने के लिए छह महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया था और फर्जी वोटिंग से बचने के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐसी स्याही बनाई जो वोटर्स की उंगली पर एक सप्ताह के लिए बनी रहती थी। चुनाव आयोग ने जागरूकता के लिए भारत भर के 3000 सिनेमाघरों में मतदान प्रक्रिया की डॉक्यूमेंटरी फिल्म दिखाई। हालांकि उस समय परिवहन के संसाधन भी सीमित हुआ करते थे, ऐसे में बैलेट बॉक्स को पोलिंग बूथों तक पहुंचाना कितनी बड़ी चुनौती रही होगी। 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक करीब 4 महीनों में 68 चरणों में चुनाव कराए गए थे। उस समय 489 लोकसभा सीटें थीं लेकिन, संसदीय क्षेत्र केवल 401 थे। 314 संसदीय क्षेत्र ऐसे थे, जहां से केवल एक-एक प्रतिनिधि चुना जाना था और 86 संसदीय क्षेत्र ऐसे थे जहां एक साथ दो लोगों को सांसद चुना जाना था। इनमें से एक सांसद सामान्य वर्ग से और दूसरा सांसद एससी/एसटी समुदाय से चुना गया। एक संसदीय क्षेत्र नॉर्थ बंगाल तो ऐसा भी था, जहां से 3 सांसद चुने गए थे।

जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने

जवाहरलाल नेहरू की अगुआई में कांग्रेस ने इन चुनावों में एकतरफा जीत हासिल की। तब कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी हुआ करता था। जवाहरलाल नेहरू लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए देश के पहले प्रधानमंत्री बने। जवाहरलाल नेहरू ने फूलपुर लोकसभा सीट भारी अंतर से जीती। साधारण बहुमत के लिए 245 सीटों की जरूरत थी, लेकिन कांग्रेस ने कुल 489 सीटों में से 364 सीटों पर चुनाव जीता। कांग्रेस का वोट शेयर करीब 45 परर्सेंट रहा। दूसरे नंबर पर सीपीआई रही, उसके खाते में 16 सीटें आईं। उसे लगभग 3.29 प्रतिशत वोट मिले। वहीं, जेपी नारायण की सोशलिस्ट पार्टी चुनाव में 12 सीटें जीतकर तीसरे नंबर पर रही और 10.59 प्रतिशत वोट मिले। इसी तरह किसान मजदूर प्रजा पार्टी ने 9, हिंदू महासभा ने 4 और भारतीय जनसंघ को 3.06 परर्सेंट वोट मिले और 3 सीटें जीतीं। वहीं रिवलूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने 3 सीटों पर जीत हासिल की।

चुनाव के बाद जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई। हालांकि देश के पहले ही आम चुनाव में कई दिग्गजों को हार का सामना करना पड़ा। बॉम्बे (नॉर्थ सेन्ट्रल) सीट पर कभी अपने ही सहयोगी रहे एन. एस. काजरोलकर के हाथों देश के पहले कानून मंत्री डॉ. भीमराव आंबेडकर को शिकस्त झेलनी पड़ी। आंबेडकर के अलावा किसान मजदूर प्रजा पार्टी के कद्दावर नेता आचार्य कृपलानी भी चुनाव हार गए। देश के पहले आम चुनाव के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। 

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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