Halla Bol करने वाले Theatre artist Safdar Hashmi कैसे बने Fire Brand Communist? | Manchh |

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"किताबें करती हैं बातेंबीते जमाने कीदुनिया की इंसानों की...'

ये मशहूर कविता 12 अप्रैल 1954 को जन्मे सफदर हाशमी की हैं। इन्होंने  दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इंग्लिश लिटरेचर में एमए किया। वे सूचना अधिकारी बनेलेकिन बाद में इस्तीफा दे दिया। लेकिन इनका परिचय मात्र इतना भर नहीं है आज एक नाटककारएक्टरडायरेक्टरगीतकारश्रम के समर्थक और पूंजीवादी व्यवस्था के विरोधी सफ़दर हाशमी की कहानी जब उनके एक नाटक के प्रदर्शन भर से सत्ता समर्थकों ने उनकी जान ले ली।

पैसों की कमी की वजह से सफ़दर ने गली-मोहल्लों को ही अपना स्टेज बना लिया। साल 1973 में ‘जनम’ यानी जन नाट्य मंच की नींव रखी और कुछ मंझे हुए कलाकारों के साथ मिलकर नुक्कड़ नाटक शुरू किए। उनके नाटकों में सत्ता के दमन की खिलाफत होती थी। उनके नाटक दबे कुचले लोगों की आवाज थे। तानाशाही व्यवस्था की नींव हिल जाती थी। पूंजीवादी व्यवस्था की नींद उड़ जाती थी।

सफ़दर हाशमी के विचार थे कि

सच बोलने की कीमत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों ना हो,

  हल्ला बोल करक्रांति की बयार बहाई जा सकती है।’

एक जनवरी साल 1989 का दिन और जगह गाजियाबाद का झंडापुर मोहल्लाअंबेडकर पार्क के पास जन नाट्य मंच मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता रामानंद झा के समर्थन में नुक्कड़ नाटक कर रहा था। नाटक का नाम था, 'हल्ला बोलऔर नाटक का निर्देशन कर रहे थे सफ़दर हाशमी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक तभी कांग्रेस नेता मुकेश शर्मा वहां से निकले और उन्होंने सफदर हाशमी से रास्ता देने को कहा। इस पर सफ़दर ने उन्हें थोड़ी देर रुकने या दूसरा रास्ते से निकलने को कहा। इस बात से मुकेश शर्मा के समर्थक भड़क गए और उन्होंने नाटक मंडली पर हमला कर दिया। इस हमले में सफदर बुरी तरह जख्मी हो गए। उन्हें राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां से दो जनवरी की वो सुबह जब सफदर हाशमी दुनिया से अलविदा कह गया।

मात्र 34 साल की उम्र जीने वाले सफ़दर हाशमी ने ऐसा मुकाम बना लिया थाजो लोगों के दिलों में उतर चुका था। अगले दिन सफ़दर हाशमी का जब अंतिम संस्कार हुआतब दिल्ली की सड़कों पर 15 हजार से ज्यादा लोग उमड़ आए थे। सफदर की मौत के 48 घंटे बाद उनकी पत्नी मल्यश्री और उनके साथियों ने उसी नाटक को उसी जगह मंचन किया जहां से सफदर हाशमी वो नाटक छोड़ गए थे।

उनकी मौत के 14 साल बाद 2003 में गाजियाबाद कोर्ट ने कांग्रेस नेता मुकेश शर्मा के साथ 10 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई। सफ़दर ने अपने जीवन में 24 नुक्कड़ नाटकों का 4000 से भी ज्यादा बार मंचन किया हैं। आज भी सफदर उनके चाहने उनको याद करते हैं।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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