King Of Ghazal Jagjit Singh : अपनी आवाज़ के जरिए जीता जग

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'ये आवाज़ जगजीत सिंह की है

साल 1976 'द अनफॉरगेटेबल्स' एल्बम रिलीज हुआ। इस एल्बम से संगीत प्रेमियों को पहली बार पता चला कि ग़ज़लें इस अंदाज में भी गाई जा सकती हैं। एक वेबसाइट में छपे इंटरव्यू में जावेद अख़्तर कहते हैं कि 'मुझे याद है। मैं एक दिन अमिताभ बच्चन के घर गया था। उन्होंने मुझसे कहा कि, मैं आपको एक एल्बम सुनवाना चाहता हूं। उस एल्बम की पहली ग़ज़ल थी, बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी...। मैंने पहली बार वो आवाज़ सुनी थी। मैंने पूछा कि, ये किसकी आवाज़ है, तो अमिताभ ने बताया कि ये आवाज़ जगजीत सिंह की है।'

एक-एक शब्द ने दिल को छुआ 

मेहदी हसन और बेग़म अख़्तर जैसे ग़ज़ल गायकों ने बड़े-बड़े शायरों के कलाम गाए। दिक्कत थी, उनकी ग़ज़लों के शब्द बड़े कठिन होते थे अक्सर सिर के ऊपर से निकल जाया करते। इस वजह से आम धारणा ये बन गई कि ये इनकी ग़ज़लें आम संगीत प्रेमियों के लिए नहीं हैं। फिर आए जगजीत सिंह जो अपने पहले एल्बम 'द अनफॉरगेटेबल्स' से रातों रात स्टार बनें। उन्होंने सरल भाषा की ग़ज़लें गाना शुरू की। खास बात थी कि उनका गाया हुआ, एक-एक शब्द आम श्रोताओं को समझ में आ रहा था।

पैसे मिलते तो कहीं मिल जाता मुफ्त खाना

जगजीत सिंह ग़ज़ल गाते वक्त ये नहीं देखते कि वो किसी बड़े शायर ने लिखी है या छोटे शायर ने। उन्होंने सिर्फ ये देखा कि, ये शब्द दिल के तार को झनझनाते हैं या नहीं। 08 फरवरी, साल 1941 राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्मे  जगजीत सिंह साल 1965 में मुंबई आए। पहले रेस्तरां में गाना शुरू किया। फिर वो लोगों की निज़ी महफिलों में गाने लगे। इसके एवज में कहीं पैसे मिल जाते तो कहीं मुफ्त खाना।

थ्री पीस सूट और गले में हारमोनियम 

जगजीत सिंह की बायोग्राफी - 'कहां तुम चले गए... दास्तान-ए-जगजीत' के लेखक राजेश बादल पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह के हवाले से लिखते हैं 'उस जमाने में जगजीत सिंह ने एक थ्री पीस सूट सिलवाया था, जिसे वो हर दिन अपने हाथ से प्रेस करके पहनते। वो एक दिलचस्प नजारा होता कि जब थ्री पीस सूट में एक सरदार गले में हारमोनियम टांगे गाना गाता।'

'सिख को ग़ज़ल गाते हुए लोग स्वीकार करेंगे'

जब म्यूजिक कंपनी एचएमवी ने उनका पहला रिकॉर्ड निकाला तो कंपनी वालों ने रिकॉर्ड के कवर पर छापने के लिए जगजीत सिंह की एक फोटो मांगी। कहा गया कि 'एक सिख को ग़ज़ल गाते हुए संगीत प्रेमी स्वीकार नहीं करेंगे, भले ही उन्होंने कितना ही अच्छा गाया हो।'

जब दाढ़ी - बाल कटवा लिए 

लेखक राजेश बादल 'कहां तुम चले गए... दास्तान-ए-जगजीत' में लिखते हैं कि, 'कंपनी ने उनसे अनुरोध किया कि वो बिना पगड़ी और दाढ़ी के एक तस्वीर खिंचवाएं। जगजीत सिंह को ये सुन कर बहुत धक्का लगा। लेकिन अपने करियर के लिए उन्होंने सिख वेश त्यागने का फैसला ले लिया।'

'वो सरदार जी कहां है?’ 

दाढ़ी और बाल कटवाने के बाद जगजीत सिंह के साथ एक दिलचस्प वाकया हुआ।अपने बाल और दाढ़ी कटवाने के बाद जब वो एक शादी के रिसेप्शन में गाने के लिए पहुंचे तो आयोजकों ने उन्हें गाना गाने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि 'हमारी तो एक सिख युवक से बात हुई थी। आप क्यों आ गए? वो सरदार जी कहां हैं?'  

'मैं वही जगजीत सिंह हूं'

जगजीत सिंह ने समझाया कि 'मैं ही वो सिख हूं।' लेकिन आयोजक मानने को तैयार नहीं हुए। वो जगजीत सिंह से कहते कि 'आप ये क्यों नहीं कहते कि सरदार जी (जगजीत सिंह) को किसी दूसरे प्रोग्राम में ज्यादा पैसे मिल रहे थे, इसलिए उन्होंने अपनी जगह आपको यहां भेज दिया।'

जब लोग वाह-वाह कर उठे

तमाम कोशिशों के बाद जब आयोजक नहीं माने तब जगजीत सिंह ने एक तरीका निकाला, उन्होंने कहा कि 'अगर आपको यकीन नहीं होता तो आप लोग मेरा गाना सुन लें। अगर मेरी आवाज़ वही हुई तो पैसे दीजिएगा, वरना एक भी पैसा मत दीजिएगा।' तब आयोजक माने, लेकिन एक बात के लिए चेताया। कहा कि 'अगर किसी भी मेहमान ने शिकायत की तो, हम आपको गाने के बीच से उठा कर बाहर कर देंगें।' इसके बाद जगजीत सिंह ने स्टेज में गाना शुरू किया। बीच प्रोग्राम में कोई मेहमान कैसे टोक सकता था? क्योकि जगजीत सिंह तो वही थे। जगजीत सिंह की आवाज़ सुनने वाला वहां बैठा हर शख्स वाह-वाह कहे बिना नहीं रह सका।

अपनी आवाज़ से जग जीता

साल 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित जगजीत सिंह ने यूं तो कई शायर और गीतकार के लिखे शब्दों को अपनी आवाज़ दी। पर गुलजार के साथ उनका एक अनोखा रिश्ता था। काम को लेकर कंपटीशन और मतभेद के बाद भी दोनों गहरे दोस्त थे। 10 अक्टूबर, साल 2011, जब जगजीत सिंह ने दुनिया को अलविदा कहा तो गुलजार ने जगजीत सिंह के लिए एक बेहद भावुक कविता लिखी थी। उन्होंने लिखा  

एक बौछार सा था
वो शख़्स
बिना बरसे
किसी अब्र की
सहमी सी नमी से
जो भिगो देता था
एक बौछार ही था
जो किसी धूप की
अफ़शां भर के
दूर तक सुनते हुए
चेहरों पर
छिड़क देता था
सिर हिलाता था
कभी घूम के
टहनी की तरह
लगता था
झोंका हवा का
कोई छेड़ गया
गुनगुनाता था
खुले हुए बादल की तरह
मुस्कराहट में
कई तरबों की
झंकार छिपी थी
गली क़ासिम की तरह
चली ग़ज़ल की
एक झंकार था वो
एक आवाज़ की बौछार था वो...।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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