Jai Gurudev : जिनकी बेशुमार दौलत का उत्तराधिकारी बनने के लिए हुआ था विवाद

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कितने मजहब, धार्मिक संप्रदाय, साधु-महात्मा, पीर-फकीर, औलिया सबका दरवाजा खटखटाया। किसलिए? परमात्मा को पाने के लिए। कब बचपन निकल गया और कब जवानी। कुछ होश ही नहीं। आखिर जब गुरु मिले तब परमात्मा का अहसास हुआ। गुरु के दिखाए हुए मार्ग पर चले तो खुद जय गुरु देव बन गए। चुनाव लड़ा। जेल गए। लोगों की सेवा की। आश्रम बनवाए। 12 हजार करोड़ का साम्राज्य छोड़ गए। आज कहानी जय गुरुदेव की। जिनका उत्तराधिकारी बनने को लेकर विवाद हुआ। कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। दो पुलिसकर्मी शहीद भी हुए।

साल 1896। इटावा के खितोरा गांव में रहने वाले यादव दंपत्ती के घर एक बेटे का जन्म हुआ। जिसका नाम तुलसीदास रखा गया। सात साल की उम्र में तुलसीदास के माता-पिता का निधन हो गया था। लेकिन मां के अंतिम वाक्य तुलसीदास के लिए प्रेरणा बन गए। कि तुम्हें शराब और मांस से दूर रहना है। शादी नहीं करनी है। तुम्हें समाज की सेवा करनी है। तुम परमात्मा की खोज के लिए बने हो।

सालों भटकने के बाद एक वो वक्त आया जब तुलसीदास को मानव जीवन बेकार लगने लगा,  जिंदगी भार बन गई। आत्महत्या का ख्याल आया तब मां की आवाज आई बस थोड़ी-सी और खोज कर लो, मंजिल मिलने वाली है। एक बार फिर वो पूरे जोश के साथ चल पड़े। उस गुरु की तलाश में जो परमात्मा के दर्शन करा सके। आखिर गुरु मिल गए। अलीगढ़ जिले के छोटे से गांव चिरौली में। एक साधारण ब्राह्मण परिवार के पंडित घुरेलाल शर्मा के रूप में। तुलसीदास उनकी शरण में आए और मोक्ष के लिए साधना में लीन हो गए।

साल 1950 संत घूरेलाल ने देह त्याग दी। संत घुरेलाल ने तुलसीदास को प्रेरित किया कि वो उनके विचारों को दुनिया तक पहुंचाएं। तुलसीदास ने साल 1952 में मथुरा में चिरौली संत आश्रम की स्थापना करके अपने मिशन की शुरुआत की।

उन्होंने वाराणसी में पहला प्रवचन दिया। इसके बाद क्या था, उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई। इसी दौरान तुलसीदास को उनके अनुयायी ‘जय गुरुदेव’ के नाम से बुलाने लगे।

साल 1962 में मथुरा में ही आगरा-दिल्ली रोड पर मधुबन क्षेत्र में डेढ़ सौ एकड़ जमीन खरीदी और आश्रम बनवाया। जहां जय गुरुदेव की एक अलग ही दुनिया बस गई।

160 फुट ऊंचे योग साधना मंदिर बनवाया। ये मंदिर-मस्जिद का मिला-जुला रूप लगता था बिलकुल ताजमहल जैसा। इसे बनवाने में 30 साल लगे।

खुद को सुभाष चंद्र बोस का अनुयायी बताने वाले जय गुरुदेव को साल 1975 में आपातकाल के वक्त जेल में बंद किया गया। करीब पौने दो साल बाद वो रिहा हुए। जय गुरुदेव ने ‘दूरदर्शी पार्टी’ बनाकर चुनाव भी लड़ा। लेकिन नहीं जीत पाए।

साल 1977 को जय गुरुदेव धर्म प्रचारक संघ मथुरा ट्रस्ट की स्थापना की। साल 1979 को जय गुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था नाम से जय गुरुदेव योग स्थली आगरा-दिल्ली रोड महोली मथुरा में दूसरा ट्रस्ट बनाया। तीसरा जय गुरुदेव धर्म प्रचारक कोठी मंदिर ट्रस्ट खितौरा इटावा में बनाया गया।

जय गुरुदेव ही तीनों ट्रस्ट के अध्यक्ष थे। ट्रस्ट का अगला अध्यक्ष भी केवल मौजूदा अध्यक्ष यानी जय गुरुदेव ही चुन सकते थे।

18 मई साल 2012 को 116 की उम्र में जय गुरु देव का निधन हो गया। और यहीं से विवाद भी शुरू हो गया। जय गुरुदेव की 13वीं पर भंडारा रखा। और वहीं पंकज कुमार यादव को ट्रस्ट का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। पंकज कभी उनका ड्राइवर हुआ करता था। उसने ही जय गुरुदेव की चिता को मुखाग्नि दी थी। पंकज ने प्रवचन देना शुरू कर दिया।

लेकिन उनके एक अनुयायी उमाकांत तिवारी ने खुद को अध्यक्ष बताकर बाबा उमाकांत तिवारी के नाम से प्रवचन देना शुरू कर दिया।

इसी कड़ी में एक और नाम आया रामवृक्ष यादव का। वो साल 1980 में जय गुरुदेव के संपर्क में आया। साल 2006 में उसके आक्रामक व्यवहार के चलते हुए उसे हटा दिया। तब रामवृक्ष ने स्वाधीन भारत संगठन बनाया। जय गुरुदेव के निधन के बाद अपने समर्थकों के बल पर वो खुद को उनके उत्तराधिकारी के तौर पर देखने लगा। जय गुरुदेव के अनुयायी रामवृक्ष से जुड़ते गए और पौने तीन सौ एकड़ के जवाहर बाग में पूरा गांव बस गया। वो वहां हटने को तैयार नहीं हुआ। जब पुलिस ने सख्ती की तो साल 2016 में मथुरा कांड सामने आया। जिसमें दो पुलिसकर्मी शहीद हो गए और 22 उपद्रवी मारे गए।

देखा जाए उत्तराधिकार के इस पूरे विवाद में कहीं न कहीं जय गुरुदेव की बेशुमार दौलत और उसको पाने का आकर्षण था।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जय गुरुदेव ट्रस्ट के पास करीब 12 हजार करोड़ की संपत्ति थी। बैंकों में 100 करोड़ रुपये जमा थे। जय गुरुदेव की कारों में बीएमडब्ल्यू और मर्सिडीज बेंज समेत 250 कारें शामिल थीं। इनकी कीमत करीब 150 करोड़ रुपये आंकी गई। देश भर में 250 से ज्यादा आश्रम, पेट्रोल पंप, स्कूल थे। जिसे पाने का लालच था।

116 सालों तक कठिन परिश्रम करने वाले जय गुरुदेव ने शिक्षा दी थी कि - अपना काम ईमानदारी और सच्चाई से करो। समाज की सेवा करो। बिना किसी लालच के। भगवान की प्रार्थना करों। ये बात शायद उनके वो लोग भूल गए जो उनका उत्तराधिकारी बनना चाहते थे। वो लोग भूल गए जिनके कंधों पर जय गुरुदेव के विचारों को जन-जन कर पहुंचाने की जिम्मेदारी थी।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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