Kanu Sanyal : किसानों-मजदूरों के लिए पूरी दुनिया से लड़े, खुद 82 साल की उम्र में लगा ली फांसी !

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25 मईसाल 1967, पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में जमींदारों और किसानों के बीच जमीन को लेकर झगड़ा हुआ। इस दौरान पुलिस की गोली से 11 किसानों की मौत हो गई। पूरे प्रकरण के बाद ‘सत्ता बंदूक से निकलती है’ इस आइडियोलॉजी पर यकीन करने वाले नक्सलवाद का जन्म हुआ। इस नक्सलवाद आंदोलन का नेतृत्व कानू सान्याल और उनके साथियों ने किया। आखिर कैसे एक छात्र एक नक्सल बन गया। क्या हालात बने कि, सत्ता के खिलाफ आवाज उठाई पड़ी। जीवन के 14 साल जेल में गुजारे और आखिर क्यों 82 साल की उम्र में उन्होंने आत्महत्या कर ली।  

एक जनवरी साल 1928 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में मिडिल क्लास बंगाली फैमिली में सान्याल का जन्म हुआ। उनके पिता गोविंदा सान्याल कोर्ट में क्लर्क थे।

पत्रकार बप्पादित्य पॉल अपनी किताब 'कानू सान्याल : द फर्स्ट नक्सलमें लिखते हैं कि, बात 25 मार्चसाल 1948 की है जब सान्याल सिलीगुढ़ी में क्लर्क की नौकरी करते थे। उसी दौरान पश्चिम बंगाल सरकार ने CPI  यानी इंडियन कम्युनिस्ट पार्टी पर बैन लगा दिया। तब सरकार कांग्रेस की थी और मुख्यमंत्री बिधान चन्द्र रॉय थे। इस बात ने सान्याल को बहुत प्रभावित और हैरान किया। 

किताब के मुताबिक कानू सान्याल के दिमाग में ‘मेरे दिमाग में ये प्रश्न आया किआखिर आजाद भारत में एक राजनीतिक दल पर बैन क्यों लगाया गयावो भी ऐसे भारत में जो अब अंग्रेजों के पंजे से मुक्त हो चुका है।’

पॉलिटिक्स में रुझान होने के चलते संन्यास ने ‘जन रक्षा समिति’ संगठन ज्वाइन किया और एक जुलूस में शामिल होकर मुख्यमंत्री बिधान चंद्र रॉय के खिलाफ काला झंडा दिखाया। जिसके लिए उनको जेल हुई। जेल में उनकी मुलाकात चारू मजूमदार से हुई। चारू मजूमदार सीपीआई नेता थे। दोनों की दोस्ती हुई।

 

लेकिन विचारों में मतभेद था। चारू पहले बंदूक उठाने की बात करते और सान्याल पहले आंदोलन कर अपनी बातों को सरकार के आगे रखने की बात करते। जेल से निकले और साल 1952 में सान्याल CPI से जुड़े।

चीनी नेता माओ की फिलासफी थी कि 'बंदूक के जोर पर ही सत्ता हासिल की जा सकती है।'

इन विचारों से प्रभावित होकर सान्याल ने चारु मजूमदार और जंगल संथाल के साथ चोरी छुपे चीन की यात्रा की। और वहां पर मिलिट्री ट्रेनिंग ली।

भारत में आजादी के बादकृषि सुधार के रूप में सरकार ने जमींदारी सिस्टम को खत्म कर दिया थालेकिन जमीन का बंटवारा सही तरीके से नहीं किया।

जमींदारी सिस्टम खत्म होने की वजह से नए और अमीर किसान पैदा हो गए। ये वो किसान थे जो गरीबों से अपने खेतों में मजदूरी करवाते। लेकिन उसके साथ अपना हिस्सा साझा नहीं करते। जबकि असल में मेहनत ये मजदूर करते। नतीजा ये हुआ कि जमींदार अमीर होते गए और भूमिहीन मजदूर खाने को भी तरसते रहे। इसको लेकर गरीब किसानों में असंतोष उबल रहा था।

चारू मजूमदारकानू सान्याल और जंगल संथाल ने सीपीआइ से टूट कर बनी सीपीआइ (मार्क्सवादी) ज्वाइन की। गरीब किसान और मजदूरों की आवाज बने। कई आंदोलन किए।    

सान्याल के जीवन को एक नई दिशा मिल चुकी थी। इस आंदोलन को तेजी तब और मिली जब गरीब किसान पर एक जमींदार ने हमला कर दिया।

इस घटना के बाद24 मई, साल 1967 को पुलिसकर्मी नक्सलबाड़ी आए, तो एक भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया। हमले में एक पुलिस अफसर की मौत हो गई। अगले दिनपुलिस और किसानों के बीच झड़प हुई। किसानों की भीड़ उग्र हुई तो पुलिस को गोलियां चलानी पड़ी। जिसमें 11 किसानों की मौत हो गई। इसके बाद सान्याल के नेतृत्व में गांव के लोगों ने विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह में दूसरे राज्यों के किसान भी शामिल हुए। नक्सलबाड़ी गांव में ये घटना होने से इन सभी को नक्सली कहा गया।

साल 1970 में आंध्र प्रदेश और ओडिशा के भू स्वामियों के खिलाफ विद्रोह के आरोप में सान्याल को सात साल की जेल हुई। 1972 में सान्याल ने एक नया संगठन बनाया। 90 के दशक में सीपीआइ (माले) के महासचिव बने। साल 2000 में पॉलिटिक्स से संन्यास लेकर चाय बागान के श्रमिकों के लिए काम करने लगे। 

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2010 में पश्चिम बंगाल स्थित नक्सलबाड़ी में अपने घर पर सान्याल ने 82 साल की उम्र में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। लेकिन क्यों ये बात आज भी रहस्य है।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।