Ghanshyam Das Birla : गुलाम भारत का ‘आजाद’ व्यापारी

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अपने हाथ को ध्यान से देखो। इससे बड़ी दुनिया में कोई ताकत नहीं है। हमारा वक्त भी आएगा, जब हमारे हाथ, हमारा मुकद्दर सवार देंगे। सिर्फ तुम, अपने हाथों से कहा करो कि, ये हमें दुनिया में सम्मान और पैसा दोनों दे’

जब एक भाई ने पूछा कि, भगवान हमारा साथ नहीं देता, तो ये शब्द उनके बड़े भाई ने उनसे कहे थे। जो बिड़ला ग्रुप के संस्थापक और देश की आजादी में अहम योगदान देने वाले घनश्याम दास बिड़ला थे। देश को आजाद कराने में बहुत से क्रांतिकारियों ने अपना खून बहाया, बहुत से जेल गए, लेकिन आज हम उस दानी की बात करेंगे जो खुद को व्यापारी नहीं मानते थे, वे केवल पैसे कमाने व्यापार में नहीं उतरे थे।

राजस्थान के नवलगढ़ के रहने वाले साहूकार शिवनारायण बिड़ला जो मारवाड़ी महेश्वरी परिवार से थे। कोई संतान नहीं थी तो परिवार के बलदेव दास को गोद ले लिया, बलदेव दास बन गए बलदेव दास बिड़ला। बलदेव दास व्यापार के चलते राजस्थान से मुंबई आ गए।

वक्त गुजरा तो उनके चार बेटे हुए - जुगल किशोर, रामेश्वर दास, घनश्याम दास और ब्रज मोहन। इन सभी में घनश्याम दास, जिन्होंने अपना अलग मुकाम बनाया।

राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानियों की ग्रंथमाला लिखने वाले लेखक डॉ. रामधारी सैनी के मुताबिक,

घनश्याम दास का जन्म 10 अप्रैल साल 1894 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के पिलानी गांव में हुआ और सिर्फ ये 5वीं क्लास तक पढ़े थे। वे चाहते थे तो बड़े ऐशो -आराम से अपनी जिंदगी गुजारते। लेकिन वे कोलकाता चले गए और वो व्यापार किया जो उस दौर में कोई भारतीय नहीं करता था। ये व्यापार था जूट का, कोलकाता में जूट का सबसे बड़ा प्रोडक्शन होता था। समस्या थी जूट के व्यापार पर अंग्रेजों का एकछत्र राज था।

उन दिनों अंग्रेजों को चुनौती देना पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर करने जैसा था, लेकिन घनश्याम दास ने कोलकाता में डेरा जमा और जैसे तैसे जूट का व्यापार शुरू कर दिया। उनका विश्वास और धैर्य काम आया।

वक्त था 1914 के आसापास जब फर्स्ट वर्ल्ड वॉर वार होने की वजह से पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में जूट की कमी हो गई और ये समय बिड़ला के लिए आगे बढ़ने का था और वो बढ़े भी।

साल 1919 में घनश्याम दास बिड़ला ने उस साम्राज्य की नींव रखी जो साल दर साल फलता-फूलता रहा। यही वो साल था जब उन्होंने 50 लाख रुपये से ‘बिड़ला ब्रदर्स लिमिटेड’ की स्थापना की।

साल 1916 में वो पहली बार महात्मा गांधी से मिले। वक्त के साथ दोस्ती गहरी हुई और वे महात्मा गांधी के सबसे करीबी मित्र के साथ साथ उनके सलाहकार भी बने। क्रांतिकारी जो खून बहाकर और जेल जा कर आजादी का ख्वाब देख रहे थे। तो वहीं घनश्याम दास आर्थिक रूप से देश को आजाद कराने की मुहिम में जुटे हुए थे।

साल 1926 में ब्रिटिश इंडिया के सेंट्रल असेंबली के लिए चुने गए। साल 1932 में महात्मा गांधी के साथ दिल्ली में हरिजन सेवक संघ की स्थापना की। हरिजनों के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। साल 1943 में पिलानी में बिड़ला इंजीनियरिंग कॉलेज और भिवानी में टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्सटाइल एंड साइंसेज की स्थापना की।

जिसकी वजह से लाखों बच्चे अपने भविष्य में शिक्षा का उजाला कर सके।

उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए आर्थिक मदद दी और अन्य अमीर भारतीयों से भी आजादी की लड़ाई में समर्थन करने की अपील की।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान घनश्याम दास ने एक ऐसे बैंक का सपना देखा, जो पूरी तरह से भारतीय पूंजी और प्रबंधन से बना हो। उनका ये सपना यूनाइटेड कमर्शियल बैंक के रूप में साल 1943 में पूरा हुआ। इस बैंक की स्थापना कोलकाता में की गई। भारत के सबसे पुराने बैंकों में से एक इस बैंक को अब यूको बैंक के नाम से जाना जाता है।

हिंदुस्तान मोटर्स से देश को ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में उतारा। कई यूरोप की कंपनियों को खरीद कर चाय और टेक्सटाइल में भी निवेश किया। इसके साथ ही सीमेंट, स्टील जैस इंडस्ट्री में कदम रखा ।

साल 1936 में दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास लक्ष्मी नारायण मंदिर बनवाया जिसे बिड़ला मंदिर भी कहते है।

साल 1905 में घनश्याम दास ने पिलानी के चिड़ावा गांव की रहने वाली दुर्गा देवी से शादी की, एक बेटा भी हुआ लेकिन कुछ सालों में दोनों की मौत हो गई। फिर साल 1912 में महेश्वरी देवी से दूसरी शादी की। लेकिन 14 साल साथ देने के बाद महेश्वरी देवी का भी साल 1926 में टीबी से निधन हो गया। जब घनश्याम दास की मात्र 32 साल की उम्र थी, इसके बाद घनश्याम दास ने अपने चार बच्चों के साथ ही पूरा जीवन गुजारा।

कभी एक कमरे के मकान में किराए पर व्यापार शुरू करने वालेघनश्याम दास बिड़ला ने जब 11 जून 1983 को 89 साल की उम्र में हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कीं, उस समय बिड़ला ग्रुप की 200 कंपनियों देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रही थीं। उस समय उनकी कुल संपत्ति 2500 करोड़ रुपये थी।

साल 1957 में पद्म भूषण से सम्मानित घनश्याम दास बिड़ला ने ‘रुपये की कहानी’, ‘जमनालाल बजाज’, ‘बापू’, ‘पाथ टू प्रोस्पेरिटी’, ‘इन द शैडो ऑफ द महात्माजैसी किताबें भी लिखी है । और साल 1934 को अपने पुत्र बसंत कुमार बिड़ला के नाम पत्र लिखा था। दरअसल, दुनिया में कई हस्तियों ने पत्र लिखे। इनमें से दो पत्र सबसे आदर्श माने गए हैं। इनमें एक है ‘अब्राहम लिंकन का शिक्षक के नाम पत्र’ और दूसरा है ‘घनश्याम दास बिड़ला का पुत्र के नाम पत्र’। इसे हर किसी को पढ़ना चाहिए। ये है उस पत्र का अंश...  

चि. बसंत…

ये जो लिखता हूं, उसे बड़े होकर और बूढ़े होकर भी पढ़ना। संसार में मनुष्य का जन्म दुर्लभ है और मनुष्य जन्म पाकर जिससे शरीर का दुरुपयोग किया, वो पशु है। तुम्हारे पास धन है। तंदुरुस्ती है। अच्छे साधन हैं। उनको सेवा के लिए उपयोग किया। तब तो साधन सफल है। अन्यथा वे शैतान के औजार हैं। धन का मौज-शौक में कभी उपयोग न करना। ऐसा नहीं कि धन सदा रहेगा ही। इसलिए जितने दिन पास में है, उसका उपयोग सेवा के लिए करो। अपने ऊपर कम जनकल्याण और दुखियों का दुख दूर करने में व्यय करो। धन शक्ति है। इस शक्ति के नशे में किसी के साथ अन्याय हो जाना संभव है। इसका ध्यान रखो कि अपने धन के उपयोग से किसी पर अन्याय ना हो। अपनी संतान के लिए भी यही उपदेश छोड़कर जाओ। यदि बच्चे मौज-शौक, ऐश-आराम वाले होंगे तो पाप करेंगे और हमारे व्यापार को चौपट करेंगे। ऐसे नालायकों को धन कभी न देना। उनके हाथ में जाए, उससे पहले ही जनकल्याण के किसी काम में लगा देना या गरीबों में बांट देना। तुम उसे अपने मन के अंधेपन से संतान के मोह में स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं कर सकते। भगवान को कभी न भूलना। वो अच्छी बुद्धि देता है। इंद्रियों पर काबू रखना, वरना ये तुम्हें डुबो देगी और नित्य नियम से रोज भगवद् सेवा करना। सेवा से कार्य में कुशलता आती है।  

–घनश्याम दास बिड़ला

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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