Lyricist Majrooh Sultanpuri : एक हकीम जो शायर बने, जड़ी-बूटी के साथ दर्द में शब्दों का भी मरहम लगाते

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एक हकीम जो नब्ज देखकर तबीयत का हाल बता दें। जड़ी बूटी तो देते ही थे साथ में दर्द में कुछ शब्दों का भी मरहम लगाते। क्योंकि जनाब शायरी का भी शौक रखते। और यहीं शौक इन्हें मुंबई ले गया। दर्द, खुशी, इश्क के साथ जिंदगी के हर एहसास को अपने शब्दों में बांधा। सरकार के खिलाफ बोले तो जेल में ठूंस दिए गए। आर्थिक तंगी बढ़ी तो जेल से ही फिल्मों के लिए गाने लिखे। केएल सहगल से लेकर एक्टर सलमान खान तक की फिल्मों के गाने लिखने के लिए अपनी कलम का जादू चलाया। आज कहानी मजरूह सुल्तानपुरी की। जिनके गाने लोगों को भागती दौड़ती जिंदगी में कुछ सुकून दे जाते हैं।

एक अक्टूबर साल 1919 को यूपी के जिला सुल्तानपुर में असरार उल हसन खान का जन्म हुआ। पिता पुलिस में थे। वो चाहते थे कि बेटा पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी करें। तो उन्होंने असरार का मदरसे में एडमिशन करा दिया। इसका असर ये हुआ कि इनकी अरबी और फारसी भाषा में मजबूत पकड़ हो गए। इसके बाद लखनऊ से यूनानी दवाओं की ट्रेनिंग ली और हकीम बनकर लोगों का इलाज करने लगे। लेकिन, उनका मन लगा था शायरी में। वो अक्सर मुशायरों में जाया करते और उसका हिस्सा बनते। उनकी लिखी गजलें लोगों को पसंद आने लगी। नाम और शोहरत मिली। अब लोग उन्हें असरार नहीं मजरूह सुल्तानपुरी कहने लगे।

साल 1944-45 का दौर था, जब वो मुंबई के एक मुशायरे में बुलाए गए। वहां जब ग्रेट फिल्म डायरेक्टर एआर कारदार ने उन्हें सुना तो उनके मुरीद हो गए। उन्होंने मजरूह को अपनी फिल्म में गाने लिखने का ऑफर दे दिया। लेकिन मजरूह सुल्तानपुरी ने मना कर दिया। कारण था उस वक्त फिल्म में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। ये बात जब उनके दोस्त जिगर मुरादाबादी को पता चली, तो उन्होंने मजरूह को समझाया।

कहा कि, तुम फिल्मी गाने लिखो। जैसे गाने तुम लिखना चाहते हो। इससे कुछ पैसे मिलेंगे और तुम अपने परिवार की देखरेख अच्छी तरह कर पाओगे। साथ-साथ शायरी भी चलती रहेंगी। ये बात सुनकर सुल्तानपुरी राजी हो गए।

फिल्म का नाम था। साल 1946 में रिलीज हुई 'शाहजहान'। आवाज थी कुंदनलाल सहगल की। और धुन बनाई थी नौशाद ने। गाने के बोल थे मजरूह सुल्तानपुरी के 'जब दिल ही टूट गया,  हम जीकर क्या करेंगे..'। ऐसा कहा जाता है कि ये गाना उस दौर में भी और आज भी इश्क में टूटा हुआ दिल लेकर फिर रहे आशिकों का एंथम है।

इसके बाद साल 1947 की 'मेहंदी', साल 1949 की 'अंदाज' और साल 1950 की फिल्म 'आरजू' के लिए गाने लिखे। वैसे तो फिल्म 'आरजू' के सभी गाने सुपरहिट हुए। लेकिन 'ए दिल मुझे ऐसी जगह ले चल, जहां कोई न हो...' ये गाना आज भी सुपरहिट है। 

इन फिल्मों के बाद से बॉलीवुड में मजरूह की गाड़ी चल पड़ी थी। लेकिन आजाद भारत में एक शायर को उसके आजाद लबो के लिए जेल हुई।

बात साल 1949 की है। मुंबई में मजदूरों की हड़ताल हो गई। क्रांतिकारी विचारों से भरे मजरूह ने मंचों से मजदूरों के पक्ष में ऐसी कविता पढ़ी की। तत्कालीन सरकार आग-बबूला हो गई। मजरूह सुल्तानपुरी को आर्थर रोड जेल में डाल दिया। सरकार ने कहा - माफी मांगो तो रिहाई मिल जाएगी। लेकिन मजरूह के लिए नेहरू का कद उनकी कलम से बड़ा नहीं था। मजरूह को दो साल की जेल हुई। मजरूह साहब जेल में थे उधर उनका परिवार आर्थिक तंगी गुजर रहा था।

शो मैन राजकपूर को खबर हुई तो वो मजरूह सुल्तानपुरी के पास गए और कहा, 'मुझे एक गाना चाहिए'। सुल्तानपुरी ने गाना लिखा और राज कपूर ने उन्हें एक हजार रुपये फीस दी। राज कपूर ने वो गाना तब किसी फिल्म के लिए नहीं लिखवाया था। सिर्फ वो मजरूह सुल्तानपुरी के मदद करना चाहते थे। राज कपूर ने वो गाना करीब साल 17 साल बाद साल 1966 में रिलीज हुई फिल्म 'तीसरी कसम' में इस्तेमाल किया। गाने के बोल थे। 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई....'

साल 1951 में मजरूह जेल से बाहर आए और साल 2000 तक हिंदी फिल्मों के लिए सैकड़ों गाने लिखे। नौशाद, आरडी बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से लेकर अनु मलिक, जतिन-ललित, एआर रहमान तक एक से एक म्यूजिक डायरेक्टर के साथ काम किया।

फिल्म डायरेक्टर नासिर हुसैन के साथ उनकी जोड़ी कमाल रही। नासिर हुसैन के साथ 'तुम सा नहीं देखा', 'अकेले हम अकेले तुम', 'ज़माने को दिखाना है', 'हम किसी से कम नहीं', 'जो जीता वही सिकंदर' और 'कयामत से कयामत तक' जैसी कभी न भुलाई जाने वाली फिल्में कीं।

उन्होंने एक्टर केएल सहगल से लेकर सलमान खान तक के लिए गीत लिखे। साल 1964 में रिलीज हुई डायरेक्टर सत्येन बोस की फिल्म 'दोस्ती' का गाना 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ-सवेरे' के लिए पहला और आखिरी फिल्मफेयर अवार्ड मिला। वो पहले ऐसे गीतकार थे जिन्हें साल 1993 में फिल्मों का सबसे बड़ा पुरस्कार 'दादा साहेब फाल्के अवार्ड' दिया गया।

‘यूं तो हमने लाख हंसी देखे हैं, तुमसा नहीं देखा...’, ‘कभी आर कभी पार लागा तीर-ए-नज़र…’, ‘रहे ना रहे हम महका करेंगे…’, ‘ओ मेरे दिल के चैन...’, ‘चला जाता हूं किसी की धुन में ...’, ‘छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा...’, ‘आसमां के नीचे, हम आज अपने पीछे...’, ‘तेरी बिंदिंया रे...’ , ‘पहला नशा पहला खुमार...’ !

उनके लिखे फिल्मी गानों की लिस्ट बहुत लंबी है। लेकिन राज कपूर पर फिल्माया गया और मुकेश की आवाज से सजा, साल 1975 में रिलीज फिल्म ‘धरम करम’ का एक गाना है। मजरूह साहब का ये गाना इनकी जिंदगी में बिलकुल फिट बैठता है। गाने के बोल हैं...

दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत

कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल।

इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल

जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल...

इस गाने की तरह ही अपने सैकड़ों गीतों को हमारे होठों को देकर वो 24 मई साल 2000 को 80 साल की उम्र में दुनिया से चले गए।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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