Kaifi Azmi : उठ मेरी जान, मेरे साथ ही चलना है तुझे...

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हैदराबाद के मुशायरे में लंबे कद का दुबला-पतला एक खूबसूरत सा नौजवान शायर अपना कलाम पढ़ रहा था। अपने हाथों के हाव-भाव और आवाज के उतार-चढ़ाव से सुनने वालों को जब चाहे हंसाताजब चाहे रुला देता। अपने अनोखे अंदाज में जब उसने ये कलाम पढ़ा कि –

'उठ मेरी जान, मेरे साथ ही चलना है तुझे

कद्र अब तक तेरी, तारीख ने जानी ही नहीं

तुझमें शोले भी हैं, बस अश्क फ़िशानी ही नहीं

तू हकीकत भी है, दिलचस्प कहानी ही नहीं'

तभी मुशायरा सुन रही एक लड़की ने अपनी सहेली से कहा –

कैसा बद्तमीज शायर है, इसे अदब है, कि नहीं। वो उठ मेरी जान ... कैसे कह सकता है। उसे उठिए मेरी जान... कहना चाहिए। इसके साथ भला कौन सी लड़की उठकर जाने को तैयार होगी?’ 

लेकिन जब लोगों की तालियों के साथ इस शायर का कलाम खत्म हुआ तो वही लड़की ने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला लिया। अपनी सगाई तोड़ दी। घरवालों के लाख समझाने के बाद भी उसी शायर से निकाह किया। आखिर कैफ़ी आज़मी की शायरी और उनकी अदायगी थी ही इतनी लाजवाब कि सभी उनके कद्रदान हो जाते। लेकिन एक वो भी वक्त आया जब कैफ़ी आज़मी एक-एक रुपये के लिए मोहताज हो गए। एक हजार रुपये उधार लेने पड़े। ताकि, पत्नी की डिलीवरी और बच्चे का खर्चा का उठा सकें।

उर्दू के मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली लिखते हैं कि ‘कैफ़ी आज़मी शिया घराने से थे। इस घराने में हर साल मोहर्रम के दिनों में कर्बला के 72 शहीदों का मातम किया जाता। कैफ़ी आज़मी भी इस मातमी जलसों में शामिल होते।

तब 11 साल की उम्र में वे गज़ल लिखते हैं कि – 

‘इतना तो जिंदगी में, किसी की खलल पड़े 

हंसने से हो सुकूं, ना रोने से कल पड़े… 

जिस तरह से हंस रहा हूं मैं, पी-पी के अश्क-ए-ग़म 

यूं दूसरा हंसे तो, कलेजा निकल पड़े’ 

ये गज़ल बेगम अख़्तर की आवाज में पूरे देश में मशहूर हुई।

यूपी के आजमगढ़ में 14 जनवरी साल 1919 में कैफ़ी आज़मी का जन्म हुआ। पूरा नाम अतहर अली रिज़वी। अंदाज विद्रोही था तो किसी न किसी बात को लेकर अक्सर कॉलेज के दिनों में गेट पर हड़ताल करते। वहां अपनी नज़्म पढ़ते।

साल 1944 में 25 साल उम्र में इनकी पहली किताब ‘झंकार’ प्रकाशित हुई। ये किताब बहुत मशहूर भी हुई।

साल 1947 देश आजाद तो हो गया। लेकिन लोग बंटवारे का दंश झेल रहे थे। माहौल ठीक नहीं था। जगह-जगह दंगे फसाद थे। तब कैफ़ी आज़मी लिखते हैं कि---

उसे मैंने ‘जहाक’ के भारी कांधे पे देखा था इक दिन

ये हिंदू नहीं है, मुसलमान नहीं है

ये दोनों के मग्ज़ और खून चाटता है

बने जब ये हिंदू-मुसलमान इंसां

उसी दिन, ये कमबख्त मर जाएगा’

वक्त यूं ही गुजर रहा था कि एक दिन हैदराबाद के एक मुशायरे में फेमस राइटर और एक्ट्रेस शौकत खान ने कैफ़ी आज़मी की नज़्म सुनी और उनको दिल दे बैंठी। अपनी मंगनी तोड़ दी। घर वालों ने लाख समझाया कि कैफ़ी आज़मी खुद बेघर है। खाना-पीना और कपड़ों की भी जरूरत होती है। लेकिन वो फैसले पर अटल रहीं और निकाह कर लिया। 

एक वेबसाइट में छपी खबर के मुताबिक, कैफ़ी आज़मी कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े थे। उस वक्त कैफ़ी अंडरग्राउंड थे। उनके पास इतने भी रुपये भी नहीं थे कि वो शौकत की डिलीवरी करा पाते। शौकत हैदराबाद चली गईं। साल 1950 में बेटी शबाना आज़मी को जन्म दिया। उस वक्त कैफ़ी आज़मी की हालत इतनी खराब थी कि उनकी मदद के लिए फेमस राइटर इस्मत चुगताई ने एक हजार रुपये कैफ़ी आज़मी के पास भिजवाए। ताकि वो बच्ची का खर्च उठा सकें। 

तंगी से निकलने के लिए उन्होंने बॉलीवुड का रुख किया। फिल्मों में गाना लिखना शुरू किया। साल 1951 में पहला गाना फिल्म 'बुजदिल' के लिए लिखा - 'रोते-रोते बदल गई रात...जो सुपरहिट हुआ। फिर 'कागज के फूल', 'हिन्दुस्तान की कसम', 'हंसते जख्म', 'आखरी खत', 'अर्थ' और 'हीर रांझा' जैसी 60 से ज्यादा फिल्मों के लिए गाने लिखे।

शायर निदा फ़ाज़ली एक इंटरव्यू में कहते हैं कि 'वैसे तो कैफ़ी आज़मी कम्युनिस्ट थे, लेकिन दूसरे कम्युनिस्टों की तरह उन्हें नास्तिक कहना मुनासिब नहीं। क्योंकि वो दूसरे कम्युनिस्टों की तरह खुदा को मानने से इंकार नहीं करते थे। वो अपनी शायरी के जरिये बराबरी और आजादी की बात कहते। यही वजह है कि, उनको शोषित वर्ग का शायर भी कहा गया।'

कैफ़ी आज़मी देश के कई जगहों में रहे। लेकिन उनका दिल अपने गांव मिजवां में ही बसता। साल 1973 में ब्रेन हेमरेज से लड़ते हुए जीवन को एक नया दर्शन मिला। बस दूसरों के लिए जीना है। वो अपने गांव मिजवां आ गए। कैफ़ी ने स्कूल, अस्पताल, पोस्ट ऑफिस और सड़क बनवाने में मदद की।

यूपी सरकार ने सुल्तानपुर से फूलपुर सड़क को कैफ़ी मार्ग घोषित किया। 1974 में पद्मश्री से नवाजे गए कैफ़ी आज़मी ने 10 मई साल 2002 को दुनिया से अलविदा कह दिया।

साल 1964 में रिलीज हुई फिल्म 'हकीकत' में लिखे अपने एक गाने की तरह वो चले गए। इसी गाने से उनके पूरे जीवन को समझा भी जा सकता है -

'हुस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे

वो जवानी जो खूं में नहाती नहीं

मरते मरते रहा बांकपन साथियों

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों

कैफ़ी आज़मी को उनकी शायरी और बॉलीवुड में दिए गए उनके योगदान के लिए उन्हें हमेशा किया जाएगा।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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