अयोध्या के राम मंदिर की तस्वीर लेने वाली सैटेलाइट कैसे काम करती है और इस सीरीज में कौन-कौन सी सैटेलाइट हैं ?

Home   >   खबरमंच   >   अयोध्या के राम मंदिर की तस्वीर लेने वाली सैटेलाइट कैसे काम करती है और इस सीरीज में कौन-कौन सी सैटेलाइट हैं ?

168
views

अयोध्या की ये सैटेलाइट तस्वीर जो सोशल मीडिया पर लगातार वायरल हो रही है, जो कि ISRO ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से ठीक एक दिन पहले 21 जनवरी 2024 को तस्वीर जारी की थी, देश की सबसे बड़ी Scientific Institution ने पूरे देश को अंतरिक्ष से ही राम मंदिर के भव्य दर्शन कराए। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि ये तस्वीर जिस भारतीय सैटेलाइट ने ली है, उसी सीरीज की सैटेलाइट्स ने सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयरस्ट्राइक में इंडियन आर्मी की मदद भी की थी। इन सैटेलाइट्स को कार्टोग्राफी सैटेलाइट्स कहते हैं, यानी जमीन पर होने वाले प्रोजेक्ट के लिए अंतरिक्ष से नक्शा बनाने में मदद करते हैं। इसके साथ ही भौगोलिक स्थितियों के बारे में बताते हैं। 

अयोध्या की तस्वीर ली गई है कार्टोसैट-2 सीरीज की एक सैटेलाइट से... वो सैटेलाइट कार्टोसैट-2/आईआरएस-पी7 या कार्टोसैट-2सी हो सकती है, क्योंकि इनका रेजोल्यूशन एक मीटर के नजदीक है। हालांकि इसरो ने सिर्फ इतना ही बताया है कि ये कार्टोसैट सैटेलाइट है। 

कार्टोसैट भारत में बनी ऑब्‍जरवेटरी सैटेलाइट्स की एक सीरीज है, जो पूरे भारत की भौगोलिक स्थितियों और सीमाओं पर नज़र रखती हैं। इनमें से ही एक सैटेलाइट का इस्तेमाल इंडियन आर्मी भी करती है। जिसकी मदद से पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक किया गया था। इन सैटेलाइट्स का इस्तेमाल चीन के साथ Border Conflict के दौरान भी किया गया था। असल में ये Earth Observation Satellite हैं, जो इसरो के Indian Remote Sensing Program का पार्ट हैं। ये लैंड Information System और Geographic Information System पर काम करते हैं। 

इस सीरीज में कार्टोसैट -1, कार्टोसैट-2, रिसोर्ससैट -1, रिसोर्ससैट- 2, ओशनसैट -1, ओशनसैट -2, रिसैट -1, मेघा हैं। भारत के पास अब तक जितने ऑब्‍जरवेटरी सैटेलाइट्स मौजूद हैं, उनमें सबसे उन्नत सैटेलाइट कार्टोसैट-3 है। कार्टोसैट सीरीज का ये 9वां सैटलाइट है। इसको आसमान में भारत की आंख भी कहा गया है। इसकी कुछ खास वजह हैं। दरअसल, कार्टोसेट 3 में लगे हाई रिजोल्‍यूशन स्पेशियल कैमरे होने के अलावा इनका ग्रांउड रिजोल्‍यूशन भी काफी है। इसकी मदद से धरती से करीब 509 किमी की ऊंचाई से ये बेहद साफ तस्‍वीरें ले सकता है। 

ये पहला ऐसा सैटेलाइट है जो पेनक्रोमैटिक मोड में 16 किमी दूरी की स्पेशियल रेंज कवर कर सकता है। इसके अलावा ये मल्टी-स्पेक्ट्रम और हाइपर स्पेक्ट्रम को भी आसानी से कैप्चर कर सकता है।

ये सैटेलाइट इतने पॉवरफुल हैं कि एक मीटर से कम साइज वाली किसी भी चीज की बिल्कुल साफ फोटो ले सकते हैं। इन तस्वीरों को प्रोसेस और संभालने का काम हैदराबाद में बने National Remote Sensing Center (NRSC) में किया जाता है। और ज्यादातर सैटेलाइट इमेजेस भी वहीं से जारी की जाती हैं। 

राम मंदिर निर्माण के दौरान इस तकनीक का बखूबी इस्तेमाल किया गया। असल में मंदिर का निर्माण करने वाली कंपनी L&T ने Global Positioning System आधारित को-ऑर्डिनेट्स हासिल किए। ताकि, मंदिर परिसर की सही जानकारी मिल सके। ये कॉर्डिनेट्स 1-3 सेंटीमीटर तक सटीक थे। इस काम में इसरो के स्वदेशी जीपीएस यानी NavIC (नाविक) यानी नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टीलेशन का इस्तेमाल किया गया। इसके जरिए प्राप्त सिग्नल से ही नक्शा और कॉर्डिनेट्स बनाए गए हैं।

इन उन्नत सैटेलाइट्स की मदद से गूगल मैप से इतर भारत ने खुद का नेविगेशन सिस्टम भी डेवलप किया है। जिसका नाम NavIC यानी  Navigation with Indian Constellation है। NavIC को पहले भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम के रूप में जाना जाता है।  

इसके अलावा स्पेस वार फेयर में भारत एक महाशक्ति के तौर पर उभरा है, स्पेस से होने वाली निगरानी के साथ ही स्पेस से होने वाले किसी हमले को भी नाकाम करने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुका है। अगर कोई देश भारत पर सैटेलाइट के जरिए नापाक मंसूबे रखता है तो उसके जवाब के तौर पर भारत के DRDO ने Anti Satellite Missile डेवलप कर ली है। भारत ऐसा करने वाले चुनिंदा देशों के एलीट ग्रुप में शामिल है। 27 मार्च, साल 2019 को प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने देश के नाम संदेश देते हुए इसकी पुष्टि की थी। 

 

Comment

https://manchh.co/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!