भारत अधिनायकवादी सरकार के मामले में नंबर वन, प्यू रिसर्च के इस नतीजे के मायने क्या हैं?

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अब जब देश में लोकसभा चुनाव होने में कुछ ही दिन बाकी हैं, तब प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट आई  है। जो ये बताती है कि इंडिया में इलेक्शन में तो लोगों की दिलचस्पी है, लेकिन डेमोक्रेसी पर रुझान उतना ही कम... और ऑटोक्रेसी को लेकर लोगों में क्रेज बढ़ने लगा है।
दरअसल अमेरिकी थिंक टैंक, प्यू रिसर्च सेंटर ने 24 डेमोक्रेटिक कंट्रीज़ का एक सर्वे जारी किया है, जिसने उन्होंने लोकतंत्र के सबसे पसंदीदा सिस्टम होने के बावजूद ऑथोरिटेरियनिज्म यानि अधिनायकवाद के हावी होने की बात कही है। सर्वे में शामिल 24 देशों में औसतन 77% लोगों ने कहा कि रिप्रेजेन्टेटिव डेमोक्रेसी गवर्नमेंट का एक अच्छा सिस्टम है, जो किसी भी और ऑप्शन से बेहतर है। लेकिन वहीं 59% लोगों का ये भी कहना था कि वो अपने देश के लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से नाखुश थे।
प्यू रिसर्च सेंटर का ये एनालिसिस इंडिया, यूएस, कनाडा, फ्रांस, जापान, साउथ कोरिया , इजरायल और साउथ अफ्रीका जैसे 24 देशों में डेमोक्रेसी और पॉलिटिकल रिप्रेजेन्शेसन यानि की राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बारे में पब्लिक ओपिनियन पर बेस्ड है। लॉन्ग टर्म ट्रेंड और डेटा के बेसेस पर इस एजेंसी ने डेमोक्रेसी को लेकर लोग कितने सेटिस्फाई हैं इस पर स्टडी किया है। और करीब 18 देशों में विचारधारा के बारे में भी सवाल किया गए जिसमें सामने आया कि ज्यादातर लोग सेंटर और सेंटर लेफ्ट लोगों के कंपेरीजन में राइट विंग यानी दक्षिण पंथी लोगों में ऑथोरिटेरियन सिस्टम को सपोर्ट करने की संभावना ज्यादा मिली। एक्जाम्पल के लिए, राइट विचारधारा के देश साउथ कोरिया में 49 फीसदी लोग सत्तावादी व्यवस्थाओं यानि कि  ऑथोरिटेरियन सिस्टम को सपोर्ट करने की संभावना लेफ्ट विचारधारा के 28 फीसदी लोगों के कंपेरिटिव दोगुनी है।
भारत के बारे में बात करें तो प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक यहां एक स्ट्रॉन्ग लीडर के लिए सपोर्ट काफी बढ़ा है. इसके अलावा सबसे ज्यादा खटकने वाली जो बात इस रिपोर्ट में है, वो ये कि इंडिया, ऑथोरिटेरियन सरकार यानी गवर्नेंस का ऐसा सिस्टम जिसमें डिसीजन मेंकिग जैसी सारी पॉवर एक ही परसन के हाथ में रहती हैं। उसके लिए इंडिया हाई लेवल के सपोर्टर वाले कंट्री के तौर पर सामने आया है। यहां  सर्वे में शामिल 67% लोगों ने इसे एक बेहतर सिस्टम बताया। हालांकि जब साल 2017 में यही सवाल प्यू ने इंडिया में पूछा था तो 55% लोगों ने इसका सपोर्ट किया था। यानी ऑथोरिटेरियन गवर्नमेंट के लिए 7 सालों में सीधे-सीधे 12 परसेंट की बढ़ोतरी इंडिया में देखने को मिल रही है।
क्या ये बदलाव अचानक हुआ है या इसकी जड़ों को सालों से सींचा जा रहा था?
प्यू रिसर्च सेंटर की ये रिपोर्ट उस वक्त आई है जब दुनियाभर के 50 देशों में चुनाव होने हैं। दुनियाभर में साफ तौर पर राइट विंग की ओर रुझान देखा जा सकता है, फिर चाहे वो मेक्सिको हो, अमेरिका या अपना देश भारत... इस सर्वे के मुताबिक, एक मजबूत नेता मॉडल का सपोर्ट खास तौर पर कम पढ़े लिखे लोगों और कम आय वाले लोगों के बीच कॉमन है। किसी मजबूत नेता के शासन का समर्थन करने की संभावना अक्सर लेफ्ट की ओर झुकाव रखने वाले लोगों की तुलना में वैचारिक रूप से दाईं ओर के लोगों की ज्यादा होती है।
अब बात करते हैं ऑटोक्रेसी पर... लेकिन उससे पहले ये जान लेते हैं कि ऑटोक्रेसी एक्चुअली में होती क्या चीज है।
ऑटोक्रेसी एक ऐसी सरकार है, जहां एक मजबूत नेता अदालतों या संसदीय दखल के बिना निर्णय ले सकता है। साल 2017 के बाद से इस तरह की सरकार का समर्थन 22 में से आठ देशों में बढ़ा है। इन आठ देशों में सभी तीन लैटिन अमेरिकी देशों के साथ-साथ केन्या, भारत, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और पोलैंड शामिल हैं। ये तो बात हो गई सर्वे रिपोर्ट की... अब खास तौर पर भारत के कॉन्टेक्स्ट में ऑटोक्रेसी पर बात करते हैं।
जॉर्ज ऑरवेल का कहना था कि हर समाज को वैसा ही नेता मिलता है जैसा वो खुद होता है। यही बात भारत पर भी लागू की जा सकती है। भले ही अमेरिकी थिंक टैंक की रिपोर्ट में सत्तावादी सरकार को लेकर सोच में रुझान बढ़ता हुआ दिखाया गया हो, मगर ये हमेशा से भारत में था। अगर आप नरेंद्र मोदी की इस तरह की व्यवस्था के संकेत रेखांकित करते हुए पीछे बढ़ते जाएंगे तो रास्ते में आपको संविधान सभा भी मिल सकती है।
जब संविधान सभा में मूल अधिकारों को लेकर बहस चल रही थी तब कम्यूनिस्ट नेता सोमनाथ लाहिड़ी ने कहा था कि ऐसा लगता है मानो ये किसी पुलिस कांस्टेबल के नजरिए से तैयार किया गया है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा था कि ये लोग अंग्रेजों से भी ज्यादा पॉवर अपनी सरकार में चाहते हैं।
इतिहासकारों की मानें तो, सरकार की सत्ता को मजबूत करने के लिए नेहरू सरकार के वक्त से ही कुछ एक्सपेरिमेंट किए गए। चाहें वो संविधान के आर्टिकल 2 और 3 की मदद से किसी भी राज्य को बनाना और विखंडित करने की पॉवर हो, या फिर आर्टिकल 356 के अकॉर्डिंग राष्ट्रपति शासन लगाने की ताकत... नेहरू सरकार में 9वीं अनुसूची लेकर इस बात का ध्यान रखा गया कि केंद्र के किसी ख़ास कानून पर न्यायपालिका की नजर ना पड़ जाए। फिर भी जनता नेहरू के गुणगान कर रही थी। इंदिरा गांधी के दौर में तो आपातकाल जैसी त्रासदी का देश को सामना करना पड़ा, मगर आज भी आप कई लोगों को उनकी तारीफों के पुल बांधते देख सकते हैं। ये सब अपने आप नहीं हुआ बल्कि सरकार और जनता के कुछ धड़े, दोनों ओर से इस तरह की व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया।  
सोचने वाली बात है कि गठबंधन के दौर में केंद्रीय स्तर पर जनता के अधिकारों का ग्राफ ऊपर चढ़ता जा रहा था। इसपर ब्रेक आकर लगा साल 2014 में जब देश की जनता ने नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार को पूर्ण बहुमत से चुनकर भेजा और उसके बाद से जनता पीएम मोदी पर लगातार भरोसा जता रही है। लेकिन ये कहना ठीक नहीं होगा कि देश की जनता में अधिनायकवाद पीएम मोदी की वजह से आया है। हां ये जरूर है कि उन्होंने अधिनायकवाद के फल खाए मगर इसके बीज देश की स्थापना के साथ ही बोए जा चुके थे। आज नरेंद्र मोदी जनता के चहेते हैं, कल शायद कोई और हो मगर इस अधिनायकवाद की भीड़ के ख़त्म होने में अभी लंबा इंतजार करना होगा।

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