क्या है COP-28 ? जिस पर हैं दुनिया भर की निगाहें

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विश्व की सबसे बड़ी समस्याओं में क्लाइमेट चेंज का नाम भी लिया जाता है। जिसको लेकर कई समिट्स में भी बात होती है। जिसमें Conference of the Parties यानी कॉप अहम है।

क्या है COP 28? 

Conference of the Parties, एक एनुवल समिट है, जिसे संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश क्लाइमेट चेंज से निपटने के लिए क्या एक्शन लेने चाहिए, इसकी योजना बनाने के लिए सम्मिलित होते हैं। इसकी 27 समिट्स हो चुके है और COP 28 दुबई में 30 नवंबर से 12 दिसंबर 2023 तक होने वाला है। इस समिट में क्लाइमेट फाइनेंस पर भी बात होने की उम्मीद जताई जा रही है।

क्लाइमेट फाइनेंस क्या है? 

बता दें, क्लाइमेट फाइनेंस के जरिए क्लाइमेट चेंज से जुड़ी जो इनवेस्टमेंट्स होती है, उसकी फडिंग होती है। क्लाइमेट फाइनेंस एक मल्टीफेस्ड कॉन्सेप्ट बताया गया है। जोकि सामान्यता जलवायु परिवर्तन के इम्पेक्ट को कम करने या अनुकूलित करने के उद्देश्य से, जो भी एक्टिविटीज होती हैं, उसके फंड को रिफर करता है। हालांकि इसकी कोई तय परिभाषा नही है। ध्यान देने वाली बात ये है कि अब तक आईपीसीसी सहित जो भी रिपोर्ट आयी हैं उनसे ऐसा संकेत मिलता है कि ग्लोबल वार्मिंग को लगभग 2.4 से 2.6 डिग्री तक कम करने की जरूरत है। जब नेट जीरो के लक्ष्य यानी कार्बन का उत्सर्जन शून्य हो जायेगा, ये लक्ष्य पूरे होते हैं, तो ये हमें 1.7 से 2.1 डिग्री तक ले जाता है। इससे साफ जाहिर है कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

साथ ही सितंबर में ग्लोबल स्टॉक टेक रिपोर्ट में साफतौर से कहा गया है कि दुनिया तापमान को लेकर जो भी लक्ष्य हासिल करना चाहती है, उसकी राह पर नहीं है। वहीं द हिंदु और द प्रिंट दोनों में ही छपे आर्टिकल्स में जोर दिया गया कि क्लाइमेट फाइनेंस के लिए अमीर देशों को जरुरी कदम उठाने की जरुरत है। विकसित देशों को जरूरी तौर पर विकासशील देशों को फाइनेंस रिसोर्स देना जरूरी है। क्लाइमेट चेंज पर पेरिस के समझौते के आर्टिकल 9 के तहत, विकसित देशों के लिए अपनी ग्रीन हाउस से जुड़ी रिपोर्ट में विकसित देश की फाइनेंस से जुड़ी जानकारी और फाइनेंस का अनुमान बताना भी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पृथ्वी को ठंडा रखने के लिए असल में कार्बन के उत्सर्जन में 2022 के स्तर की तुलना में 2050 तक 70 फीसदी कटौती का संकल्प है। ये संकल्प लेने वाले देश कूलिंग टैक्नोलॉजी को टिकाऊ बनाने में निवेश करेंगे।

लेकिन ज्यादातर भारतीय अब भी कूलिंग टैक्नोलॉजी के उपकरणों का खर्च वहन करने में सक्षम नहीं है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में घरेलू एयर कंडीशनर के लिए बिजली की खपत 2050 तक 9 गुना बढ़ जाने की उम्मीद है। साथ ही कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन से जुड़ा आंकड़ा कहता है कि 2019 के स्तर की तुलना में 2030 तक CO2 उत्सर्जन में 48 प्रतिशत की कटौती की जानी चाहिए। इसके साथ ही 2050 के दशक की शुरुआत में वैश्विक शुद्ध शून्य CO2 उत्सर्जन तक पहुंचना होगा। वैसे भारत का CO2 उत्सर्जन को शून्य तक पहुंचाने का लक्ष्य 2070 तक रखा गया है। मीडिया वेबसाइट के एक लेख के मुताबिक, साथ ही अगर हमें जिंदा रहना है तो हमें औद्योगिक उत्पादों का उपयोग करना छोड़ना होगा। हम 100 साल पहले पेट्रोलियम आधारित उत्पादों के बिना रहते थे और हम अच्छी तरह से रहते थे, तो ऐसा नहीं है कि मानव जाति इसके बिना नहीं रह सकती। हम पेपर बैग, जूट बैग, कपड़े के बैग का उपयोग करते थे। वे सभी अब फिर से इस्‍तेमाल में वापस आ गये हैं।

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