2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के हिंदुत्व की काट कैसे निकालेगी कांग्रेस ?

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29 नवंबर 2022 राहुल गांधी की एक तस्वीर सामने आती है जिसमें वो बाबा महाकाल के दरबार में दंडवत होते हुए दिखते है. ये तस्वीर भारत जोड़ो यात्रा के दौरान एमपी की है. उन दिनों राहुल ने 7 दिन में दो बार बाबा महाकाल के दर्शन किए थे. इस दौरान उन्होंने मंदिर के पुजारियों के मार्गदर्शन में सभी अनुष्ठान किए और वो मंदिर परिसर में नंदी की मूर्ति के पास भी कुछ देर बैठे. जिसके बाद ऐसा कहा जाने लगा कि राहुल गांधी कांग्रेस को मजबूत करने के साथ सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल पड़े है. लेकिन जब से अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर कांग्रेस ने मना किया है उसके बाद से बीजेपी आक्रमण मोड में है और कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने की होड़ मची हुई है.

हालांकि, ये भी सच है कि 90 के दशक में कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में कानूनी तरीके या बातचीत के जरिए राम मंदिर निर्माण के लिए हामी भरी थी. इस लिहाज से तो उसे अयोध्या के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में जाना चाहिए था. लेकिन, ये दांव बताता है कि कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व से किनारा कर रही है. आखिर ऐसा क्यों कांग्रेस ने स्टैंड लिया और 2024 लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस क्या सॉफ्ट हिंदुत्व की राह से दूरी बना रही है. 

 

रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में दूरी से संकट

दरअसल 22 जनवरी को देश का सबसे बड़ा कार्यक्रम अयोध्या में हुआ, जहां रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई, इस कार्यक्रम में PM मोदी से लेकर तमाम देश की जानी मानी हस्तियां मौजूद रही लेकिन कांग्रेस की ओर से कोई बड़े नेता ने शिरकत नहीं की. हालांकि कांग्रेस का ये दांव उसके लिए आगे घातक साबित हो सकता है क्योंकि कुछ समय बाद देश में लोकसभा चुनाव हैं. लिहाजा, अभी से राजनीतिक दलों के बीच सियासत की पिच तैयार की जाने लगी है. सत्तापक्ष से लेकर विपक्ष के तकरीबन सभी दल हिंदुत्व के एजेंडे पर अपने कदम बढ़ाते नजर आ रहे हैं. बस फर्क इतना है कि कोई हार्ड हिंदुत्व पर चल रहा तो कोई सॉफ्ट हिंदुत्व पर. कांग्रेस हिंदू को हिंदुत्व से अलग बताती है जबकि बीजेपी दोनों को एक ही मानती है. बीजेपी लंबे समय से हार्ड हिंदुत्व की पॉलिटिक्स करती रही है, उसे इस राह पर चलने का सियासी फायदा भी मिला है.

सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चली कांग्रेस

2024 का लोकसभा चुनाव हिंदुत्व के एजेंडा पर ही होने की उम्मीद है, लेकिन फर्क सॉफ्ट और हार्ड हिंदुत्व के बीच है. बीजेपी सिर्फ हिंदू धर्म से जुड़े प्रतीकों को लेकर नहीं चलती बल्कि आक्रामक तरीके से हिंदुत्व के मुद्दे पर खड़ी नजर आती है. राम मंदिर के मुद्दे से लेकर मथुरा और काशी तक का बीजेपी न सिर्फ अपने भाषणों में जिक्र नहीं करती है बल्कि अपने घोषणा पत्र में भी शामिल करती है. एक ओर जहां बीजेपी हिंदुत्व की धार को बढ़ाते हुए अयोध्या में भव्य राम मंदिर को लेकर उम्मीदें पाले हुए है तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस भी हिंदू धर्म से किनारा न करके सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल रही है. जिसकी झलक भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान दिखी जब राहुल गांधी ने एक सवाल के जवाब में कहा कि, जहां तक धर्म की बात है, हम सभी धर्मों के साथ हैं. हम ये कहना चाहते हैं कि कांग्रेस पार्टी से जो भी जाना चाहे, वो जा सकता है.

हालांकि इस बीच सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या अयोध्या से दूरी बनाने से INDIA गठबंधन और उसके भविष्य पर असर पड़ेगा. चूंकि, तीन महीने से भी कम समय में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. आजतक की खबर की मानें तो बीजेपी ने तो साफ कर दिया है कि वो राम मंदिर के मुद्दे को भुनाएगी और कांग्रेस समेत इंडिया अलायंस को घेरने के लिए 'हिंदू विरोधी' के रूप में प्रचारित करने में कसर नहीं छोड़ेगी. बीजेपी का जब ये एजेंडा साफ हो गया है तब विपक्ष के सामने बड़ी चुनौती यही है कि वो अयोध्या मुद्दे का काउंटर अटैक कैसे करेगा?

देखा जाए तो INDIA गठबंधन में ज्यादातर राजीतिक दल खुद को धर्म निरपेक्ष कहते हैं. उनका अपना बड़ा वोट बैंक है. अंदरखाने से ये भी डर है कि अगर वो अयोध्या जाएंगे, तब भी बीजेपी घेरेगी और ना जाने पर भी सवाल उठाएगी. ऐसे में बीजेपी के किसी एजेंडे में फंसने से बेहतर अयोध्या मसले पर किनारा कर लिया जाए. इसका काउंटर करने की भी स्क्रिप्ट तैयार कर ली है. कांग्रेस ने अयोध्या जाने से दूरी बनाने की तीन बड़ी वजह बताई हैं.

पहला- चुनाव को देखते हुए अधूरे मंदिर का उद्घाटन करना

दूसरा- चारों शंकराचार्य का ना जाना

तीसरा- बीजेपी, RSS, बजरंग दल और VHP की इस पूरे कार्यक्रम में भूमिका?

कांग्रेस का कहना है कि ये बीजेपी-RSS का कार्यक्रम है.पिछले कुछ सालों में पहली बार कांग्रेस का रुख इतना स्पष्ट रूप से सामने आया है. चूंकि, इससे पहले कांग्रेस चुनावों में बीजेपी को पटखनी देने के लिए उसी के एजेंडे पर काउंटर करने की कोशिश करती आई है. बीजेपी ने जब सनातन विरोधी का सवाल उठाया तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी से लेकर प्रियंका गांधी तक मंदिर, गुरुद्वारा में पूजा-अरदास करते देखे गए. लेकिन सवाल फिर भी बना रहा की कांग्रेस हिंदुत्व से किनारा कर रही है. इसकी वजह ये भी मानी जाती है की कांग्रेस पार्टी का संगठन दक्षिण बनाम उत्तर भारत के बीच फंस हुआ है.

 

दक्षिण में कांग्रेस की मजबूती

आंकड़ों पर नजर डालें तो  उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, असम, गोवा, गुजरात, त्रिपुरा, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी की अपनी सरकार है. जबकि महाराष्ट्र, नगालैंड, सिक्किम, मेघालय और पुडुचेरी में बीजेपी गठबंधन सरकार का हिस्सा है. पंजाब और दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है.अगर दक्षिण भारत की बात की जाए तो कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और तेलंगाना 5 प्रमुख दक्षिण भारतीय राज्य माने जाते हैं. इनमें से कर्नाटक को दक्षिण का प्रवेश द्वार माना जाता है. कांग्रेस ने साल 2023 के मई में कर्नाटक का चुनाव जीता और दक्षिण के प्रवेश द्वार में एंट्री की. और फिर तेलंगाना में भी कांग्रेस ने सरकार बनाई. जबकि झारखंड, बिहार और तमिलनाडु में कांग्रेस गठबंधन सरकार का हिस्सा है. वहीं, आंध्र प्रदेश , तमिलनाडु और केरल में बीजेपी की कोई मौजूदगी नहीं है.  

बेशक दक्षिण भारत में बीजेपी की कोई सरकार नहीं है. लेकिन बीजेपी दक्षिण भारत में अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश में जुटी है. सांसदों के लिहाज से भी बीजेपी दक्षिण भारत की सबसे बड़ी पार्टी है. दक्षिण भारत के पांच राज्यों में बीजेपी के 29 सांसद हैं. जबकि कांग्रेस के 28 सांसद हैं. लोकसभा की बात की जाए, तो कुल 543 सीटों में से बीजेपी के पास लगभग आधी सीटें हैं. लोकसभा में कांग्रेस की सिर्फ 82 सीटें हैं. वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा की मानें तो उनका मानना है कि कांग्रेस दक्षिण भारत में बेहतर प्रदर्शन कर रही है. उसे डीके शिवकुमार जैसे चाणक्य मिले हुए हैं जिन्होंने कर्नाटक और तेलांगाना में कमाल किया है. खड़गे और वेणुगोपाल ने भी दक्षिण के इस प्रदर्शन में योगदान दिया. लेकिन बीजेपी से असली लड़ाई तो उत्तर और मध्य भारत में होनी है जहां कांग्रेस काफी पिछड़ गई है. उत्तर, मध्य और पश्चिम के कई राज्यों में बीजेपी से सीधी टक्कर है जहां पिछले चुनाव में कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई. बीजेपी की सीटें इस बार कम करने के लिये कांग्रेस को हर कीमत पर बीजेपी को उत्तर में टक्कर देनी होगी. इसके साथ ही वरिष्ठ पत्रकार ने कांग्रेस पार्टी के संगठन पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि पार्टी में सारे अहम पदाधिकारी दक्षिण से जुड़े हैं जिन्हे आप उत्तर के महारथी नहीं कह सकते.

Congress Chief Kharge from South.

Gen Sect Org Venugopal from South.

Rahul’s constituency from South.

Media head Jairam Ramesh from South.

Chief Poll Consultant  Sunil Kanugolu from South.

War room Chairman S Senthil from South

 

सवाल ये है कि दक्षिण से नियुक्तियां गलत नहीं, पर असली युद्ध उत्तर में है और हिंदी पट्टी के खिलाड़ी चाहिये. अगर उत्तर में कांग्रेस को फिर भी धारदार नेता नहीं मिल रहे तो India Alliance के साथी नेता जैसे नीतीश कुमार, जयंत, अखिलेश या केजरीवाल को ही कहीं कहीं आगे कर दीजिये, कम से कम हिंदी में बात तो जोरदार तरीके से रखेंगे. अब कांग्रेस कब इन नेताओं को आगे करती है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा. लेकिन ये साफ है कि सॉफ्ट हिंदुत्व के सहारे कांग्रेस ने अपनी उम्मीदों को पाला हुआ है जबकि बीजेपी खुलकर हार्ड हिंदुत्व के साथ है. आने वाले चुनावों में क्या फैसला जनता लेती है ये देखने वाली बात होगी. 

 

कानपुर का हूं, 8 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं, पॉलिटिक्स एनालिसिस पर ज्यादा फोकस करता हूं, बेहतर कल की उम्मीद में खुद की तलाश करता हूं.

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