भारतीय सेना में कैसे होती है कुत्तों की ट्रेनिंग, रिटायरमेंट के बाद कैसे ले सकते हैं गोद ?

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आर्मी के डॉग्स उसी तरह देश की सेवा करते हैं, जैसे कोई दूसरा सैनिक। इंडियन आर्मी में डॉग्स कई तरह की ड्यूटीज़ करते हैं। आर्मी के पास करीब 25 फुल डॉग यूनिट और दो हाफ यूनिट हैं। एक फुल डॉग यूनिट में 24 कुत्ते होते हैं। जबकि हाफ यूनिट में 12 कुत्ते होते हैं। इनमें से करीब 19 यूनिट्स उत्तरी कमान में काम करती हैं, जो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में ऑपरेशन के लिए तैनात रहते है। हर के 9 यूनिट में अलग-अलग नस्लों के 24 कुत्ते हैं, जिन्हें कई तरह के टफ ऑपरेशन्स के लिए स्पेशली ट्रेंड किया जाता है। इनकी सैलरी भी होती है आज हम बात करेंगे कि इन डॉग सोल्जर्स की खासियत क्या है और ये कैसे ट्रेंड किए जाते हैं और रिटायरमेंट के बाद इन डॉग्स का क्या होता है?

कहते हैं कि इंसान से भी ज्यादा वफादारी डॉग्स में होती है। इस बात का ही एक बेहतरीन एक्जाम्पल है इंडियन आर्मी की डॉग यूनिट, जो साल 1960 से इंडियन सोल्जर्स के साथ लगातार वफादारी साबित करते आएं हैं। इन्हें आवाज की बजाए आंखों के इशारे से समझना और काम करना सिखाया जाता है। हैंडलर उन्हें इस हद तक ट्रेंड कर देते हैं कि मुसीबत के वक्त डॉग्स को कमांड देने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि वो बिना बोले काम शुरू कर देते हैं। सेना के प्रत्येक कुत्ते की देखरेख की पूरी जिम्‍मेदारी एक डॉग हैंडलर की होती है। उसे कुत्‍ते के खाने-पीने से लेकर साफ-सफाई का ध्‍यान रखना होता है और ड्यूटी के टाइम सारे काम कराने के लिए हैंडलर ही जवाबदेह होता है। खास ऑपरेशन जैसे सर्च और बचाव अभियान या फिर आतंकियों का सुराग लेने के दौरान छोटी से छोटी आहट मुश्किल ला सकती है। यही वजह है कि सेना में इन्हें न भौंकने की तक ट्रेनिंग मिलती है। जिससे वो बेखटके काम कर पाते हैं। । आर्मी की डॉग यूनिट्स में कई तरह के नस्लों के कुत्ते होते हैं। इनमें बेल्जियम मालिंस, लैब्राडोर, जर्मन शेफर्ड, ग्रेट माउंटेन स्विस डॉग और यहां तक की मुधोल हाउंड और बखरवाल जैसी इंडियन ब्रीड्स भी शामिल हैं। अगर बात की जाए इनके डॉग्स की खासियतों के बारे में तो 

1. मुधोल हाउंड को मराठा हाउंड, कठेवार डॉग और पश्मी हाउंड के नाम से भी जाना जाता है। मुधोल हाउंड नस्ल के कुत्तों का नाम दक्षिण भारत की मुधोल रियासत के नाम पर रखा गया है। कर्नाटक के बागलकोट नाम की जगह पर मुधोल रियासत के शासकों ने इन कुत्तों को पाला था। इस नस्ल के कुत्तों के नाम रखने पर एक दिलचस्प ऐतिहासिक किस्सा है। दरअसल, साल 1937 तक इस रियासत पर राज करने वाले आखिरी शासक का नाम मालोजीराव घोरपड़े था। एक बार घोरपड़े ने देसी नस्ल के इस कुत्ते की एक जोड़ी किंग जॉर्ज पंचम को भेंट की। तभी उन्होंने इस डॉग का नाम मुधोल हाउंड दिया था।

- लंबे पैरों वाला मुधोल हाउंड अपनी बेहतरीन शारीरिक बनावट की वजह से सुरक्षा एजेंसियों को सबसे ज्यादा पसंद आने वाला स्वदेशी डॉग है।

- मुधोल हाउंड 270 डिग्री तक देख सकता है। किसी दूसरे नस्ल की कुत्तों से बेहतर देखने की क्षमता की वजह से इसे SPG में शामिल किया गया।

- देसी नस्ल के दूसरे कुत्तों से ज्यादा सूंघने की क्षमता की वजह से मुधोल हाउंड निगरानी और चौकसी के मामले में बेस्ट डॉग है।

- मुधोल हाउंड दूसरे कुत्तों की तुलना में कम थकता है। यही नहीं यह बीमार भी कम पड़ता है। यही वजह है कि इसे सेना के दस्ते में शामिल किया गया है।

- इस देसी नस्ल के कुत्ते को हर मौसम में काम करने की क्षमता होती है। इसका शरीर हर मौसम के मुताबिक खुद को एडजस्ट कर लेता है।

- मुधोल हाउंड किसी दूसरे स्वदेशी नस्ल के कुत्ते की तुलना में ज्यादा बहादुर और ईमानदार होता है।

 

2. बखरवाल उत्तरी भारत में पाया जाने वाला डॉग है, जिसे गद्दी कुट्टा या तिब्बती मास्टिफ़ के नाम से भी जाना जाता है। ये पीर पंजाल श्रेणी से एक प्राचीन कामकाजी कुत्ते की नस्ल है। इसे सदियों से बखरवाल और गुर्जर जनजातियों की तरफ से बैन किया गया है। इंडियन आर्मी इस लद्दाखी नस्ल को अलग-अलग भूमिकाओं के लिए ट्रेनिंग दे रही है।

• ये डॉग स्पेशली इंडिया के लद्दाख एरिया से हिमालय के माउंटेन साइड मिलते हैं।

• इनकी ऊंचाई -24-30 इंच और वजन -85-130 पाउंड होता है।

• ये यात्रा और आपूर्ति के परिवहन की सुविधा के लिए काम करने वाले कुत्तों के रूप में भी सहायक होते हैं।

• इसके अलावा घायल और चोटिल लोगों की निकालने के लिए लद्दाख की बर्फीली ऊंचाई पर स्लेज डॉग के तौर पर भी काम करते हैं। 

 

3. बेल्जियन मैलिनोइस मूल रूप से बेल्जियम के डॉग हैं, अपनी फुर्तीली रफ़्तार, तेज दिमाग, शानदार धीरज और आक्रामकता के लिए जानी जाने वाली ब्रीड है। दुनिया भर में स्पेशल फोर्सेस और सुरक्षा एजेंसियों के नए पसंदीदा के तौर पर उभरी है। एक जर्मन शेफर्ड के विपरीत, ये कुत्ते अपने छोटे आकार के कारण विमान से पैराशूटिंग और तेज़-रोपिंग के लिए एकदम फिट बैठते हैं। बेल्जियम मालिंस ने आईएसआईएस चीफ अबू बकर अल बगदादी को ढूंढकर मारने में अमेरिकी सेना की मदद करने के बाद बेल्जियन मेलिनोइस ने स्पेशल स्टेटस हासिल किया। इंडियन आर्मी भी अब इनका इस्तेमाल करती है ।

- ऊंचाई 22-26 इंच के बीच और वजन 40-80 पाउंड के बीच होता है।

- 9 गज दूरी से स्मेल को पहचान कर शिकारी का ट्रैक तलाश सकता है। 

- 2 फीट गहराई में यदि किसी ने तश्करी का सामान ग़ाढ़ा हो, तो ढूंढ निकालता है। 

- 24 घंटे बाद भी व्यक्ति के रास्ते से गुजरने की गंध को पहचान लेता है। 

- 2 से 3 फीट तक ऊंची दीवार को बिना रुके पार कर लेता है। 

 

4. जर्मन शेफर्ड कुत्तो की एक बड़ी नस्ल है जिसे की अल्सतियन के नाम से भी जाना जाता है और इसका इस्तेमाल भेड़ बकरियों को इकट्टा करने और उनकी रक्षा करने के काम में लिया जाता था। लेकिन उनकी चतुराई, समझ, आज्ञाकारीपन और कई अन्य वजहों से उन्हें पूरे वर्ल्ड में पुलिस और सेना में काम में लिया जाता है। जिसमें विकलांगों की सहायता करना, खोज और बचाव, और पुलिस और सैन्य भूमिकाएं शामिल हैं।

- इनकी ऊंचाई 22-26 इंच और वजन 20-40 किलोग्राम होता है।

- वे एक सिग्नेचर स्क्वायर थूथन, झाड़ीदार पूंछ और एक काला मुखौटा के साथ आकार में बड़ा होता हैं ।

- वो बुद्धिमान और तेजी से सीखने वाले हैं, उन्हें अब दुनिया भर में कई जॉब्स के लिए पसंद किया जाता है,

 

5. लैब्राडोर दुनिया में सबसे लोकप्रिय कुत्तों की नस्लों में से एक, लैब्राडोर या लैब्राडोर रिट्रीवर, कनाडा के मछली पकड़ने वाले कुत्तों से विकसित यूके के रिट्रीवर कुत्तों की एक नस्ल है। वो विकलांगता सहायता के लिए विशेष रूप से लोकप्रिय हैं और नेत्रहीनों और यहां तक कि ऑटिस्टिक लोगों की सहायता के लिए अच्छी तरह से काम करते हैं। इस नस्ल को बहुत ही सामाजिक और मिलनसार माना जाता है, और कुत्ते अपने मालिकों के लिए ज्यादा वफादार होते हैं।

• उनका वजन 80 पाउंड तक होता है और ऊंचाई लगभग 25 इंच होती है।

• वे 12 से 14 साल की उम्र तक पहुंचते हैं।

• वो स्मार्ट और प्रशिक्षित करने में काफी आसान हैं।

 

6. ग्रेट स्विस माउंटेन डॉग को बड़े मास्टिफ़ कुत्तों के साथ स्वदेशी कुत्तों के मैटिंग का रिजल्ट माना जाता है, जिन्हें बाहरी लोग स्विट्जरलैंड लाए थे। माना जाता है कि औसत ग्रेट स्विस माउंटेन डॉग में उच्च चपलता बनाए रखते हुए हड्डियों की बड़ी ताकत होती है। ये मिलनसार और फ्रेंडली होते हैं और परिवारों में अच्छे तरीके से घुलमिल जाते हैं।

• स्विट्जरलैंड में सबसे पुरानी डॉग नस्लों में से एक।

• वजन लगभग 100 पाउंड है और वे 28.5 इंच तक ऊंचे हो सकते हैं।

• एक बड़ा स्विस आपसे बड़ा हो सकता है और उसका वजन एक मीडियम साइज के इंसान जितना हो सकता है।

 

7. कॉकर स्पैनियल गन डॉग की एक नस्ल है जिसे अच्छे स्वभाव, मिलनसार, सामाजिक, और सक्रिय माना जाता है। संयोग से, एक कॉकर स्पैनियल का उल्लेख पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात भाषण में किया था। इस भाषण में सोफी, एक कॉकर स्पैनियल, और विडा, एक लैब्राडोर, दोनों को नामित किया गया था। दोनों को 74वें स्वतंत्रता दिवस पर थल सेनाध्यक्ष ‘कमांडेशन कार्ड्स’ से सम्मानित किया गया। सोफी एक विस्फोटक खोजी कुत्ता है जिसने आईईडी बनाने के लिए उपयोग किए जाने वाले एक सर्जक की उपस्थिति को सूँघकर आर्मी की सहायता की।

• ये अमेरिकी नस्ल दुनिया भर में सबसे प्रसिद्ध नस्लों में से एक है।

• उनका वजन 24-28 पाउंड है और उनकी ऊंचाई लगभग 15 इंच है।

आर्मी इन लड़ाकू कुत्तों को मेरठ के रिमाउंट वेटरनरी कोर सेंटर एंड कॉलेज (RVC) में ट्रेंड करती है। इन कुत्तों को गश्त करने, इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेस (IEDs) के अलावा बाकी विस्फोटकों को सूंघने, गार्ड ड्यूटी, हमला करने, खदान का पता लगाने, हिमस्खलन मलबे का पता लगाने, गैरकानूनी सामान को सूँघने के साथ-साथ भगोड़े और आतंकवादी के छिपने का पता लगाने के लिए तलाशी अभियान में भाग लेने के साथ और भी कई तरह के ऑपरेशन्स को पूरा करने के लिए ट्रेंड किया जाता है। जब वो छह महीने के पिल्ले होते हैं इन कुत्तों की हार्ड ट्रेनिंग मेरठ के Training Facility Center में शुरू होती है। ट्रेनिंग के बाद, उन्हें एक यूनिट में शामिल किया जाता है। जहां वो 8 साल की उम्र में रिटायर होने से पहले सोल्जर्स की कंपनी में एक strict daily routine को फॉलो करते हैं। पहले इन लड़ाकू कुत्तों को इंडियन आर्मी 8 साल की सेवा पूरी करने के बाद इच्छामृत्यु देती थी। जब तक कि वो वीरता पुरस्कार विजेता न हों। हालांकि, साल 2015 में दिल्ली हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, अब इन चार पैरों वाले सैनिकों को या तो मेरठ में आर्मी के आरवीसी सेटर में वापस कर दिया जाता है या गैर सरकारी संगठनों को गोद लेने के लिए दिया जाता है ताकि वो अपनी बची जिंदगी आराम से बिता सकें।

इंडियन आर्मी में कुत्तों को सेनाध्यक्ष प्रशस्ति कार्ड, वाइस चीफ ऑफ़ स्टाफ कमेंडेशन कार्ड के साथ-साथ उनके वीरता के कार्यों के साथ-साथ विशिष्ट सेवा के लिए जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ कमेंडेशन कार्ड से सम्मानित किया जाता है। इन डॉग्स को कई ऑपरेशन्स को जान पर खेलकर अंजाम देने के लिए वीरता पुरस्कार भी मिलते रहे हैं। Remount Veterinary Corps (RVC) में एक शौर्य चक्र और वीरता के लिए मिले ढेरों दूसरे सम्मान सजे हुए हैं। इसके अलावा अवॉर्ड जीतने वाले कुत्तों को हर महीने 15,000 से लेकर 20,000 रुपये मिलते हैं, जिसे उनके खाने से लेकर सेहत तक पर खर्च किया जा सके।

अगर आप भी आर्मी डॉग को गोद लेना चाहते हैं तो गोद लेने के लिए शपथ पत्र के साथ एक आवेदन पत्र लिखकर कॉमडीटी आरवीसी सेंटर एंड कॉलेज, मेरठ कैंट मेरठ 250001 (Comdt RVC centre and college, Meerut Cantt Meerut 250001) को डाक से भेजना होगा। आवेदन की समीक्षा के बाद आर्मी की साइड से कांटेक्ट किया जाएगा। सारे डाक्यूमेंट प्रोसेस होने के बाद एक interview क्लियर करने के बाद सोल्जर डॉग को अपने साथ ले जा सकते हैं। 

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