तुम गज़ल बन गईं, गीत में ढल गईं, मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहा : कुमार विश्वास

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कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है !

मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !!

मैं तुझसे दूर कैसा हूं, तू मुझसे दूर कैसी है !

ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !!

इस कविता ने कुमार विश्वास को देश के गांव से लेकर पूरी दुनिया में मशहूर कर दिया। इस कविता में अधूरे प्रेम का दर्द है अपने प्रेमी से दूर रहने की तड़प है। प्रेम को इस तरह से परिभाषित करने वाले कुमार विश्वास का भी पहला प्यार अधूरा ही रह गया। आज उनके जन्मदिन पर उनके पहले प्यार की कहानी जो बेहद दिलचस्प है। वो कहानी जो अधूरी रह गई।

कुमार कभी एक लड़की को पहली ही नजर में दिल दे बैठे थे। उसी लड़की के प्रेम से उनकी कविताओं में क्राफ्ट आया और उनकी जिंदगी संवरी। उन दिनों कुमार विश्वास ने हापुड़ में कालेज में पढ़ते थे और एक संस्था सृजन भी चलाते थे।  

लेखक और पत्रकार निलेश मिश्रा को दिए इंटरव्यू में कुमार बतातें हैं। ‘अपने दोस्तों के साथ मिलकर दो दिन का ‘सृजन मोहत्सव’ किया। महोत्सव में एक दिन कवि सम्मेलन था और दूसरे दिन वाद-विवाद प्रतियोगिता। इसमें कई कॉलेज से टीमें आई थीं, तो एक कॉलेज की टीम में वो लड़की भी थी’।

कुमार बतातें हैं कि ‘जैसे दुष्यंत ने शकुंतला को देखा होगा वैसे ही मैंने उस लड़की को जब देखा तो देखता ही रह गया। बेबाक बोलने का अंदाज़ लिए वो लड़की उस प्रतियोगिता में सेकेंड या थर्ड आई। प्रतियोगिता खत्म हुई और वो चली गई।’

कुमार बतातें हैं कि ‘उस लड़की और हमारे बीच की एक कॉमन फ्रेंड थी। तो मैंने उनसे पूछा कि वो तेरे साथ लड़की कौन थी? क्या करती है वो? तो वो दोस्त हंसने लगी। तो हमने कहा, हंस क्यों रही है तो वो बोली ‘तीन दिन से वो भी यही पूछ रही थी कि कुमार क्या करता है, कहां रहता है।’

फिर क्या था इसके बाद तो कुमार अपने दोस्त के साथ उस लड़की से मिलने सीधे उसके घर पहुंच गए। जैसे ही उस लड़की की गली में पहुंचे तभी कुमार के बड़े भाई विकास के दोस्त मिल गए। उन्होंने पूछा कि तुम यहां? तो हमने बताया कि दादा एक लड़की है नाम भी बताया। तो वो बोले उससे क्या काम है? तो हमने बताया कि अभी वो भाषण प्रतियोगिता में आई थीं। फिर अब यूनिवर्सिटी की टीम उज्जैन जानी है तो सोचा पक्ष में मैं और विपक्ष में वो लड़की हो जाएगी। फिर क्या भइया ले गए हमें उनके पास।’ 

घर के बाहर उनके पिता जी बैठे थे, हम अंदर गए, उसके भाइयों ने आवाज लगाई। गुड्डन ।

अंदर से दो चुटिया के साथ उछलते हुए दुपट्टा लहराते एक लड़की आई। उसे लगा कि बड़े भैया आवाज लगा रहे हैं। जैसे उसने हमें देखा तो वो देखती रह गई। वो बोली बेवकूफ हो क्या, तुम लोग तो घर ही आ गए। कुमार भी उस लड़की के इस तरह के रिएक्शन से समझ गए कि वो भी उनके बारे में जानती थी। ये लड़का उसने मिलना चाहता था।’

कुमार बताते हैं कि किन्ही कारणों से ये प्यार अधूरा ही रह गया। कुमार उस लड़की का बिना नाम लिए कई बार कविता के मंच से उस लड़की का जिक्र कर ही देते हैं।

‘तुम ग़ज़ल बन गईं, गीत में ढल गईं, मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहा’

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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