50,000 साल पुराने जीवाश्मों की ऐज का साइंटिस्ट कैसे लगाते हैं पता ?

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आप किसी की उम्र का पता कैसे लगाते हो ? उसके जन्म के साल से न? लेकिन किसी पेड़ या वस्तु, मरे हुए जानवरों के अवशेषों और जीवाश्मों के बारे में ये कह पाना कि वो कबके हैं बहुत मुश्किल काम है। कार्बन डेटिंग से इन तथ्यों के करीब पहुंचा जा सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में मिले शिवलिंग की कार्बन डेटिंग और साइंटिफिक सर्वेक्षण कराने की बात कही थी। क्या है कार्बन डेटिंग और इसका क्या है तरीका? आइए जानते हैं...

नमस्ते मैं ऋषभ हूं और आप हैं मंच पर

कार्बन डेटिंग से organic matters यानी कार्बनिक पदार्थों की ऐज निकाली जाती है। ये एक तरह का Scientific method है, जिसके जरिए किसी पुरानी चीज की ऐज  का अंदाजा लगाया जा सकता है। इससे ज्यादातर उन चीजों के समय का पता लगाया जाता है, जो कभी जीवित थीं।  उसके बाल, कंकाल और चमड़ी जैसे भागों से पता चलता है कि ये कितने साल पहले जीवित थीं। दरअसल, किसी भी सजीव वस्तु का कालांतर में कार्बन जमा हो जाता है। वक्त बीतने के साथ ही साल दर साल उस वस्तु पर कार्बनिक अवशेष परत दर परत जमा होते जाते हैं। जानकारी के मुताबिक, कार्बन डेटिंग से करीब 50 हजार साल पुराने किसी अवशेष के बारे में पता लगाया जा सकता है। बाल, कंकाल, चमड़ी के अलावा ईंट और पत्थरों की भी कार्बन डेटिंग होती है। इस मेथड से उनकी ऐज का भी पता लगाया जा सकता है। ये 500 से 50,000 साल पुराने जीवाश्मों और पुरातात्त्विक नमूनों की डेटिंग की एक वर्सटाइल टेक्नोलॉजी साबित हुई है। इस मेथड का मेनली भूवैज्ञानिकों, मानवविज्ञानी, पुरातत्त्वविदों और इससे जुड़ी फील्ड्स में जांचकर्त्ताओं की तरफ से इस्तेमाल किया जाता है। ये दो तरह की होती है। 

पोटेशियम-आर्गन डेटिंग- जिसमें पोटेशियम का रेडियोएक्टिव आइसोटोप्स आर्गन में बदल जाता है और उनके अनुपात चट्टानों की ऐज के बारे में ऐविडेंस दे सकते हैं।

यूरेनियम-थोरियम- लेड डेटिंग- जिसमें यूरेनियम और थोरियम में कई रेडियोएक्टिव आइसोटोप होते हैं और ये सभी स्थिर लेड परमाणु में क्षय हो जाते हैं। मटेरियल में मौजूद इन एलिमेंट्स के रेसियो को काउंट किया जा सकता है। और ऐज एस्टीमेट निकालने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

 

साइंटफिकली तो कार्बन डेटिंग प्रमाणिक है लेकिन ये हर कंडीशन में सटीक तौर पर लागू नहीं की जा सकती। मसलन इसका इस्तेमाल बड़ी चट्टानों जैसी निर्जीव वस्तुओं पर प्रभावी नहीं होता। इस मेथड से चट्टानों की ऐज निर्धारित नहीं की जा सकती है। हमारे वायुमंडल में तीन प्रकार के आइसोटोप होते हैं-कार्बन-12, कार्बन-13 और कार्बन-14... कार्बन डेटिंग के दौरान कार्बन 12 और कार्बन 14 का अनुपात निकाला जाता है। किसी वस्तु की मृत्यु के समय कार्बन 12 होता है और कालांतर में वो कार्बन 14 में transform हो जाता है। इस तरह किसी वस्तु की कार्बन 12 से कार्बन 14 तक आने का टाइम पीरियड निकाला जाता है। इस तकनीक को सन् 1940 के आखिर में शिकागो विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर विलार्ड लिब्बी ने विकसित किया था। जिन्हें बाद में इस काम के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। 

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