Girija Devi : विपरीत हालात में भी ख्वाबों को किया सच

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मां संगीत के खिलाफ थीं। पिता ने हौसला दिया। पहले से शादीशुदा आदमी से शादी सिर्फ इसलिए की वो संगीत सीखने में बाधा नहीं बनेंगा। लेकिन ऐसा हो न सका। फिर समाज के खिलाफ जाकर संगीत सीखा। एक साधारण गृहणी ने अपने ख्वाबों को पूरा किया और ‘ठुमरी की रानी’ बनकर पूरी दुनिया में अपना नाम बनाया। बनारस घराने की गिरिजा देवी की कहानी सुनेंगे तो एक उम्मीद मिलेगी कि हालात जैसे भी अपने शौक को पूरा किया जा सकता है।   

ये वो दौर था, जब समाज में महिलाओं का गाना बजाना अच्छा नहीं माना जाता था। इसलिए गिरिजा देवी की मां और दादी को कभी भी उनका संगीत सीखना पसंद नहीं था। लेकिन, उनके संगीत प्रेमी पिता रामदेव राय जो एक जमींदार थे, उन्होंने समाज की परवाह किए बगैर हमेशा गिरिजा देवी का साथ दिया।

08 मई, साल 1929 में बनारस में जन्मी गिरिजा देवी ने पांच साल की उम्र में ही म्यूजिक सीखना शुरू कर दिया। गिरिजा देवी ने एक बार इंटरव्यू में एक बताया था कि

आठ साल की उम्र आते-आते संगीत मेरा सबकुछ बन गया। ठुमरी, टप्पा, ख्याल गायन शैली ही नहीं बल्कि बनारस के आस-पास के क्षेत्रीय गायन चैती, होरी, बारामासा भी सीखकर मैंने उसमें अपना रंग दिया।’

उस दौर में लड़कियों की शादी जल्दी कर देते थे। साल 1944 में लगभग 15 साल की उम्र में ही गिरीजी देवी की शादी कर दी गई। बिजनेसमैन मधुसूदन जैन से। मधुसूदन जैन की पहले शादी हो चुकी थी और वे गिरिजा से उम्र में कफी बड़े थे। लेकिन, गिरिजा और उनके पिता इस शादी के लिए इसलिए तैयारी हो गए कि मधुसूदन जैन कभी गिरिजा और उनके संगीत के बीच में नहीं आएंगे। शादी के बाद भी गिरिजा को गाना गाने से नहीं रोकेंगे। सिर्फ इस शर्त की वजह से पिता राम देव राय ने गिरिजा के लिए मधुसूदन को चुना। लेकिन हुआ कुछ और।  

एक इंटरव्यू में गिरिजा देवी ने बताया था कि मेरे पति ने मुझसे कहा कि तुम गाओ, कोई समस्या नहीं है। लेकिन घर पर ही। किसी महफिल में गाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने घर पर ही मुझे संगीत सीखने और गाने की अनुमति दे दी। मेरे पहले गुरु का तबतक निधन हो चुका था। इसलिए उन्होंने एक दुसरे गुरु श्रीचंद मिश्रा से मुझे शिक्षा दिलवाई।’

उनका सीखना और गाना सिर्फ घर में चल रहा था। उस वक्त केवल एक साधारण गृहणी बनकर गिरिजा देवी अपने गाने का शौक को घर पर ही पूरा कर रही थी। लेकिन उनके दिल में एक कसक थी वे अपना संगीत दुनिया के सामने लाना चाहती थीं।

शादी के पांच साल हो चुके थे। आखिर उन्होंने एक दिन पति से कह ही दिया। फिर पति ने इजाजत से गिरिजा देवी ने साल 1949 में रेडियो पर गाना शुरू किया। लेकिन कहते हैं जिस तारे को चमकना होता हो उसके सामने कितना भी बड़ा चांद आ जाए वो तारा अपनी चमक से पूरे आसमान को सुंदर बना ही देता है। वक्त गुजरा और उनके साथ ऐसा एक इत्तेफाक हुआ कि वो सीधे मंच पर गाने पहुंच गई।

रेडियो में गाना गाते हुए दो साल का वक्त बीत चुका था। फिर साल 1951 में गिरिजा देवी ने बिहार में आरा कॉन्फ्रेंस में मशहूर सिंगर पंडित ओंकारनाथ के गायन को सुनने गई। हुआ यूं कि कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही खबर आई कि पंडित ओंकारनाथ अपने तय समय में नहीं आ पाएंगे। उनको आने में देर हो जाएगी। क्योंकि जिस गाड़ी से वो आ रहे थे। वो गाड़ी खराब हो गई। हॉल सैकड़ों लोगों से भरा हुआ था। पंडित ओंकारनाथ के देर से आने की खबर पाकर लोग शोर मचाने लगे। लोगों को शांत करने के लिए आयोजकों ने एक तरकीब निकाली। उन्हें जैसे ही पता चला कि गिरिजा देवी भी कार्यक्रम में मौजूद हैं वैसे आयोजकों ने गिरिजा देवी को मंच पर गाने के लिए आमंत्रित कर किया। इसके बाद क्या था गिरिजा देवी गाती रहीं और और पूरे हॉल में मौजूद आदमी उनको घंटों सुनता रहा।

इस घटना का जिक्र करते हुए गिरिजा देवी ने बताया था कि हमारा कार्यक्रम दोपहर एक बजे शुरू हुआ और करीब ढाई बजे तक चला। हमने पहले राग देसी गाया और फिर ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए…’। कार्यक्रम बड़े पंडाल में हो रहा था। हमने आंखें मूंदी और गाना शुरू कर दिया, इस बात की फिक्र किए बिना कि सामने सौ लोग हैं या हजार। बाद में आंखें खोलीं, तो देखा कि पंडाल में करीब दो-ढाई हजार लोग थे।’

इसके बाद गिरिजा देवी ने बनारस कांफ्रेंस में भी प्रस्तुति दी। यहां उन्हें संगीतकार पंडित रविशंकर, अली अकबर भैया और उस्ताद विलायत खान जैसे गायक ने सुना। रविशंकर को गिरिजा देवी का गायन इस कदर पसंद आया कि उन्होंने गिरिजा देवी को गाने के लिए दिल्ली बुला लिया। और यहां से उनका साधारण गृहणी से ‘ठुमरी  की रानी’ बनने का उनका सफर शुरू हुआ।

साल 1952 में गिरिजा देवी ने दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में गाने को आमंत्रित किया गया। जहां तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सामने प्रस्तुति दी।

मशहूर लेखक और संगीत समीक्षक यतींद्र मिश्र अपने एक आर्टिकल में लिखते हैं कि 'वो पूरी जिंदगी रेडियो और अलग-अलग मंचों पर प्रस्तुति देती रहीं। लोग अगर उन्हें सुनते थे तो सुनते ही रह जाते थे। उनके सुर लोगों का मन मोह लेते थे।'

उनके जिंदगी पर डॉक्यूमेंट्री भी बनाई गई है - गिरिजा: अ लाइफटाइम इन म्यूजिक।

साल 1972 में पद्मश्री, साल 1989 में पद्म भूषण और साल 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित गिरिजा देवी ने जिंदगी के आखिरी साल कोलकाता के म्यूजिक रिसर्च एकेडमी में बिताए। 24 अक्टूबर साल 2017 वो दिन जब 88 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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