Florence Nightingale : खुद रहीं बीमार पर मरीजों की सेवा करना नहीं छोड़ा

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बदबू और चीख पुकार से भरे एक अस्पताल में वो एक कमरे से दूसरे कमरे जाती। हर एक मरीज को देख कर उनका दिलभर उठता। रात में भी वो अपने हाथों में लैंप लेकर बिस्तर पर लेटे हर मरीज की जरूरतों का ध्यान देतीं। साक्षात देवदूत की तरह। वो कोई और नहीं, 203 साल पहले पैदा हुईं फ्लोरेंस नाइटिंगेल थीं। आखिर क्यों उनके नाम की शपथ आज हर नर्स को लेनी पड़ती है। आपको हैरानी होगी कि एक प्रभावशाली फैमिली से ताल्लुक रखने वाली फ्लोरेंस के हाथ बेहद कमजोर थे। लेकिन उन्हीं कमजोर हाथों से उन्होंने मरीजों की इतनी सेवा की खुद बीमार हो गईं। पूरे सात सालों तक वो बिस्तर पर पड़ी रहीं। पूरी उम्र शादी इसलिए नहीं कीक्योंकि मरीजों की सेवा के काम में कोई बाधा न आए। 

इंग्लैंड के एक समृद्ध और रसूखदार फैमिली के विलियम और फ्रांसिस नाइटिंगेल के घर 12 मईसाल 1820 को एक बेटी का जन्म हुआ। जिसका नाम फ्लोरेंस नाइटिंगेल रखा गया। बचपन में उनका शरीर कमजोर था। खासकर दोनों हाथ। इस वजह से 11 साल की उम्र तक वो लिख तक नहीं पाती थीं।

साल 1838, वो फैमिली के साथ यूरोप घूमने गईं। जहां उनकी मुलाकात मैरी क्लार्क से हुई। मैरी क्लार्क ब्रिटिश फैमिली से ताल्लुक रखने वाले किसी सदस्य को पसंद नहीं करती थीं। लेकिन फ्लोरेंस जो मैरी क्लार्क से 27 साल छोटी थीं उनकी मैरी क्लार्क से खूब जमी। फ्लोरेंस पर भी क्लार्क के विचारों का प्रभाव पड़ा। खासकर ये कि ‘महिलाएं भी पुरुषों के बराबर हो सकती हैं।

साल 1840 में इंग्लैंड में भयंकर अकाल पड़ा। ये देखकर फ्लोरेंस बेचैन हो गईं। उनकी फैमिली डॉ. फोउलेर से उन्होंने कहा कि ‘मैं नर्स बनकर लोगों की सेवा करना चाहती हूं। उनकी ये बात सुनकर घरवालों में खलबली मच गई। उन दिनों अच्छे घर की लड़कियां नर्स बनने के बारे में सोचती तक नहीं थी।

मशहूर राइटर मार्क बोस्ट्रिज ने फ्लोरेंस नाइटिंगेल की बायोग्राफी – the making of an icon लिखी है। वे लिखते हैं कि

‘उस दौर में राजनीतिक और सामाजिक रूप से प्रभावशाली लोगों के समाज में परवरिश पाती हुईं फ्लोरेंस नाइटिंगेल के मन में असहाय और बीमार लोगों के लिए सेवा की भावना जागना एक अचंभे से कम नहीं लगता।’

घरवालों ने विरोध किया। लेकिन फ्लोरेंस ने अपना इरादा नहीं बदला। पूरे चार साल दुनिया के अस्पतालों के बारे में जानकारी की। रात-रात भर उनके बारे में पढ़ा। इस तरह से मेहनत को देखकर उनके माता-पिता को झुकना पड़ा और साल 1844 में उन्हें नर्सिंग के कोर्स में दाखिला दिलवा दिया।

इनकी जिंदगी ने सबसे बड़ी करवट तब ली। जब एक जंग छिड़ी।

बात 1854 की है। ब्रिटेनफ्रांस और तुर्किए ने रूस के खिलाफ जंग छेड़ दी। जंग में घायलों के इलाज के लिए कोई सुविधा नहीं थी। सेना के अस्पतालों में गंदगी थी। घाव पर बांधने के लिए पट्टियां तक नहीं थी। फ्लोरेंस अपनी टीम के साथ युद्ध स्थल पहुंची। सूझबूझ और लगन के साथ घायल सैनिकों की सेवा की। रात में भी लैंप के सहारे फ्लोरेंस घायलों को एक बार जरूर देखने जातीं। वे मरीजों के लिए खाना भी खुद बनातीं। यहीं से उनको ‘लेडी विद द लैंप’ के रूप में जाना गया। युद्ध खत्म हो गया। लेकिन वो अस्‍पतालों की दशा सुधारने में लगी रहीं। फ्लोरेंस के इस काम की सराहना तब रानी विक्टोरिया और प्रिंस अल्बर्ट ने भी की।

साल 1859 में सेंट थोमस अस्पताल में नर्सिंग ट्रेनिंग कॉलेज शुरू किया। इसी साल फ्लोरेंस ने ‘नोट्स ऑन नर्सिंग’ किताब लिखी। ये नर्सिंग कोर्स के लिए लिखी गई दुनिया की पहली किताब है। साल 1861 में मरीजों और दुखियों की सेवा करते-करते फ्लोरेंस खुद किसी बीमारी की चपेट में आ गईं। करीब छह सालों तक वो चल नहीं सकीं। लेकिन इस दौरान वो अस्पताल के डिजाइन और मेडिकल इक्विपमेंट को और बेहतर करने की दिशा में काम करती रहीं।

फ्लोरेंस के जिंदगी में प्रेम और शादी के भी कई मौके आए। लेकिन मना कर दिया। क्योंकि उन्होंने जिंदगी का लक्ष्य बना लिया था मरीजों की सेवा करना और इस काम में वो किसी भी तरह की बाधा नहीं चाहती थीं।

फ्लोरेंस न सिर्फ महिलाओं की आत्मनिर्भरता की बेजोड़ हिमायती रहींबल्कि उनके लिए करियर का नया रास्ता भी खोला। उन्होंने भारत में भी हंगर रिलीफ कार्यक्रम शुरू किए।

फ्लोरेंस वो पहली महिला हैं जिन्हें साल 1907 में किंग एडवर्ड ने आर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित किया। 13 अगस्तसाल 1910 को 90 साल की उम्र में फ्लोरेंस का निधन हो गया। आज दुनिया में कहीं भी नर्सिंग का कोर्स पूरा करने पर नर्सों को ‘नाइटिंगेल प्रतिज्ञा’ लेनी पड़ती है। क्योंकि वो अपना काम उसी सेवा भाव से करें जिस तरह से फ्लोरेंस ने पूरी जिंदगी किया। नर्सिंग में बेहतरीन काम करने के लिए फ्लोरेंस के नाम पर ‘फ्लोरेंस नाइटिंगेल मेडल’ दिया जाता हैजो दुनिया का सबसे बड़ा अवार्ड है। हेल्थ केयर सिस्टम में आज साफ-सफाई पर जो इतना ज़ोर दिया जाता हैवो 'लेडी ऑफ द लैंपकी कोशिशों से ही मुमकिन हुआ। उनकी याद में हर साल 12 मई को वर्ल्ड नर्सिंग डे के रूप में मनाया जाता है।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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