जानिए क्या है वॉटर बर्थ, इंडिया में क्यों हो रहा पॉपुलर

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इंडिया में इन दिनों वॉटर बर्थ की काफी चर्चा है। महिलाओं को डिलीवरी की ये टेक्निक काफी सही समझ आ रही है। बच्चे की डिलीवरी के लिए सी सेक्शन या नार्मल, दो तरीके सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। सी सेक्शन यानी ऑपरेशन का नाम आते ही महिलाएं घबराने लगती और नार्मल डिलीवरी में भी डाक्टर्स का कहना है कि बच्चे को जन्म देते वक्त महिलाओं को 20 हड्डियां एक साथ टूटने के बराबर दर्द होता है। वैसे पुरुषों में दर्द बर्दाश करने की क्षमता 45 डेल होती है। इससे ज्यादा में पुरुष की मौत भी संभव बताई गई है और महिलाओं को डिलीवरी के वक्त 57 डेल का दर्द होता है। लेकिन अब वॉटर बर्थ नवजात शिशु के लिए और प्रसव की पीड़ा को झेल रही महिला दोनों के लिए ही कॉम्प्लीकेशन्स न होने की स्थिती में एक बेहेतरीन ऑप्शन है। जो पहले विदेशों में और अब इंडिया में भी काफी पॉपुलर हो रहा है। तो चलिए जानते हैं कि वॉटर बर्थ यानी सरल भाषा में कहें तो पानी में बच्चा पैदा करने की ये टेक्नीक क्या है और ये पॉपुलर के साथ बेहेतर क्यों कही जाती है।

वॉटर बर्थ यानी कि पानी के भीतर बैठकर शिशु को जन्म देना। जब महिला को एक्टिव लेबर पेन हो तो महिला को वॉटर पूल में ले जाकर बिठाया जाता है। जहां न केवल उसे लेबर पेन में राहत मिलती है, साथ ही बेबी की डिलीवरी भी आसान होती है। क्योंकि जिस वॉटर पूल में महिला को बिठाया जाता है, उसमें पानी भरने के लिए गर्म और नार्मल दोनों तरीके के पानी का इस्तेमाल किया जाता है। पानी ज्यादा गर्म होने की दशा में इसमें ठंडा पानी मिलाया जाता है। पानी का टेंपेरेचर 37 डिग्री सेल्सियस पर रखा जाता है। टेंपेरेचर के लिए एक थर्मामीटर पूल में लगा होता है।

इससे बॉडी में एड्रेनैलिन हॉर्मोन का लेवल गिरता है, जिससे एंग्जाइटी कम होती है और ऑक्सीटोसिन और एंडोर्फिस गुड हार्मोन ज्यादा बनते हैं। जिससे डिलीवरी के वक्त दर्द कम महसूस होता है। इससे डिलीवरी के वक्त महिलाएं रिलीफ महसूस करती हैं। इस दौरान महिला के सपोर्ट के लिए डॉक्टर और नर्स होते हैं और एक वॉटर प्रूफ डॉपलर से हर 15 मिनट बच्चे की हार्ट बीट सुनी जाती है। वॉटर पूल में महिलाएं नॉजल के जरिए गैस लेती हैं जिसमें लॉफिंग गैस और ऑक्सीजन मिक्स होती है।

वॉटर बर्थ का नाम सुनते ही ज्यादातार लोगों का सवाल होता है कि क्या पानी के अंदर बच्चे का जन्म होना...उससे बच्चे को नुकसान तो नहीं है। कहीं बच्चा डूब गया तो। तो ऐसा बताया जाता है कि बच्चा मां के गर्भ में फ्लूड में ही रहता है। जब वो बाहर आता है तो सबसे पहले उसका संपर्क पानी से होता है। जिससे वो ज्यादा बेहतर फील करता है। डाक्टर्स ऐसा बताते हैं कि पूल में डिलीवरी होने पर भी बच्चे को पानी से तुरंत बाहर निकाला जाता है। डिलीवरी के बाद भी शिशु आम्बिलिकल कॉर्ड यानी कि नाभिनाल से जुड़ा रहता है। शिशु का सारा सिस्टम पहले की तरह ही अपनी मां से जुड़ा रहता है। डिलीवरी में मां के साथ बच्चे को भी दर्द होता है, तो वॉटर बर्थ में शिशु को भी कम दर्द होता है। वैसे वॉटर बर्थ अपनाने वाले सभी पेरेंट्स की पहले काउंसलिंग होती है। अगर कोई कॉम्प्लिकेशन नहीं है तो ही ये ऑप्शन चुनें।

वॉटर बर्थ वही प्रेग्नेंट वुमन करा सकती हैं, जिनकी प्रेग्नेंसी में रिस्क न हो। अगर मदर का ब्लड प्रेशरपल्सकॉन्ट्रैक्शंसहार्ट बीट ठीक हैपैसेज पेन के साथ खुल रहा है, तो वो वॉटर बर्थ का ऑप्शन चुन सकती हैं। जो महिला पहले सिजेरियन डिलीवरी करा चुकी हो या जुडवां बच्चे होने वाले हो, तो वॉटर बर्थ नहीं कराया जाता। वॉटर बर्थ के दौरान महिला को पूल में घबराहट होने पर तुरंत पूल से निकालकर बेड पर लाया जाता है। वैसे पिछले 200 सालों से वॉटर बर्थ का इतिहास बताया जाता है। लेकिन भारत में ये ही में फेमस हुआ था।

मीडिया रिपोर्ट्स में साल 1805 में सबसे पहले वॉटर बर्थ का जिक्र मिलता है। फिर 1990 आते-आते ये ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और अमेरिका में काफी पॉपुलर हो गया। अब इसे इंडिया में भी काफी पसंद किया जा रहा है।

इंडिया में 15 साल पहले पहली बार इसकी शुरुआत हुई थी। मीडिया रिपोर्ट्स में 2007 में सबसे पहले वॉटर बर्थ का जिक्र मिलता है। अब दिल्ली, गुरुग्राम, मुंबई, चेन्नई, बेंगलूरु, हैदराबाद और पणजी में वॉटर बर्थ की सुविधा है। हालांकि कोई कॉम्पिकेशन न होने पर विदेशों में महिलाएं घर पर भी इस टेक्नीक का यूज सारी जानकारी इकट्ठा करने के बाद करती है। वॉटर बर्थ से हर मंथ इंडिया में 300 से 400 डिलीवरी होती हैं और इसका औसतन खर्च 40 हजार से 50 हजार बताया जाता है। ये जवानी है दीवानी फिल्म फेम अभिनेत्री कल्कि कोचलीन ने इस टेक्नीक से डिलीवरी करने का सबसे पॉपुलर एग्जाम्पल है।

 

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