Girish Karnad : बेबाक अंदाज से बनाई अपनी अलग पहचान

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महाराष्ट्र की रहने वाली कृष्णाबाई कर्नाड ने बाल विवाह किया था। लेकिन, बहुत ही जल्द वो विधवा हो गई। कृष्णाबाई पढ़ लिख कर नर्स बनीं। फिर उनकी मुलाकात रघुनाथ कर्नाड से हुई। दोनों ने शादी की। और 19 मई साल 1938 को एक बेटा हुआ। आज कहानी इसी बेटे की, जो गिरीश कर्नाड के नाम से फेमस हुए। बतौर साहित्यकार, नाटककार, एक्टर, फिल्म डायरेक्टर के रूप में दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

गिरीश कर्नाड ने अपनी आटोबायोग्राफी लिखी है। वो लिखते हैं कि हम तीन भाई-बहन थे, जो साथ मिलकर रहते। मेरी मां का प्रभाव मुझ पर बहुत ज्यादा रहा, क्योंकि इतने संघर्ष के बाद भी उनके चेहरे पर एक तेज रहता था।

गिरीश छोटे मैं स्केच बनाने का शौक रखते। उन्होंने एक बार आइरिस लेखक 'सीन ओ कैसी' का स्केच बनाकर उन्हें भेजा, तो उसके बदले उन्होंने एक पत्र भेजा।

पत्र में उन्होंने लिखा कि ‘स्कैज बनाकर अपना वक्त न जाया करो। कुछ ऐसा करो, जिससे एक दिन लोग तुम्हारा ऑटोग्राफ मांगे।’

फिर उनका रुझान थियेटर में गया। वजह थी, उनके माता-पिता मराठी थियेटर दिलचस्पी रखते थे। वो अक्सर थियेटर की बातें किया करते। गिरीश के पिता सरकारी नौकरी करते थे पिता का ट्रांसफर महाराष्ट्र से कर्नाटक हो गया। शुरुआती पढ़ाई मराठी में करने के बाद गिरीश ने कर्नाटक के एक कॉलेज से ग्रेजुएशन किया।

गिरीश अपनी बायोग्राफी में लिखते हैं कि कॉलेज में सभी लोग कविताएं, छोटी कहानियां, लोक-कथाएं लिखते थे। गिरीश भी धीरे-धीरे इस और बढ़े। इस तरह से वो बतौर राइटर बनने के लिए कदम बढ़ाने लगे।

इसी बीज 'ययाती' लिखा गया, जो साल 1961 में प्रकाशित हुआ। स्कॉलरशिप मिलने के बाद पढ़ाई करने लंदन गए। इसी बीज ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में नौकरी की। सात साल काम किया और इस्तीफा देकर भारत आ गए। फिर पूरा समय सिर्फ लिखते।

मद्रास में थियेटर ग्रुप 'द मद्रास प्लेयर' के साथ नाटकों में हिस्सा लेने लगा। फिर कई नाटकों की कहानी लिखने का सफर शुरू हुआ।

इसके बाद उन्होंने करीब चार दशकों तक इतिहास और पौराणिक कथाओं का इस्तेमाल करते हुए समकालीन मुद्दों पर नाटक लिखे। उन्होंने कई नाटकों का अनुवाद किया। नाटक लिखने के दौरान गिरीश अपने नाटकों में एक्ट भी करते। और उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी अपना हाथ अजमाया और इसमें भी सफलता पाई। उनकी पहली साल 1970 की कन्नड़ फिल्म 'संस्कार' थी। 'निशांत', 'मंथन' और 'पुकार' जैसी फिल्में करके 50 साल के अपने फिल्मी करियर में गिरीश कर्नाड ने 90 से ज्यादा फिल्मों में काम किया।

गिरीश कर्नाड की लेखनी में जितना दम था, उन्होंने उतने ही बेबाक अंदाज में अपनी आवाज को बुलंदी दी। उनकी तमाम राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका रही। वो सामाजिक रूप से काफी सक्रिय रहते थे। पद्मश्री, पद्मभूषणसंगीत नाटक अकादमी और ज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित गिरीश कर्नाड का 10 जून, 2019 में निधन हो गया।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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