George Fernandes : एक हड़ताल ने बनाया नेशनल लीडर

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‘वो सादगी के प्रतीक थे। अपनी जिंदगी में न तो कोई कंघा खरीदा और न ही इस्तेमाल किया। अपने कपड़े खुद धोते थे, कपड़ों में प्रेस नहीं करवाई। खुद अपनी गाड़ी भी चलाते। जब रक्षामंत्री थे, तब उन्होंने अपने घर का मेन गेट इसलिए हटा दिया, जिससे लोगों को उनसे मिलने में परेशानी नहीं हो।’

ये बातें एक इंटरव्यू में पॉलिटिशियन जया जेटली ने बताई थीं।

उनके बारे में, जिनके एक इशारे पर लाखों मजदूर सड़कों पर आ गए। आजाद भारत की सबसे बड़ी हड़ताल हुई। जिन पर देश को बम से उड़ाने के साथ कई घोटालों के आरोप लगे। आपातकाल में 'मोस्ट वांटेड मैन ऑफ इंडिया' घोषित हुए। गिरफ्तारी से बचने के लिए अपना वो रूप बदलते। जर्मनी, नॉर्वे और ऑस्‍ट्रेलिया जैसे देश मानते थे कि इनको इंदिरा गांधी नुकसान पहुंचा सकती हैं। आज कहानी जननायक और राजनेता जॉर्ज फर्नांडीस की। जिनका शुरुआती जीवन बेशक चमकीला था, लेकिन अंत शायद धूमिल हो गया।

मैंगलोर के रहने वाले जोसफ फर्नांडिस और एलीस मार्था फर्नांडिस के घर 3 जून साल 1930 को एक बेटे जन्म हुई। एलीस उस दौरान किंग जॉर्ज पंचम को एडमायर करतीं थी। इस वजह से उन्होंने अपने बेटे का नाम भी जॉर्ज रख दिया। चूंकि ये बड़े बेटे थे इसलिए परिवार की एक रूढ़िवादी परंपरा के चलते जॉर्ज को स्कूलिंग करने के बाद धर्म की शिक्षा के लिए बैंगलोर के सेंट पीटर सेमिनेरी में भेज दिया। 16 साल की उम्र में साल 1946-1948 तक उन्हें रोमन कैथोलिक पादरी का प्रशिक्षण दिया गया। तीन साल के बाद उन्होंने ये स्कूल छोड़ दिया। इसके पीछे वजह थी भेदभाव।

लेखक राहुल रामागुंडम अपनी किताब 'द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ जॉर्ज फर्नांडिस' में लिखते हैं कि उस दौरान इस स्कूल में फादर्स ऊंची टेबलों पर बैठकर अच्छा भोजन करते थे। लेकिन पढ़ने वाले बच्चों को ये सुविधा नहीं मिलती। जॉर्ज ने इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। साल 1949 में सबकुछ छोड़कर मुंबई आ गए।

राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण जैसे सियासतदनों की अगली कड़ी के लीडर जॉर्ज फर्नांडिस के संघर्षों की दास्तां को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

उन्होंने शुरुआत एक अखबार में बतौर प्रूफरीडर की नौकरी से की। इसी दौरान वो राम मनोहर लोहिया से जुड़े। सोशलिस्ट ट्रेड यूनियन के आंदोलन में शामिल हुए। 50 और 60 के दशक में मजदूरों को एकजुट कर मुंबई में कई हड़तालों का नेतृत्व किया। मजदूरों की बुलंद आवाज बने। और इन्हीं 10 सालों में जॉर्ज मजदूरों के लीडर के तौर पर उभरे।

जॉर्ज के एक इशारे पर हजारों मजदूर उनके पीछे चलने के लिए तैयार रहते।

जॉर्ज साल 1961 और साल 1968 में मुंबई सिविक का चुनाव जीतकर मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के सदस्य बने।

इस दौरान वो मजदूरों और कर्मचारियों के लिए आवाज उठाते रहे। इन आंदोलनों के कारण जॉर्ज बड़े नेताओं की नजरों में आए।

साल 1967 के लोकसभा चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की टिकट पर मुंबई साउथ से जीते। उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता सदाशिव कानोजी पाटिल को हराया। इस जीत के बाद से ही जॉर्ज को 'जॉर्ज द जाइंट किलर' कहा जाने लगा। साल 1969 में वे संयुक्त सोशियल पार्टी के जनरल सेक्रेटरी चुने गए। साल 1973 में पार्टी के चेयरमैन भी बने।

साल 1974 वो ऑल इंडिया रेलवे मेंस फेडरेशन के अध्यक्ष बनाए गए। और इसी के बाद आजाद भारत की सबसे बड़ी हड़ताल हुई और जॉर्ज इंदिरा सरकार को खटकने लगे।

दरअसल, आजादी से लेकर अब तक तीन वेतन आयोग आ चुके थे, लेकिन रेलवे कर्मचारियों की सैलरी कुछ खास नहीं बढ़ाई कई थी। सैलरी बढ़ाने की मांग को लेकर जॉर्ज के नेतृत्व में हड़ताल 8 मई, साल 1974 को मुंबई में हड़ताल शुरू की गई। इस हड़ताल से न सिर्फ मुंबई बल्कि पूरा देश थम गया। करीब 15 लाख लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। कई दिनों तक रेलवे का सारा काम ठप रहा। कुछ ही वक्त में इस हड़ताल से रेलवे कर्मचारियों के साथ इलेक्ट्रिसिटी वर्कर्स, ट्रांसपोर्ट वर्कर्स और टैक्सी चलाने वाले भी जुड़े तो सरकार की नींद टूटी। पहले तो तत्कालीन इंदिरा सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन, बाद में पूरी कड़ाई के साथ आंदोलन को कुचलते हुए 30 हजार लोगों को गिरफ्तार किया। जिसके लिए आर्मी तक बुलानी पड़ी। हजारों को नौकरी से बेदखल कर दिया। ये हड़ताल अपने मकसद में कामयाब तो नहीं रही, लेकिन भारत के इतिहास में ये टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। इस हड़ताल की वजह से जॉर्ज फर्नांडिस एक नेशनल लीडर के तौर पर उभरे।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जून 1975 में आपातकाल की घोषणा कर दी। कहा जाता है कि आपातकाल लागू करने के पीछे इंदिरा गांधी ने इस हड़ताल का बहाना बनाया। लेकिन जॉर्ज रुकने वाले नेता के रूप में नहीं थे। इस बार वो 'इंदिरा हटाओ' लहर के नायक बनकर उभरे। आपातकाल के दौरान वो लंबे समय तक अंडरग्राउंड रहे। गिरफ्तारी से बचने के वो हर रात अलग-अलग जगहों पर सोते। दाढ़ी और बाल बढ़ा लिए। कभी सिख, कभी मजदूर, कभी पुजारी के वेष में रहते। लेकिन एक दिन पुलिस ने उनके भाई को गिरफ्तार कर उन्हें आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया। गिरफ्तारी के वक्त खींची गई एक तस्वीर आपातकाल की पहचान बनीं।

10 जून साल 1976 को जॉर्ज कलकत्ता से गिरफ्तार कर लिए गए। इन्हें तिहाड़ जेल में बंद किया गया। साल 1977 को आपातकाल खत्म हुआ। अब इंदिरा गांधी की नहीं मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार थी। जॉर्ज फर्नांडिस भी जेल में रहते हुए बिहार के मुजफ्फरपुर से चुनाव जीत गए। वो जनता पार्टी की सरकार में इंडस्‍ट्री मंत्री बने।

जॉर्ज का राजनीतिक करियर बहुत लंबा है। साल 1967 से लेकर साल 2004 तक वो 9 बार सांसद बने। रेलवे, उद्योग, रक्षा, संचार जैसे अहम मंत्रालय संभाले। साल 2009 में राज्यसभा सांसद बने। जॉर्ज ने साल 1994 में जनता दल छोड़कर समता पार्टी का गठन किया।

जॉर्ज हमेशा फैसलों के लिए सुर्खियों में छाये रहे।उद्योग मंत्री रहते हुए निवेश के नियमों के उल्लंघन के कारण आईबीएम और कोकोकोला जैसी कंपनी को देश छोड़ने का आदेश दिया।

वीपी सिंह की सरकार में रेलमंत्री बने तोमंगलौर और मुंबई को जोड़ने के लिए बने कोंकण रेलवे प्रोजेक्ट को एक महत्वाकांक्षी रेल परियोजना में तब्दील कर दिया।

वाजपेयी सरकार में बतौर रक्षा मंत्री उनके हिस्से में पोखरण का सफल परमाणु परीक्षण और कारगिल युद्ध का विजय भी शामिल हैं।

रक्षा मंत्री रहते हुए 18 बार कश्मीर और सियाचिन गए, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड हैं।

जॉर्ज फर्नांडिस का विवादों से भी गहरा नाता रहा है। आपातकाल के दौरान विदेशी संस्थाओं की मदद लेना। इंटरनेशनल कंपनियों को देश से बाहर करने का फैसला। रक्षा मंत्री रहने के दौरानरक्षा सौदे में 7 मिलियन डॉलर का घोटाला और पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद चीन को युद्ध के लिए भड़काने, ताबूत घोटाले के आरोप लगे।

जॉर्ज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से दूरी, नीतीश कुमार के साथ तल्ख राजनीतिक रिश्तों की वजह से भी विवादों में रहे।

जॉर्ज के परिवारिक कलह भी सामने आए। दरअसल साल 1971 में जॉर्ज ने लीला कबीर से शादी की थी। इनका एक बेटा सियान फर्नांडिस भी हुआ। लेकिन 13 साल बाद ये दोनों एक दूसरे अलग हो गए। इसके बाद जॉर्ज के जीवन में जया जेटली आईं। जया भी एक पॉलिटिशियन रही हैं।

सार्वजनिक रूप से जया जेटली के साथ अनाम व्यक्तिगत रिश्ते, क्लीन चिट मिलने के बाद भी घोटालों के आरोप, अल्जाइमर की बीमारी। पारिवारिक और संपत्ति विवादों ने जॉर्ज फर्नांडिस का पीछा अंत समय तक नहीं छोड़ा। 29 जनवरी, 2019 को 88 साल की उम्र में निधन हो गया।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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