Jamnalal Bajaj : जन्म से गरीब, किस्मत के अमीर

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सेठ जमनालाल बजाज (Jamnalal Bajaj) एक गरीब किसान के लड़के थे पर किस्मत से अमीर बने। पर उन्हें दौलत से मोह नहीं था।

 

 

गरीब जमनालाल से सेठ जमनालाल बजाज 

04 नवंबर, साल 1889 राजस्थान के रहने वाले एक बेहद गरीब किसान कनीराम और बिरदी बाई के तीसरे बेटे का जन्म हुआ। नाम रखा जमनालाल। एक दिन जमनालाल घर के बाहर खेल रहे थे। तभी वहां से सेठ बच्छराज अपनी पत्नी सादी बाई के साथ गुजरे। सेठ बच्छराज ब्रिटिश राज में एक सम्मानित और रईस व्यापारी थे, जो राजस्थान से महाराष्ट्र में बस गए थे। सेठ बच्छराज ने जब पांच साल के जमनालाल को देखा तो उन्हें अपने पोते के रूप में गोद ले लिया। इस तरह से जन्म से गरीब जमनालाल, किस्मत से अमीर सेठ जमनालाल बजाज बन जाते हैं।

ऐशोआराम छोड़ गांधीजी के आश्रम में रहे

लेकिन कहानी सिर्फ इनती नहीं है। सेठ जमनालाल बजाज किस्मत से अमीर बन तो गए थे पर उन्हें दौलत से मोह नहीं था। उन्होंने वो तमाम ऐशो आराम छोड़ दिए जो लोग सपनों में सोचते होंगे। वो अपना घर छोड़ कर गांधीजी के आश्रम में रहे, समाज सेवा के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और कई बार जेल गए। 

पसंद नहीं था दिखावा

साल 1902, 13 साल की उम्र में सेठ जमनालाल बजाज की शादी जानकी देवी से हुई। वो दो बच्चों के पिता बने। फिर एक दिन उन्होंने इस ऐशोआराम की जिंदगी को छोड़ दिया। दरअसल, उनके लिए ये दौलत मायने नहीं रखती थी। वो फकीर किस्म के इंसान थे और फिर एक ऐसी घटना भी हो गई जिसने आग में घी का काम किया। हुआ यूं किसाल 1906 में सेठ बच्छराज अपने पूरे परिवार के साथ एक शादी समारोह में जा रहे थे। ऐसे में हर कोई चाहता है कि उनका परिवार शाही दिखे। इसी मंशा से उन्होंने जमनालाल से कहा कि 'तुम भी हीरे-पन्नों से जड़ा एक हार पहनकर चलो।' सेठ जमनालाल बजाज को दौलत का दिखावा पसंद नहीं था। इसी वजह से उन्होंने हार पहनने से मना कर दिया। इस बात को लेकर अनबन हुई और 17 साल की उम्र में सेठ जमनालाल बजाज घर छोड़कर चले गए।

'मुझे दौलत से मोह नहीं' 

सेठ जमनालाल बजाज ने एक स्टाम्प पेपर में सेठ बच्छराज को ये लिखकर भी दिया कि 'मुझे आपकी संपत्ति से कोई लगाव नहीं है। मैं कुछ लेकर नहीं जा रहा हूं। तन पर जो कपड़े थे। बस वही पहने जा रहा हूं। आप निश्चिंत रहें। मैं जीवन में कभी आपका एक पैसा भी लेने के लिए अदालत नहीं जाऊंगा। इसलिए ये कानूनी दस्तावेज बनाकर भेज रहा हूं।'

जब गांधीजी को पिता के रूप में गोद लिया 

साल 1921सेठ जमनालाल बजाज स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े। वो सबसे ज्यादा महात्मा गांधी से प्रभावित थे। उनके साथ कई साल रहे। एक दिन उन्होंने गांधीजी के सामने एक प्रस्ताव रख दिया। अपना पिता बनने का। दरअसल, सेठ जमनालाल बजाज, गांधीजी को एक पिता के रूप में अपनाना चाहते थे। साल 1920 में नागपुर में कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान सबके सामने सेठ जमनालाल बजाज ने कहा कि 'मैं गांधीजी को अपने पिता के रूप में गोद ले कर उनका पांचवां बेटा बनना चाहता हूं।'

'योग्य पिता बनने की कोशिश में हूं'

शुरुआत में तो गांधीजी इस बात से हैरान हुए लेकिन बाद में उन्होंने सेठ जमनालाल बजाज को अपना पांचवां बेटा मान ही लिया। 16 मार्च, साल 1922 साबरमती जेल से गांधीजी ने एक चिट्ठी भेजी। लिखा कि, 'जमनालाल, तुम पांचवें बेटे तो बने ही हो, लेकिन मैं योग्य पिता बनने की कोशिश कर रहा हूं।'

उद्योगपति और स्वतंत्रता सेनानी के साथ एक समाजसेवी भी

उधर सेठ बच्छराज का सेठ जमनालाल बजाज से मोह नहीं टूटा। तमाम कोशिशों के बाद जमनालाल बजाज को ढूंढा, उन्हें मनाया और घर लेकर आए। सेठ जमनालाल बजाज घर तो आ गए पर वो दौलत का त्याग कर चुके थे। इसी वजह से जब विरासत में उन्हें संपत्ति मिलीतो उन्होंने उसे दान के रूप में ही खर्च किया। सेठ जमनालाल बजाज - एक उद्योगपति और स्वतंत्रता सेनानी के साथ समाजसेवी भी थे। उन्होंने गरीब परिवार के बेटे-बेटियों की शादियां करवाईं। इस वजह से गांधीजी सेठ जमनालाल बजाज को प्यार से 'शादी काका' भी कहते। 

कारोबार की बागडोर आने वाली पीढ़ी ने संभाली

साल 1941 में जेल से छूटने के बाद सेठ जमनालाल बजाज वर्धा अपने घर आए। जेल में रहने की वजह से उनकी तबीयत खराब रहने लगी थी। एक दिन दिमाग की नस फट गई। 11 फरवरी, साल 1942 सेठ जमनालाल बजाज 52 साल की उम्र में दुनिया छोड़कर चले गए। 20 के दशक में सेठ जमनालाल बजाज ने शुगर मिल के जरिए बजाज ग्रुप की शुरुआत की थी। हालांकि ये तमाम व्यापार उनके बेटों ने संभाले। सेठ जमनालाल बजाज समाज और देश की सेवा में लगे रहे। मौजूदा वक्त में बजाज ग्रुप में 25 से ज्यादा कंपनियां हैं और इन कंपनियों की बागडोर सेठ जमनालाल बजाज की पांचवीं पीढ़ी के हाथों में है।

 

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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