कारगिल जंग में कैप्टन बत्रा ने पीक नंबर 5140 जीतने के बाद क्या कहा था?

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तारीख- 20 जून 1999

 

वक्त- सुबह 4-35 बजे

जगह- कश्मीर में तोतोलिंग के उत्तर में पीक नंबर 5140

 

कारगिल में कमांडिग ऑफिसर कर्नल योगेश जोशी ने कैप्टन विक्रम बत्रा और लेफ्टिनेंट संजीव जामवाल को तोलोलिंग रीजन में  5140 नंबर पीक को फतह करने की जिम्मेदारी सौंपी।

 

कारगिल युद्ध पर किताब द ब्रेव- परमवीर चक्र स्टोरी की राइटर रचना बिष्ट रावत लिखती हैंA

13 जैक अलाई जो कि विक्रम बत्रा की यूनिट थी] को ये जिम्मेदारी दी गई थी कि वो पीक नंबर 5140 पर कब्जा जमाए पाकिस्तानियों की पोस्ट पर हमला कर उसे फिर से भारत के कब्जे में लाए। कर्नल ने कैप्टन विक्रम और लेफ्टिनेंट संजीव को बुलाया और एक पत्थर के पीछे से उन्हें दिखाते हुए कहा कि वहाँ तुम्हें चढ़ाई करनी है। रात को ऑपरेशन शुरू होगा। सुबह तक तुम्हें वहाँ पहुंचना होगा।

 

इसके बाद उन्होंने दोनों अफसरों से पूछा कि मिशन सक्सेसफुल होने बाद आपका क्या कोड होगा\ ये मिशन दो टीमों को करना था एक टीम की कमान लेफ्टिनेंट जामवाल के पास थी तो उन्होंने कहा सर मेरा कोड होगा ओ ये ये ये। जबकि दूसरी टीम की कमान संभाल रहे विक्रम से पूछा गया कि तुम्हारा कोड क्या होगा तो उन्होंने कहा ये दिल माँगे मोर।

 

वो आगे लिखती हैं कि लड़ाई के बीच में कर्नल जोशी ने वॉकी-टॉकी पर एक इंटरसेप्टेड मैसेज सुना. इस लड़ाई में विक्रम का कोड नेम शेरशाह था।

 

लड़़ाई के दौरान पाकिस्तानी सैनिक उनसे कह रहे थे] शेरशाह तुम वापस चले जाओ] नहीं तो तुम्हारी लाश वापस जाएंगी। उन्होंने सुना कि विक्रम की आवाज थोड़ी तीखी हो गई थी। जवाब में उन्होंने कहा था] एक घंटे रुक जाओ। फिर पता चलेगा कि किनकी लाशें वापस जाती हैं।

 

 इसके बाद रात 3-30 बजे साढ़े लेफ्टिनेंट जामवाल से वो मैसेज सुनाई दिया] ओ ये ये ये] जिससे पता चला कि जामवाल वहाँ पहुंच गए थे। थोड़ी देर बाद 4-35 मिनट पर विक्रम ने भी अपना मिशन सक्सेसफुल होने का मैसेज अपने कोड में दिया और वो कोड था ये दिल मांगे मोर।

 

बाद में ये मैसेज कारगिल जंग में भारतीय सैनिकों के साहस और जीत की भूख का मूल वाक्य बन गया। कारगिल की जंग में कैप्टन विक्रम बत्रा के अहम्य साहस को हमेशा याद किया जाता है। 20 जून 1999 में जीत का ये मैसेज देने के बाद ठीक 17 दिन बाद 7जुलाई 1999 में मश्कोह वैली में एक आपरेशन के दौरान भीषण गोलीबारी के बीच अपने एक साथी अफसर को बचाने के दौरान वह शहीद हो गए। सेना के इस शेरशाह को मरणोपरांत परमवीर चक्र भी दिया गया।

  

विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ. 6 दिसंबर 1997 से उन्होंने सेना में अपना करियर शुरू किया थाA उनकी तैनाती भारतीय सेना की 13वीं बटालियन जम्मू-कश्मीर राइफल्स में हुई. दो साल बाद ही 1999 में वह कारगिल युद्ध के हिस्सा बने.तोलोलिंग की लड़ाई के बाद जिस पीक नंबर 5140 पर सेना ने दोबारा कब्जा किया। उसके बाद से कारगिल युद्ध में भारत ने अपनी पकड़ को और मजबूत कर लिया था। इसी के बाद युद्ध की पूरी दिशा भी बदल गई थी।

कारगिल जंग में जाते वक्त कैप्टन बत्रा ने अपने घरवालों से कहा था कि आउंगा तो तिरंगा लहराकर या तिरंगे में लिपट कर]लेकिन आउंगा जरूर ।

 

 

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