जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ : जब पाकिस्तान के एक तानाशाह को मिली फांसी की सजा

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जुलाई का महीना और साल 1999। एक रात 1:30 बजे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के फोन की घंटी बजती है। फोन की दूसरी तरफ थे अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन। जो अटल जी रिक्वेस्ट करते हैं कि आप कारगिल के युद्ध को विराम कर दें।

अटल जी का जवाब था – ‘कारगिल की जंग पाकिस्तान ने शुरू की है। मातृभूमि की रक्षा के लिए हमारे देश के जवान पीछे नहीं हटेंगे। हां, पाकिस्तान चाहे तो वो युद्ध बंद कर दे। हमें किसी बात की परवाह नहीं।

आज किस्सा दिल्ली में पैदा हुए पाकिस्तानी सेना के जनरल वहां के राष्ट्रपति और तानाशाह कहलाए परवेज़ मुशर्रफ़ का जिसने साल 1965 और साल 1971 की जंग में हार का बदला लेने के लिए साल 1999 में कारगिल में घुसपैठ की और हार के बाद अपनी ही सरकार का तख्ता पलट कर दिया। परवेज़ मुशर्रफ़ की अब मौत हो चुकी है। हिंदुस्तान में कब्जे का ख्वाब देख रहा ये तानाशाह पाकिस्तान की मिट्टी में भी दफन हो पाएगा क्योंकि पाकिस्तान कोर्ट ने भी उसे गद्दार माना था।

एक समय पाकिस्तान को इशारे में चलाने वाले जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ पाकिस्तान नहीं बल्कि साल 1943 में भारत की राजधानी दिल्ली के दरियागंज में पैदा हुए। साल 1947 में बंटवारे के वक्त परवेज़ मुशर्रफ़ का परिवार पाकिस्तान आ गया। उनके पिता सईद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में काम करते थे पिता का तबादला तुर्की हुआ तो साल 1949 में मुशर्रफ़ तुर्की चले गए और वहीं तुर्की भाषा सीखी। करीब आठ साल के बाद परिवार फिर से पाकिस्तान लौटा। परवेज़ मुशर्रफ़ स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई करने के बाद सैन्य कमांडर और आर्मी चीफ से लेकर पाकिस्तान का राष्ट्रपति बने।

पाकिस्तान के पूर्व फॉरेन मिनिस्टर खुर्शीद कसूरी की किताब 'नाइदर अ हॉक नॉर अ डव' में लिखा है – 'कारगिल की जंग को लेकर एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के पूर्व पीएम नवाज़ शरीफ़ को फोन किया और इस दौरान अटल जी के साथ थे एक्टर दिलीप कुमार। इसी फोन कॉल से नवाज़ शरीफ़ को कारगिल के युद्ध के बारे में पता चला। अटल जी ने नवाज़ शरीफ़ से बात करने के बाद दिलीप कुमार को फोन दे दिया। 

दिलीप कुमार ने नवाज़ शरीफ़ से कहा - ‘मियां (पाकिस्तान के पूर्व पीएम नवाज़ शरीफ़) साहब हम आपकी तरफ से ऐसी उम्मीद नहीं करते थे, क्योंकि आपने हमेशा कहा है कि आप भारत और पाकिस्तान के बीच शांति चाहते हैं।’

दिलीप कुमार की ये बात सुनकर नवाज़ शरीफ़ को बेहद शर्मिंदा होना पड़ा जिसकी वजह थे परवेज़ मुशर्ऱफ।

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से बातचीत पर बेस्ड पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार सुहैल वड़ाएच ने ‘गद्दार कौन’ किताब लिखी है, जिसमें नवाज़ शरीफ़ ने सुहैल को बताया कि

‘जब कारगिल की जंग हो रही थी। मुशर्रफ़ मेरे पास आए और बोले मामला काफी बिगड़ गया है। हमारी जमीन भारत के कब्जे में जा रही हैं। मुझ पर समस्या का समाधान निकालने का दबाव बनाने लगे। तब मैंने सोचा अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से बात की जाए। मैं क्लिंटन से मिलने अमेरिका गया। उनसे युद्ध रुकवाने के लिए कहा। इसके बाद बिल क्लिंटन ने अटल जी से फोन पर बात की।’

नवाज़ शरीफ़ ने बताया कि 'कारगिल युद्ध छेड़ने पर पाकिस्तान दुनिया के निशाने पर था। उसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा था। युद्ध लड़ने के फैसले पर उसकी बदनामी हो रही थी। युद्ध रुकने के बाद मुशर्रफ़ मुझे गालियां देते थे। मुशर्रफ़ ने सेना में संदेश दिया कि वो कश्मीर लेने गए थे। लेकिन मैंने उन्हें रोक दिया। मैंने परवेज़ मुशर्रफ़ पर कार्रवाई करने के बजाए उन्हें ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। इतनी बड़ी गलती के बाद भी मैंने उन्हें माफ कर दिया।’

इसके बाद परवेज़ मुशर्रफ़ का सिक्का चलने लगा। साल 1999 में तख्तापलट के बाद परवेज़ मुशर्रफ़ पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने। उन्होंने साल 1998 से साल 2001 तक पाकिस्तान की स्टाफ कमेटी के 10वें अध्यक्ष और साल 1998 से साल 2007 तक 7वें शीर्ष जनरल के रूप में काम किया। पाकिस्तान में लेकिन मुशर्रफ़ के खिलाफ इमरजेंसी लगाने और संविधान को निलंबित करने के जुर्म में 2013 में गद्दार का मुकदमा चला जिसमें उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। लेकिन वो पाकिस्तान से भाग गए।

पाकिस्तानी चैनल जियो न्यूज ने मुताबिक परवेज़ मुशर्रफ़ साल 2016 से दुबई में रह रहे थे और अमीलॉइडोसिस नाम की बीमारी से पीड़ित मुशर्रफ का इलाज चल रहा था। बाकी का जीवन पाकिस्तान में बिताने की इच्छा रखने वाले मुशर्रफ़ की 79 साल की उम्र में 05 फरवरी दुबई के एक अस्पताल में मौत हो गई।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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