Loksabha Election 2024: कभी निर्दलीय सांसद हुआ करते थे ‘किंगमेकर’, जानिए इतिहास

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इस बार लोकसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला NDA और विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A के बीच ही माना जा रहा है। इस चुनावी चर्चा के बीच ये भी जानना जरूरी है कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर किसी को चुनाव लड़ने का समान अधिकार है। देश के पहले आम चुनाव से ही निर्दलीय उम्मीदवारों ने ताल ठोंकना शुरू कर दिया था। वो जीतते भी रहे, लेकिन जैसे ही गठबंधन का दौर शुरू हुआ और राजनीति धड़ों में बंटी, तो हर चुनाव के बाद लोकसभा पहुंचने वाले निर्दलीय सांसदों की संख्या कम होती जा रही है। यही वजह है कि पिछले लोकसभा चुनाव में सिर्फ और सिर्फ चार ही निर्दलीय उम्मीदवार लोकसभा जीतकर पहुंच सके। 

देश में हुए लोकसभा चुनाव के इतिहास में निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। 1952 से 2019 तक हुए 17 लोकसभा चुनावों में 47,968 उम्मीदवारों ने निर्दलीय चुनाव लड़ा, जिनमें से केवल 226 उम्मीदवार ही सांसद बन पाए हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो लोकसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों की औसत सफलता दर महज 0.47 फीसदी है। 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव के बाद से 2019 तक केवल छह बार निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत की संख्या दोहरे अंक तक पहुंची है। देश में अब तक सबसे अधिक 42 निर्दलीय सांसद 1957 में जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। इसी साल सबसे ज्यादा वोट शेयर प्रतिशत 19.32 प्रतिशत था। जबकि 1951 के चुनाव में ये 15.90 प्रतिशत था। इसी तरह 1998 में मात्र 2.37 प्रतिशत थी। 1991 के चुनाव में 5 हजार 514 निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में उतरे और जीत सिर्फ एक निर्दलीय उम्मीदवार की हुई। यह सबसे कम आंकड़ा है। 

खुद के दम पर संसद पहुंच गए ये चार निर्दलीय

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद महाराष्ट्र की अमरावती सीट से नवनीत राणा निर्दलीय उम्मीदवार के तौर चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचीं। इसके अलावा कर्नाटक की मांड्या सीट से निर्दलीय उम्मीदवार सुमनलता ने चुनाव जीता। असम की कोकराझार लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार नाबा कुमार सरानिया जीते। वहीं केंद्रशासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली से निर्दलीय प्रत्याशी देलकर सांजीभाई की जीत हुई। निर्दलीय चुनाव लड़ना बहुत मुश्किल होता है। अपने दम पर ही वोट लाने होते हैं। ऐसे में पूरे लोकसभा क्षेत्र में अपनी बात पहुंचाना भी मुश्किल है। वहीं, नामांकन के लिए राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को दो प्रस्तावक की जरूरत होती है, जबकि निर्दलीयों को 10 प्रस्तावक चाहिए होते हैं। 

चुनाव आयोग की आय 

निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव आयोग की आमदनी का भी बड़ा साधन हैं। उदाहरण के तौर पर 2019 में देशभर में 3461 निर्दलीयों ने नामांकन किया। एक प्रत्याशी को जमानत के तौर पर 25,000 रुपये जमा करने होते हैं। ऐसे में इन निर्दलीयों से ही आयोग को करीब 8.62 करोड़ रुपये की आमदनी हुई। निर्दलीयों का एक सकारात्मक पहलू ये भी है कि वो स्थानीय मुद्दों को चुनाव में ज्यादा उठाते हैं। दूसरे दल बड़े राष्ट्रीय मुद्दों को उठाते हैं। निर्दलीयों की वजह से राजनीतिक दलों का ध्यान भी इन मुद्दों पर जाता है। प्रत्याशियों की संख्या बढ़ने और जीत न पाने की वजहों को लेकर जानकारों के अलग-अलग तर्क हैं। एक वजह तो ये भी है कि गठबंधन के दौर में कई छोटे दल भी बन गए। बड़े दलों के साथ मिलकर उनकी ताकत ज्यादा हो जाती है। ऐसे में जनता भी एक को जिताने और हराने के लिए वोट करती है। सियासी जानकारों का कहना है कि चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए निर्दलीयों को अपनी ओर मिलाना ज्यादा आसान है। ऐसे में जनता को लगता है कि ये सौदेबाजी करने के लिए ही चुनाव लड़ते हैं। इस वजह से भी लोग राजनीतिक दलों को जिताना ज्यादा बेहतर लगता है।

हर साल प्रत्याशियों की संख्या घटती-बढ़ती रही 

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में चुनाव लड़ने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या घटती-बढ़ती रही है। लेकिन जीतने वाले उम्मीदवारों की संख्या घटती चली गई। 2019 में 3461 निर्दलीय उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा और सिर्फ 4 सांसद ही निर्दलीय जीत पाए। उससे पहले 2014 में 3234 निर्दलीय उम्मीदवार थे और 3 प्रत्याशी ही जीत सके। इसी तरह साल 2009 के चुनाव में 3831 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा और 9 प्रत्याशी जीते। साल 2004 में 2385 उम्मीदवार थे जबकि 5 कैंडिडेट चुनाव जीते। उसके बाद 1999 में 1945 में से 6 निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत हासिल की। इसके अलावा 1998 में 1915 में से 6, साल 1996 में 10,636 में से 9 और 1991 में तो 5 हजार से ज्यादा उम्मीदवारों में से सिर्फ एक को जीत मिली थी। वहीं बात साल 1989 की करें तो 3713 निर्दलीय उम्मीदवारों में से 12, 1984 में 3791 में से 5 और 1980 में 2826 में से 9 निर्दलीय प्रत्याशी जीतें। 1977 में 1224 में से 9, साल 1971 में 1134 में से 14, साल 1967 में 866 में से 35, साल 1962 में 479 में से 20 निर्दलीय उम्मीदवार जीतें। इसके बाद 1957 में हुए आम चुनाव में 481 में से सबसे ज्यादा 42 और साल 1952 में निर्दलीय उम्मीदवार जीतकर संसद पहुंचे, जबकि 533 ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा।   

साल 2014 और साल 2019 के लोकसभा चुनावों की तरह ही इस बार भी मोदी मैजिक फैक्टर पूरी तरह से काम करेगा या नहीं इसका पता तो 4 जून को काउंटिंग शुरू होते ही स्पष्ट हो जाएगा कि जनता ने किस पर भरोसा जताया है।  

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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