भारत का 'सूर्ययान' Aditya L1 जलते सूरज से कैसे बचेगा?

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सूरज के लिए भेजे जाने वाले आदित्य एल-1 का मकसद क्या होगा, साथ ही ये सूरज की इतनी तेज आग को कैसे बर्दाश करेगा, जानने के लिए पढ़िए खबर....

चंद्रयान-3 की सफलता के बाद अब सभी की निगाहें भारत के पहले सूर्य मिशन आदित्य एल1 पर हैं। आदित्य जोकि सूर्य के ही कई नामों में से एक है। लेकिन एल1 क्या है? और सूरज का ये मिशन मुमकिन कैसे होगा, क्योंकि सूरज की गर्मी के आगे कोई धातु भला दिख कैसे पाएगी? साथ ही इस ये भी जानना जरुरी है कि मिशन से क्या कुछ बदल जाएगा, इसरो को इस मिशन का जरुरत क्यों है? 

आदित्य एल 1 इंडिया का पहला स्पेस बेस्ड ऑब्जर्वेटरी मिशन है, जोकि सूर्य की स्टडी करेगा। यहां स्पेस बेस्ड ऑब्जर्वेटरी से मतलब है कि ये लगातार स्पेस में बना रहेगा और सूर्य को पढ़ता, समझता रहेगा। हाल में हुए चद्रयान-3 को चंद्रमा पर लैंड कराया गया था, लेकिन आदित्य एल 1 के साथ ऐसा नहीं होगा। और ऐसा होना मुमकिन भी नहीं है क्योंकि मौजूदा समय में ऐसी कोई धातु या ऐसी कोई चीज मौजूद ही नहीं है जो सूरज की गर्मी को बर्दाश कर सके, तो अब सवाल उठता है कि फिर ये मिशन सूर्य के कितना करीब जाएगा। इसका जवाब मिशन के नाम में ही छिपा हुआ है। आदित्य एल 1 जिसमें एल 1 स्पेस में वो जगह है जहां ये मिशन होगा।

एल 1 का मतलब लैगरांजे पॉइंट है, ये इतालवी-फ्रेंच मैथमैटीशियन जोसेफी-लुई लैगरांजे के नाम पर रखा गया है। हमारी धरती और सूर्य के बीच में 5 लैगरांजे पॉइंट L1, L2, L3, L4 और L5 है। बेसिकली इस जगह पर सूर्य और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल बैलेंस हो जाता है। जिससे सैटेलाइट स्थिर रहता है और ईधन भी कम लगता है। पहला लैग्रेंज पॉइंट हमारी पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर की दूरी पर है, जिसे एल 1 कहा जाता है, जहां आदित्य एल-1 स्पेसक्राफ्ट को पार्क किया जाएगा। इसरो का कहना है कि L1 पॉइंट के आस-पास हेलो ऑर्बिट में रखा गया सैटेलाइट सूर्य को बिना किसी ग्रहण के लगातार देख सकता है। L1 पॉइंट के चारों ओर की ऑर्बिट को हेलो ऑर्बिट कहा जाता है।

L1 की बात रही तो ये सूरज और धरती की सीधी रेखा के बीच स्थित है। ये सूरज और धरती की टोटल दूरी का सिर्फ एक फीसदी हिस्सा है, यानी 15 लाख किलोमीटर। जबकि, सूरज से धरती की दूरी 15 करोड़ किलोमीटर है। यानी आदित्य एल-1 सूरज से 14 करोड़ 85 लाख किलोमीटर दूर धरती के करीब रहेगा। जबकि, 15 लाख किलोमीटर की दूरी पृथ्वी से चांद की दूरी से करीब चार गुना ज्यादा है। आदित्य-एल1 सूरज से इतनी दूर तैनात होगा कि उसे गर्मी लगे तो लेकिन वो खराब न हो, उसे इसी हिसाब से बनाया गया है। आदित्य एल-1 को सूर्य की सबसे बाहरी परत के ऑब्जर्वेशन के लिए तैयार किया गया है।

इसरो ने बताया कि आदित्य L1 को PSLV XL रॉकेट के जरिए 2 सितंबर को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से सुबह 11 बजकर 50 मिनट पर लॉन्च किया जाएगा। फिर ये करीब 4 महीने में पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर लैगरेंज पॉइंट-1 यानी L1 पॉइंट तक पहुंचेगा। इसमें यूज 7 पेलोड के बारे में भी हम आगे आपको विस्तार में बताएंगे। लेकिन पहले इसरो के इस मिशन के उद्देश्य को जान लेते हैं

आदित्य एल-1 का मेनली सूरज के कोरोना से निकलने वाली गर्मी की स्टडी करेगा। ये सौरमंडल को समझने का प्रयास करेगा। सौर हवाओं के विभाजन और तापमान की स्टडी करेगा। सौर तूफानों के आने की वजह, सौर लहरों और उनका धरती के वायुमंडल पर क्या असर होता है, इसकी स्टडी करेगा। आदित्य एल -1 की मदद से रियल टाइम सोलर एक्टिविटीज और अंतरिक्ष के मौसम पर भी नजर रखी जा सकेगी। 

आदित्य स्पेसक्राफ्ट, L1 पॉइंट के चारों ओर घूमकर सूर्य पर उठने वाले तूफानों को समझेगा। इसके अलावा मैग्नेटिक फील्ड और सोलर विंड जैसी चीजों की स्टडी करेगा। साथ ही सौर तूफान से धरती को कई तरह के नुकसान की आशंका और सूरज की वजह से बनते और बिगड़ते अंतरिक्ष के मौसम जैसी महत्पूर्ण जानकारी भी मिलेगी। इन्हीं उद्देश्य को पूरा करने के लिए आदित्य एल-1 में 7 पेलोड लगाए गए है।

इसमें पहला विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (VELC) है, इसे भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान, बेंगलुरु में बनाया गया है। जिसकी क्षमता कोरोना/ इमेजिंग और स्पेक्ट्रोस्कोपी की है। फिर सोलरअल्ट्रा-वायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (SUIT) पेलोड है, इसे इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (IUCAA), पुणे में विकसित किया गया है। इसकी क्षमता फोटोस्फीयर और क्रोमोस्फीयर इमेजिंग- नैरो और ब्रॉडबैंड है। इसी के साथ आदित्य सोलर विंड पार्टिकल एक्सपेरिमेंट (ASPEX), इस पेलोड को भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद में विकसित किया गया है। जिसकी क्षमता सॉफ्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर है।

साथ ही HEL1OS, इसे यूआर राव सैटेलाइट सेंटर, बेंगलुरु में विकसित किया गया है। जिसकी क्षमता हार्ड एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर है।वहीं आदित्य सोलर विंड पार्टिकल एक्सपेरिमेंट (ASPEX), इस पेलोड को भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला अहमदाबाद में विकसित किया गया है। अपने नाम की वजह से सुर्खियो में मौजूद में प्लाज्मा एनालाइजर पैकेज फॉर आदित्य (PAPA), जिसे अंतरिक्ष भौतिकी प्रयोगशाला विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम में विकसित किया गया है। PAPA और ASPEX की क्षमता एक सामान है। वहीं आखिर में 3 डायमेंशन रिज़ॉल्यूशन डिजिटल मैग्नेटोमीटर, इस इलेक्ट्रो ऑप्टिक्स सिस्टम को बेंगलुरु में विकसित किया गया है। इन पेलोड की मदद से अंतरिक्ष में सूर्य का अध्ययन किया जाएगा, इसमें पहले चार पेलोड रिमोट सेंसिंग भी हैं। 

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