इंदिरा गांधी के दौर में बाबा धीरेंद्र ब्रम्हचारी का दिल्ली में चलता था सिक्का !

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इन दिनों बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री चर्चा में छाए हुए हैं। इनके चमत्कार को देख सभी हैरान है तो हमें भी इन्हीं के नाम के एक और बाबा याद आ गए। जो दिल्ली की पॉश फ्रेंड्स कॉलोनी की ए-50 नंबर की आलीशान कोठी में रहता, चंद मिनटों के दर्शन के लिए उसकी कोठी में दिनभर नेताओं, अभिनेताओं, बड़े उद्योगपतियों की लाइन लगी रहती थी। आज कहानी बाबा धीरेंद्र ब्रम्हचारी की जो तब दिल्ली को अपने अंगुलियों पर नचाता था, जब उस दौर में इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर महिला देश की प्रधानमंत्री थीं।

धीरेंद्र ब्रह्मचारी के बारे में जानने से पहले एक छोटी से कहानी। ग्रिगोरी रासपुतिन जो एक रूसी वैद्य, जोगी और तांत्रिक था। जिसकी आंखों में गज़ब का सम्मोहन था। रूस की महारानी एलेक्जेंड्रा तक उसके चर्चे पहुंचे। राजकुमार उन दिनों बीमार थे। रासपुतिन को बुलाया गया और उसने राजकुमार को एकदम ठीक कर दिया तब रूसी शाही परिवार में उसकी तूती बोलने लगी। उसकी सलाह के बिना रूसी सम्राट कोई फैसला नहीं करते। इसी रासपुतिन के कारण अंत में रूस का जार साम्राज्य तबाह हुआ। बिहार के मधुबनी ज़िले के छोटे-से गांव चानपुरा बासैठ का रहने वाला बाबा धीरेंद्र ब्रह्मचारी का भी समय के साथ ब्रह्मचारी का सम्मोहन बढ़ता गया। लोग इसे 'भारतीय रासपुतिन' कहने लगे। 

कहानी शुरू होती है साल 1924 से, बमभोल चौधरी के घर  धीरेंद्र का जन्म होता है। 12-13 साल की उम्र में धीरेंद्र घर से भाग कर लखनऊ पहुंचता है कई साल तक भटकने के बाद वहां गोपाल खेड़ा आश्रम में महर्षि कार्तिकेय से योग की शिक्षा ली। और धीरेंद्र बन गया योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी। योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी का रुतबा बढ़ा तो जवाहरलाल नेहरू भी योग सीखने लगे। नेहरू के बाद जब इंदिरा प्रधानमंत्री बनीं तब उनको भी धीरेंद्र ब्रह्मचारी योग सिखाने लगा। इंदिरा ने योग सीखने का जिक्र अमेरिका के फेमस फोटोग्राफर डोरोथी नॉर्मन को लिखे गए एक लेटर में किया है। अमेरिका की लेखक कैथरीन फ्रैंक ने भी अपने संस्मरणों में इसका उल्लेख किया है।

ब्रह्मचारी ने जम्मू, कटरा, मानतलाई और दिल्ली में विशाल आश्रम बनवाए। नई दिल्ली के गोल डाकखाना इलाके़ में विश्वायतन योगाश्रम खोला। सरकारी ग्रांट के साथ विश्वायतन संस्था को रियायती ज़मीन मिली।

आईबी के पूर्व संयुक्त निदेशक मलयकृष्ण धर की किताब 'ओपन सीक्रेट' के मुताबिक इंदिरा को ब्रह्मचारी पर बड़ा विश्वास था। धीरेंद्र ब्रह्मचारी भी इंदिरा गांधी को हर संकट से बचा कर रखना अपना फर्ज समझते थे।

साल 1975-77 के आपातकाल के दौर में ब्रह्मचारी के हाथ में अप्रत्यक्ष सत्ता थी। आपातकाल के बाद हुए चुनाव में इंदिरा हार गईं, लेकिन तीन साल बाद फिर सत्ता में वापसी की। 14 जनवरी 1980 को वो फिर प्रधानमंत्री बनीं। ब्रह्मचारी का सिक्का भी फिर चलने लगा। 23 जून 1980 को संजय गांधी ने दिल्ली के सफदरजंग एयरपोर्ट से 'पिट्स S2' विमान से उड़ान भरी। ये विमान हादसे का शिकार हो गया। संजय गांधी जिस 'पिट्स S2' विमान को उड़ा रहे थे, उसका मालिक धीरेंद्र ब्रह्मचारी ही था।

संजय गांधी की मौत के बाद मेनका से भी इंदिरा की अनबन हो गई। अब धीरेंद्र ब्रह्मचारी ही इंदिरा का संबल थे। कई लेखकों ने जिक्र किया है कि धीरे-धीरे इंदिरा पर इस योगी का प्रभाव इतना बढ़ गया कि वो उनके प्रधानमंत्रित्व काल में देश के राजकाज में भी दखल देने लगा। लेकिन, 30 अक्टूबर 1984 को इंदिरा की हत्या के बाद ब्रह्मचारी के सितारे गर्दिश में आ गए। और दिल्ली ने उनसे दूरियां बना लीं। फिर अगले आठ साल उनके लिए गुमनामी के अंधेरे थे। फिर वो नया सपना लेकर मानतलाई आश्रम लौटे।

मानतलाई को नया सिंगापुर बनाना चाहते थे, जिसमें पांच हज़ार फुट लंबी, दो हज़ार फुट चौड़ी और 15 फुट गहरी झील, पांच हज़ारों कारों के लिए पार्किंग, मोनो रेल, घूमने वाला रेस्तरां, स्कूल-कॉलेज आदि होते। ध्यान के लिए लंबी सुरंग होती। सुरंग के मुहाने पर तैनात करने के लिए भालू के दो बच्चे पाल रखे थे उन्होंने। लेकिन, आज न ही वह सपना रहा और न ही वो साम्राज्य। पूरा आश्रम खस्ता हाल है। वहां की हवाईपट्टी, वॉच टावर, सबकुछ कबाड़ बन चुका है। उस जगह को पर्यटन विभाग को सौंपा गया था, पर अभी तक कुछ हुआ नहीं है।

इसी तरह जम्मू में स्थित अपर्णा आश्रम का सरकार ने अधिग्रहण कर लिया। वहां अब फूड क्राफ्ट इंस्टिट्यूट है। हरियाणा के आश्रम में ज़मीन को लेकर झगड़े चल रहे हैं। वहीं, दिल्ली का आश्रम अब मोरारजी देसाई नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ योगा बन चुका है।

यूं मानो धीरेंद्र ब्रह्मचारी का पूरा साम्राज्य ही ढह गया।

एक संयोग ही कहेंगे संजय गांधी का प्लेन हादसे का शिकार हुए। धीरेंद्र ब्रह्मचारी की भी 9 जून 1994 को एक प्लेन हादसे में मौत हो गई।

कहते हैं कि 'शून्य से शून्य घटाओ तब भी शून्य ही बचता है और जोड़ो तब भी शून्य ही होता है।' धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने भी शून्य से सफर शुरू किया था, जो फिर से शून्य पर जा पहुंचा।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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