Lyricist Gulshan Bawra : जिन्होंने कभी काम नहीं मांगा

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'मैं इस बात में विश्वास रखता हूं कि, कम काम करो मगर बढ़िया काम करो। मैंने कम गीत लिखे, ज्यादातर हिट हुए। मेरे गानों का औसत सर्वश्रेष्ठ है।'

ये लाइनें है उस दिग्गज गीतकार की हैं, जिन्होंने देशभक्ति अभिव्यक्त करने के लिए 'मेरे देश की धरती, सोना उगले’ जैसा गीत दिया। दोस्ती के लिए - 'यारी है ईमान मेरा' और मस्ती के लिए 'दुक्की पे दुक्की हो या सत्ते पे सत्ता' भी दिया। 'खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे' जिसे बिंदास प्यार करने वाले गाते और प्यार की कसमें खाते दिल कहते - 'कसमे वादे निभाएंगे हम'

इस गीतकार के पास जीवन के हर रंग को पिरोने के लिए शब्द शायद इसिलए थे क्योंकि इनके परिवार को बंटवारे में मार दिया गया था। बिना हाथ फैलाय जिंदगी में कुछ करने की ख्वाहिश थी इसलिए पहले नौकरी की फिर अपने सपनों को बुना। गीतकार बने एक्टर बने और दुनिया को जब अलविदा कहा तो अपना शरीर भी दान कर गए।

आज कहानी गुलशन कुमार मेहता की जिसका जीने का अंदाज जुदा था, इसलिए इन्हें गुलशन बावरा कहा जाता था। 

12 अप्रैल, साल 1938 पाकिस्तान के शेखपुरा में गुलशन कुमार मेहता का जन्म हुआ।

पिता का कंस्ट्रक्शन का काम करते और मां विद्यावती घर संभालतीं। विद्यावती धार्मिक विचारों वाली थीं। रोज मंदिर जाना। धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेना। गुलशन भी उनके साथ जाया करते तो वो भी कीर्तन-भजन लिखने लगे।   

वक्त गुजरा और 10 -11 साल की उम्र में गुलशन की आंखों के सामने ही उनके माता-पिता और चाचा का कत्ल कर दिया गया। वजह साल 1947 का बंटवारा। दंगाइयों ने उनके घर को जला दिया।

किसी तरह बचते बचाते गुलशन बड़े भाई के साथ जयपुर अपनी बड़ी बहन के घर आ गए। कुछ साल बीते और फिर दिल्ली के एक कॉलेज में ग्रेजुएशन के लिए एडमिशन ले लिया। यहीं पर उनका गीत लिखने का शौक परवान  चढ़ा।  

एक मैगजीन को दिए इंटरव्यू में गुलशन मेहता ने बताया था कि 'दरअसल बंटवारे का सदमा मेरे दिल पर इतना जबरदस्त बैठा कि, मैं जो कुछ भी लिखता उसमें दर्द आता। जब मैं दिल्ली गया और कॉलेज पहुंचा तो लड़कियों को देखकर इश्किया गीत लिखने लगा। बस, इस तरह कविता में रुचि और महारत बढ़ती गई।'

लोग उनकी कविताओं की तारीफ करते। तो गुलशन के दिल में आया कि - क्यों न फिल्मों में भाग्य आजमाया जाए। मुंबई जाकर गीत लिखा जाए। फिर उनके साथ एक संयोग हुआ।

गुलशन मेहता ने एक बार कहा था कि 'संयोग से साल 1955 में रेलवे में बतौर गुड्स क्लर्क मुंबई में नौकरी लग गई। दाल-रोटी का सहारा मिल गया। फिल्मों के लिए भी स्ट्रगल किया। मुझे जोगेश्वरी में रहने की जगह मिली, वहीं पर स्वर्ण सिंह रहते थे, जो फिल्मों में प्रोडक्शन कंट्रोलर थे। उन्होंने मेरे गीत सुने और डायरेक्टर-प्रोड्यूसर रविन्द्र देव से मिलवाया। रविन्द्र देव ने म्यूजिक डायरेक्टर कल्याणजी-आनंदजी के पास भेजा।'

उन दिनों कल्याणजी-आनंदजी साल 1959 की फिल्म 'चंद्रसेन' में म्यूजिक दे रहे थे। उन्होंने गुलशन को एक सिचुएशन के हिसाब से गीत लिखने को दिया। वो गीत था – 'मैं क्या जानूं काहे, ये सावन मतवाला है।ये गीत खूब चला।

इसके बाद कल्याणजी-आनंदजी ने साल 1959 में ही रिलीज हुई अपनी अगली फिल्म 'सट्टा बाजार' में गुलशन से तीन गीत लिखवाए। और ये तीनों गीत सुपरहिट हुए।

फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर शांति भाई पटेल ने गुलशन मेहता से प्रभावित हुए। गुलशन रंग-बिरंगे कपड़े पहना करते। शांतिभाई ने कहा - ये आदमी पागल यानी बावरा की तरह नजर आ रहा है। बस तभी से गुलशन मेहता के नाम के आगे बावरा जुड़ा और वो गुलशन मेहता से गुलशन बावरा बन गए। 

साल 1967 की ‘उपकार’ का गीत ‘मेरे देश की धरती, सोना उगले’ और 1973 की ‘जंजीर’ का गीत ‘यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी’। इन दोनों के लिए गुलशन बावरा को बेस्ट लिरिसिस्ट का फिल्मफेयर का अवार्ड मिला।

सनम तेरी कसम, अगर तुम न होते, तू-तू है वही, आती रहेंगी बहारें,  वादा करले साजना, दिलबर मेरे, दीवाने हैं दीवानों को, एक मैं और एक तू, बच के रहना रे बाबा ये सभी सुपरहिट गीतों के शब्द गुलशन बावरा की कलम से निकले। अपने चार दशक के फिल्मी सफर में गुलशन बावरा ने करीब 240 गाने लिखे। जो किसी भी गीतकार के लिखे गए गीतों के मुकाबले बेहद कम हैं।

बिना कोशिश किए गुलशन बावरा एक्टर भी बने। ये उनके लिए बिन मांगे का मोती जैसे था।

फिल्मी मैगजीन के मुताबिक गुलशन बावरा ने खुद ही बताया था कि 'फिल्म ‘सट्टा बाजार' के मेकर्स ने पूछ लिया, क्या फिल्म में एक रोल करोगेमैंने हामी भर ली। फिल्म में एक ही सीन था। वो एक सीन लोगों को पसंद आया। फिर जिस फिल्म के लिए गीत लिखता उसमें एक-आध रोल भी करना पड़ जाता।'

गुलशन बावरा ने करीब 50 से ज्यादा फिल्मों में रोल किए। बतौर गीतकार और बतौर एक्टर गुलशन को ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा। इसके पीछे वजह गुलशन बावरा ने एक इंटरव्यू में बताई। 

वो कहते हैं कि 'डायरेक्टर–प्रोड्यूसर खुद ही मुझे खुशी से बुलाते, आदर-सत्कार करते। मैं रेलवे की सर्विस करता था, इसलिए किसी के आगे कभी काम नहीं मांगा। मुझे रोटी के लिए कभी दिक्कत नहीं हुई। अगर, हाथ फैलाया होता तो फिर मैं नजरों से गिर जाता। इसलिए सबसे इज्जत मिला करती थी। जब काम जम गया तब मैंने नौकरी छोड़ दी।'

जिंदगी के आखिरी वक्त गुलशन बावरा बोर्ड ऑफ इंडियन परफार्मिंग राइट सोसायटी के निदेशक रहे। मुंबई के पाली हिल में अकेले रहते। 7 अगस्त, साल 2009, दिल का दौरा पड़ने से 75 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। 

आखिरी ख्वाहिश थी कि उनकी मृत देह भी काम आए। उनकी इच्छा के मुताबिक उनका शरीर जेजे अस्पताल को दान कर दिया गया।

 

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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