इंडिया का न्यूक्लियर सबमरीन प्लान क्या है ? जिसके तहत नेवी के पास होंगी 6 न्यूक्लियर सबमरीन

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इंडियन नेवी में बीते कुछ सालों में कई सबमरीन शामिल हुई हैं। इनमें से 6 कलवरी क्लाॅस अटैक डीजल इलेक्ट्रिक सबमरीन हैं। जिन्हें फ्रांस की मदद से देश में ही तैयार किया गया है। लेकिन अभी न्यूक्लियर पाॅवर से चलने वाली सिर्फ दो ही सबमरीन इंडिया के पास हैं,लेकिन अगले दो सालों में इनकी संख्या न सिर्फ बढने वाली है बल्कि इंडिया जिस टाॅप सीक्रेट मिशन पर लगा हुआ है। उसके पूरा होने से समुद्र में नेवी को एक फोर्स मल्टी प्लायर मिल जाएगा। जोकि जंग के हालात में गेम चेंजर साबित होगा। हम बात कर रहे हैं इंडिया के इंडिजिनस न्यूक्लियर सबमरीन प्रोग्राम की। जिसके तहत अगले साल तक भारत को उसकी दूसरी स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन मिलने वाली है। अरिहंत क्लाॅस की इस दूसरी सबमरीन के सी ट्राॅयल भी शुरू हो गए हैं। इन्हें विशाखापत्तनम में बनाया जा रहा है। 2015 में भारत सरकार ने न्यूक्लियर मिसाइल डेवलपमेंट के टाॅप सीक्रेट प्रोजेक्ट को ग्रीन सिग्नल दिया था। जिसके तहत भारत 6 न्यूक्लियर सबमरीन तैयार कर रहा है। भारत का ये न्यूक्लियर सबमरीन प्रोग्राम कितना अहम है और  रणनीतिक व मानसिक तौर पर दुश्मन देशों के लिए यह कितना खतरनाक हो सकता है।

 

जमीन, आकाश और समुद्र इन तीनों ही जगहों पर भारत की सुरक्षा के लिए इंडियन आर्मी, एयरफोर्स और नेवी की ताकत बढाने को भारत सरकार ने बड़े कदम उठाए हैं। नए फाइटर जेट हो टैंक, तोपे या फिर हेलीकाॅप्टर यहां तक कि भारी भरकम एयरक्राफ्ट करियर भी, मोदी सरकार आने के बाद बीते 9 सालों में सेनाओं को काफी कुछ मिला है। इन सबके बीच एक चीज की बात बेहद कम हुई वह है सबमरीन की। इंडियन नेवी के पास मौजूदा दौर में चीन के मुकाबले सबमरीन की कमी है। हाल में जो सबमरीन नेवी में शामिल भी हुईं वह डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हैं। जिनकी बेहद सीमित क्षमता है।

 नेवी के पास अभी कुल 16 सबमरीन हैं। इनमें से सिर्फ दो न्यूक्लियर पाॅवर से चलने वाली सबमरीन है। एक है स्वदेशी अरिहंत और दूसरी रशिया से लीज पर ली गई अकूला क्लास सबमरीन चक्र।

 

समुद्र में नेवी का प्रभुत्व बढाने में न्यूक्लियर समबरीन का अपना अलग ही रोल होता है। बीते कुछ सालों में भारत ने दो बेहद अहम क्षमताओं को हासिल किया है। जोकि विश्व के बेहद चुनिंदा देशों के पास है। भारत सब सरफेस बैलिस्टिक न्यूक्लियर सबमरीन यानी एसएसबीएन को डिजाइन कर बना भी सकता है और उसके पास सबमरीन से न्यूक्लियर वाॅरहेड ले जाने में सक्षम बैलिस्टिक मिसाइल को लांच करने की क्षमता भी है।

 

अक्टूबर 2022 में भारत ने आईएनएस अरिहंत से 3500 किमी दूर तक मार करने वाली के-4 मिसाइल का सफल परीक्षण किया था।

 

अब बात करते हैं भारत के स्वदेशी न्यूक्लियर सबमरीन प्लान की। इंडियन नेवी आम तौर पर रशिया से लीज पर ली गई न्यूक्लियर सबमरीन का प्रयोग करता रहा है।

मौजूदा दौर में नेवी के पास अकूला क्लास की एक न्यूक्लियर सबमरीन चक्र-2 है। वहीं 10 साल के लिए चक्र-3 सबमरीन भी 2025 तक लीज पर भारत को रशिया से मिल सकती है। नेवी के पास कम से कम 6 न्यूक्लियर पाॅवर सबमरीन हो भारत सरकार का ऐसा इरादा है।

 

 एचटी की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2015 में भारत सरकार ने एक टाॅप सीक्रेट प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी। जिसके तहत विशाखापत्तनम में डीआरडीओ, डिपार्टमेंट आफ एटामिक एनर्जी और इंडियन नेवी कम से कम तीन न्यूक्लियर सबमरीन का निर्माण करेंगी। 2017 में एस-3 नाम से अरिहंत क्लाॅस की दूसरी न्यूक्लियर सबमरीन पर काम शुरू हुआ। जिसके अब सी ट्राॅयल शुरू हो गए है। आईएनएस अरिहंत की तरह ही एस-3 सबमरीन भी 6000 टन ही है। जिसका नाम आईएनएस अरिघात है। इसके अलावा दिसंबर 2021 में एस-4 नाम से एक और न्यूक्लियर पाॅवर्ड सबमरीन का निर्माण शुरू हो गया। ऐसा माना जा रहा है कि यह बाकी दोनों सबमरीन से बड़ी है। इसके बड़ा होने की वजह बताई गई है कि इसमें आईएनएस अरिहंत व अरिघात के मुकाबले ज्यादा वर्टिकल मिसाइल लांच टयूब हैं।

 

अब जानते हैं कि न्यूक्लियर सबमरीन कंवेंशनल डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन से कितनी बेहतर होती हैं?

 

दरअसल न्यूक्लियर सबमरीन अंडरवाॅटर न्यूक्लियर रियेक्टर से मिलने वाली शक्ति से चलती है। ऐसे में यह महीनों तक समुद्र के अंदर रह सकती है। इसमें एक बार न्यूक्लियर ईधन पड़ने के बाद सालों देाबारा ईधन डालने की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसे में यह कितनी ही दूरी पर दुश्मन के पता चले बगैर जा सकती हैं। जबकि डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों में आक्सीजन व अन्य जरूरतों के लिए समय समय पर सरफेस पर आना पड़ता है। न्यूक्लियर सबमरीन में शार्ट और लांच रेंज मिसाइल लांच भी की जा सकती है। यही वो क्षमता है जो न्यूक्लियर सबमरीन को समुद्र में गेमचेंजर बना देती है। भारत के अलावा यह क्षमता अमेरिका, रशिया, चीन जैसे देशों के पास ही है। पनडुब्बियों से लांच की जाने वाली कई मिसाइलों को भी डीआरडीओ ने तैयार किया है। इसमें से के-4 और के-15 मिसाइलें अहम हैं। यह देानों ही न्यूक्लियर लांच बैलेस्टिक मिसाइल यानी एसएलबीएम हैं।

के-4 मिसाइलें - 3500 किमी तक मार करने और न्यूक्लियर वाॅर हेड डिलीवर करने में समक्ष होती हैं।

 

के-15 मिसाइल- 750 किमी तक मार करने में सक्षम है

 

आईएनएस अरिहंत में 4 के-4 मिसाइलें और 12 के-15 मिसाइलें ले जाने की क्षमता है।

 

 

 

दरअसल भारत अपने न्यूक्लियर सबमरीन प्रोग्राम के जरिए चीन और पाकिस्तान दोनों को ही डिटरेंस मैसेजिंग भी कर रहा है। एक ओर चीन की तरफ से जहां अंडरवाॅटर ड्रोन अटैक का खतरा हमेशा से रहता है वहीं हिंद-प्रंशात महासागर रीजन में चीन अपने एयरक्राफ्ट करियर को भी भेजता है ऐसे में चीनी सेना को भारत की ओर से इन सबमरीन के जरिए स्पष्ट संदेश है कि भारत किसी भी तरह के खतरे से निपटने और हमला होने की सूरत में दुश्मन को तबाह करने की क्षमता रखता है। 

 

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