Jawaharlal Nehru : ‘मेरी मौत इतनी जल्दी नहीं होने वाली’

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27 मई, साल 1964 उस दिन देश में शादियों का बड़ा साया था। लेकिन, दोपहर दो बजकर पांच में रेडियो में एक खबर आई। जिसने पूरे देश को हिला दिया। खबर इतनी बड़ी थी अखबारों ने उसी दिन शाम को एक स्पेशल एडिशन निकाला। शाम 4 बजे पीएम हाउस के सामने भीड़ इकट्ठा होने लगी। जिसमें देश के बड़े-बड़े नेता से लेकर आम जनता तक सभी शामिल थे। इससे पहले संसद में कहा गया कि, ‘रोशनी चली गई है’। यानी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का निधन हो गया है। सभी सदमे में थे। उस दिन शादियां तो हुईं लेकिन कहीं कोई बाजा-गाजा नहीं बजा। नेहरू के निधन से सभी इसलिए भी हैरान थे कि इस तारीख से सिर्फ पांच दिन पहले ही नेहरू ने कहा था कि ‘चिंता ना करें, मैं अभी लंबे वक्त तक जिंदा रहूंगा।’

जनवरी का महीना था और साल 1964, जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के भुवनेश्वर अधिवेशन के दौरान जवाहर लाल नेहरू को हार्ट अटैक आया था। इसके बाद से उनकी सेहत लगातार खराब रहने लगी थी।

वरिष्ठ पत्रकार राज कंवर नेहरू के बेहद करीब थे। नेहरू जहां भी यात्रा करते वो ज्यादातर उनके साथ ही रहते। ऐसे ही 23 मई साल 1964 को जवाहर लाल नेहरू देहरादून गए थे। उस दौरान राज कंवर भी उनके साथ थे।

राज कंवर एक लेख में लिखते हैं कि, इस दौरान ‘नेहरू ने अपनी जिंदगी के हर पल को बेहद सादगी के साथ बिताया। वो देहरादून के सर्किट हाउस के मैदान में टहलते हुए अपने पसंदीदा कपूर के पेड़ के नीचे घंटों चुपचाप बैठे रहे। उन्हें देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगा कि, जिस इंसान के साथ हम समय बिता रहे हैं। वो कुछ दिनों बाद इस दुनिया को अलविदा कह जाएगा।’

नेहरू 16 साल 9 महीने और 12 दिन भारत के प्रधानमंत्री रहे, जो आज तक रिकॉर्ड है। इस दौरान उन्होंने कभी भी अपने उत्तराधिकारी के बारे में कोई संकेत नहीं दिए।

यहां तक कि उनके निधन से 5 दिन पहले उनसे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया : - 

'मैंने उत्तराधिकारी के बारे में सोचना तो शुरू किया है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि, मेरी मौत इतनी जल्दी होने वाली है।'

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के अगले दिन वो चार दिन के लिए देहरादून चले गए। दरअसल जबसे उन्हें हार्ट अटैक आया था। इसके बाद से उनकी सेहत खराब रहने लगी थी। इसी वजह से वो चार दिन की छुट्टी पर देहरादून गए थे। 26 मई की रात करीब आठ बजे वो दिल्ली पहुंचे। यहां से सीधे प्रधानमंत्री हाउस गए। देहरादून से दिल्ली के लिए शाम 04 बजे उड़ान भरी। 26 मई को इसलिए वो दिल्ली के लिए लौटे थे ताकि रात भर आराम कर सकें।

दरअसल, नेहरू ने 27 मई से लोकसभा का 7 दिनों का विशेष सत्र बुलाया था, जिसमें वें खासतौर से कश्मीर और शेख अब्दुल्ला को लेकर लोकसभा में कुछ सवालों के जवाब देने वाले थे। अपनी निधन से एक दिन पहले देहरादून से दिल्ली वापस जाते समय नेहरू ने सभी का हाथ जोड़कर अभिवादन किया। किसी को मालूम नहीं थी कि ये उनकी और नेहरू की आखिरी मुलाकात होगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुबह करीब 6.30 बजे उन्हें पहले पैरालिटिक अटैक आया और फिर हार्ट अटैक। इसके बाद वो अचेत हो गए। इंदिरा गांधी के फोन के बाद तीन डॉक्टर पीएम हाउस पहुंचे। अस्पताल में भर्ती कराया गया आठ घंटे कोमा रहने के बाद पंडित नेहरू का निधन हो गया।

दोपहर 2 बजे तत्कालीन इस्पात मंत्री सी. सुब्रमण्यम संसद पहुंचे। उन्होंने भरी संसद में दबे स्वर में सिर्फ इतना कहा,  'रोशनी चली गई।' जिसके बाद नेहरू के निधन की आधिकारिक घोषणा कर दी गई।

इसके बाद ये खबर आग की तरह पूरी दुनिया में फैल गई। इसके बाद शुरू हुई पंडित नेहरू के उत्तराधिकारी की खोज, क्योंकि नेहरू खुद इस बारे में जीते जी कुछ नहीं कह गए थे।  महज दो घंटे बाद नेहरू सरकार के गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बना दिया गया। और पंडित नेहरू के निधन के 13 दिन बाद लाल बहादुर शास्त्री ने देश के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 27 मई 1964 को नेहरू की अंतिम यात्रा के दौरान करीब ढाई लाख लोगों की भीड़ इकट्ठा हुई। उनका हिंदू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार किया गया।

अपने निधन से पांच दिन पहले ये कहने वाले कि, ‘मेरी मौत इतनी जल्दी नहीं होने वाली।’ इस बात को अगर गौर से सुनें तो शायद आज भी नेहरू मरे नहीं। उनका जिक्र कहीं न कहीं आ ही जाता है, शायद इसलिए की वो देश के पहले प्रधानमंत्री रहे हैं।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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