SC की चौखट तक कानूनी जंग, दिल्ली का असली बॉस कौन ?

Home   >   खबरमंच   >   SC की चौखट तक कानूनी जंग, दिल्ली का असली बॉस कौन ?

110
views

दिल्ली सरकार बनाम केंद्र की लड़ाई में नया मोड़ आ गया है। कुछ दिन पहले ही अधिकारों की लड़ाई में दिल्ली सरकार को सुप्रीम कोर्ट में बड़ी जीत मिली थी। लेकिन अब उसी फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने एक नया अध्यादेश जारी कर दिया है और इसके साथ ही केंद्र ने 11 मई की संविधान पीठ के फैसले की समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। आइए जानते हैं कि क्या है उस अध्यादेश में? केजरीवाल की जीती हुई बाजी को केंद्र सरकार ने कैसे पलट दिया...

केंद्र सरकार दिल्ली में अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए अध्यादेश लाई जिसे लेकर दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने अंदेशा जताया था। दिल्ली में ट्रांसफर पोस्टिंग के अधिकार को लेकर जारी नया अध्यादेश कहता है कि दिल्ली के नौकरशाहों के तबादलों और पोस्टिंग पर अंतिम अधिकार उपराज्यपाल का था, न कि दिल्ली सरकार का....

केंद्र सरकार ये अध्यादेश सुप्रीम कोर्ट उस फैसले के बाद लाई है, जिसमें कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने कहा था कि दिल्ली में ट्रांसफर पोस्टिंग के अधिकार दिल्ली सरकार के पास रहेंगे। अब केंद्र ने अपने अध्यादेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया है। इस अध्यादेश में साफ लिखा है कि अधिकारियों की पोस्टिंग-ट्रांसफर पर असली बॉस एलजी ही रहने वाले हैं। असल में कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनी हुई सरकार के पास अफसरों की पोस्टिंग-ट्रांसफर की ताकत रहनी चाहिए, इससे चुनी हुई सरकार जवाबदेह बनती है और अधिकारियों की भी जवाबदेही तय हो पाती है। लेकिन अब केंद्र सरकार ने जो अध्यादेश जारी किया है, उसके मुताबिक दिल्ली सरकार अधिकारियों की पोस्टिंग पर फैसला जरूर ले सकती है, लेकिन अंतिम मुहर एलजी को ही लगानी होगी।  अध्यादेश को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम, 1991 में संशोधन के रूप में लाया गया है। 

सरल शब्दों में बात करें तो केंद्र सरकार जो अध्यादेश लेकर आई है, उसके जरिए राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण का गठन होगा। ये प्राधिकरण ही बहुमत से फैसला करेगा कि कब किस अधिकारी का ट्रांसफर करना है। इस प्राधिकरण में तीन सदस्यों को रखा जाएगा, इसमें सीएम, मुख्य सचिव और प्रधान सचिव गृह होंगे। लेकिन जो भी फैसला होना होगा, वो बहुमत के आधार पर ही लिया जाएगा। यानी कि केजरीवाल सरकार के पास पूरी ताकत नहीं रहने वाली है।

हालांकि अब एक बार फिर दिल्ली और केंद्र सरकार की जंग अदालत की चौखट पर पहुंच सकती है। अगर दिल्ली सरकार अध्यादेश को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में वापस जाती है, तो केंद्र को ये साबित करना होगा कि इस मामले में 'तत्काल कार्रवाई' की आवश्यकता थी और अध्यादेश सिर्फ विधायिका में बहस और चर्चा को दरकिनार करने के लिए जारी नहीं किया गया था। बता दें कि एक अध्यादेश को अदालत में तब चुनौती दी जा सकती है, जब एक पक्षकार को ये लगे कि इस अध्यादेश को लागू करवाने के लिए तत्काल कार्रवाई की जरूरत थी या नहीं?

अब ये भी समझ लेते हैं कि अध्यादेश क्या होता है...

जब सरकार किसी विशेष परिस्थिति से निपटने के लिए कानून बनाना चाहती है, तो पहले अध्यादेश लाती है। ये एक तरह का आधिकारिक आदेश होता है। इसे तब लाया जाता है जब सरकार इमरजेंसी में किसी कानून को पास कराने की योजना बनाती है, लेकिन उसे अन्य राजनीतिक दलों का समर्थन नहीं मिल रहा होता। ऐसे में सरकार उस अध्यादेश के जरिए कानून को पास करा सकती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत सरकार के कहने पर राष्ट्रपति की तरफ से उस समय अध्यादेश जारी किया जाता है, जब संसद में कोई सत्र न चल रहा हो। ये राष्ट्रपति का विधायी अधिकार होता है। एक अध्यादेश की अवधि 6 हफ्ते की होती है। जिसे केंद्र सरकार इसे पास करने के लिए राष्ट्रपति के पास भेजती है। अब अगले छह माह के अंदर केंद्र को ये अध्यादेश सदन में पेश करना होगा। अगर ये पारित हो जाता है जो ये कानून में तब्दील हो जाएगा। अगर ऐसा नहीं होता है तो ये समाप्त हो जाएगा। हालांकि सरकार दोबारा भी अध्यादेश ला सकती है। अगर ये कानून बन जाता है तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं लागू होगा और ट्रांसफर पोस्टिंग के अधिकार उपराज्यपाल के पास आएंगे क्योंकि ऐसे हालात में अंतिम फैसला उन्हीं का मान्य होगा।

 

Comment

https://manchh.co/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!