Kidar Sharma : घर से तीन कसमें लेकर निकले फिर बॉलीवुड में रोशन किया अपना नाम

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कभी शराब नहीं छुएंगे, शाकाहारी बने रहेंगे और कभी ऐसी फिल्म नहीं बनाएंगे जिसको परिवार के सभी लोग एक साथ बैठकर न देख सकें। मां को ये तीन कसमें देकर घर से निकले और कोलकाता पहुंचे। गुमान था कि अपनी कलात्मक संवेदना और ज्ञान की वजह से उन्हें न्यू थिएटर में एंट्री मिल जाएगी। एक्टर और डायरेक्टर देवकी बोस से मुलाकात हो जाएगी । लेकिन सब धरा-धरा का रह गया।

न्यू थिएटर के पठान दरबान ने गेट के अंदर तक घुसने नहीं दिया। पता चला कि थिएटर में असिस्टेंट पेंटर की एक नौकरी है। जिसकी 100 रुपये की तनख्वाह है। किसी तरह उनको ये नौकरी पानी थी। खुद पंजाब से थे तो पता चला की पंजाब के दो कलाकार पृथ्वीराज कपूर और कुंदन लाल सहगल पास में ही रहते हैं उनके थियेटर के लोगों से अच्छे संबंध हैं। वे दोनों से मिले और वे ही उन्हें देवकी बोस के पास ले गए। इस तरह से फिल्म डायरेक्ट, स्क्रीनप्लेडायलॉग और सांग राइटर केदार शर्मा की बॉलीवुड में एंट्री हुई। सब कुछ इतना आसान नहीं था घर से साथ में लेकर निकले कई ख्वाबों को पूरा करना था लेकिन उनकी आवाज ने धोखा दे दिया।

12 अप्रैल साल 1910 को पंजाब के नरेला में जन्मे केदार शर्मा ने अमृतसर से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। साल 1933 में डायरेक्टर देवकी बोस की फिल्म ‘पुराण भगत’ देखी तो फिल्मों की दुनिया में खो गए। अब वे हर वक्त फिल्मों में काम करने के सपने देखने लगे। ख्वाबों को पूरा करने कोलकाता गए। उस दौर में फिल्म का प्रोडक्शन का सबसे बड़ा सेंटर कोलकाता ही हुआ करता था। वहां फिल्म डायरेक्टर देवकी बोस से मिले उन्होंने केदार से पूछा की वे क्या क्या काम कर सकते हैं।

केदार शर्मा ने जवाब दिया कि, मैं एक्टिंग कर सकता हूं, गाने लिख सकता हूं, फिल्मों की कहानी भी लिख सकता हूं, आप कोई भी काम दे दें। लेकिन इन कामों के लिए वहां लोगों की जरूरत नहीं थी।

वहां जरूरत थी पोस्टर बनाने वाले एक पेंटर की। केदार शर्मा पेटिंग में भी माहिर थे तो वे  पेंटर बनने के लिए तैयार हो गए। वक्त गुजरा तो उन्हें कैमरामैन का काम मिला। साल 1934 में रिलीज हुई फिल्म “सीता” में बतौर सिनेमेटोग्राफर केदार शर्मा की पहली फिल्म थी। एक बाद ही 1935 में रिलीज हुई फिल्म “इंकलाब” में एक छोटा सा रोल मिला।  “पुजारिन”, “विद्यापति”, “बड़ी दीदी”, “नेकी और बदी” जैसी कुछ और फिल्मों में एक्टिंग की।

वे एक्टर बनने ही आए थे लेकिन दिक्कत थी उनकी आवाज बहुत पतली थी। जो उनकी एक्टिंग में रुकावट बन गई। जब इस बात का एहसास खुद केदार शर्मा को हुआ तो एक्टिंग छोड़कर उन्होंने साल 1936 में रिलीज हुई फिल्म “देवदास” में बतौर स्टोरी राइटर शुरुआत की। फिल्म हिट हुई और यहीं से उनकी किस्मत ने बड़ी करवट ली। साल 1940 की “औलाद” और साल 1941 की “चित्रलेखा” से वे डायरेक्शन में ऐसा आए कि उस दौर में सभी  को पीछे छोड़ दिया। नरगिस और दिलीप कुमार को लेकर फिल्म “जोगन” डायरेक्ट की। ये फिल्म भी बेहद चर्चित रही।

केदार शर्मा अपनी फिल्म के सेट पर जरा सी भी अनुशासनहीनता नहीं बर्दाश्त करते थे। पृथ्वीराज कपूर इनके दोस्त थे तो शो मैन राजकपूर को अपना असिस्टेंट बनाया। कहा जाता है कि एक छोटी से गलती पर राज कपूर को चांटा मारा था। साल 1961 में रिलीज हुई फिल्म “हमारी याद आएगी” के सेट पर तनुजा को भी इसलिए थप्पड़ जड़ दिया क्योंकि रोने के सीन में तनूजा बार-बार हंस रहीं थी।

साल 1947 में रिलीज हुई राज कपूर की पहली फिल्म ‘नीलकमल’ जो सुपरहिट हुई वो केदार शर्मा ने ही डायरेक्शन किया था। इसी फिल्म में मधुबाला को भी उन्होंने ही मौका दिया। साल 1949 में केदार शर्मा ने फिल्म “नेकी और बदी” में एक्टर राजेश रोशन के पिता म्यूजिक डायरेक्टर रोशन को भी मौका दिया।

केदार शर्मा एक तरफ सख्त स्वभाव के थे तो दूसरी तरफ अच्छे काम करने पर वो लोगों को अपने अंदाज में सम्मानित करते। वे जिसके काम से खुश हो जाएं उसे इनाम में दुअन्नी और चवन्नी देते थे। एक्टर राजकपूर, दिलीप कुमार, नरगिस, गीता बाली, सिंगर मुबारक बेगम और म्यूजिक डायरेक्टर रोशन ने केदार शर्मा की हुई चवन्नी को संभाल कर रखा।

केदार शर्मा के पास एक और हुनर था। फिल्म 1950 की “बावरे नैन” का गीत “तेरी दुनिया में जी लगता नहीं वापस बुला ले” और “खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते” या फिर फिल्म 1936 की फिल्म ‘’देवदास’’ का “बालम आए बसो मेरे मन में” और साल 1940 की फिल्म “जिंदगी” का गीत “मैं क्या जानूं क्या जादू है”। ये सभी गीत केदार शर्मा ने ही लिखे हैं। 

केदार शर्मा बच्चों से बहुत प्यार करते थे। उन्होंने बच्चों के लिए भी कई फिल्में बनाई, जिनमें “जलदीप”, “गंगा की लहरें”, “गुलाब का फूल”, “26 जनवरी”, “एकता”, “चेतक”, “मीरा का चित्र”, “महातीर्थ” और “खुदा हाफिज” शामिल हैं। कई अवार्ड से सम्मानित केदार शर्मा ने 50 सालों तक फिल्मी दुनिया को रोशन किया।

29 अप्रैल, साल 1999 वो दिन जब 89 साल की उम्र में इस महान फिल्मकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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