Lyricist Shailendra : जैसी जिंदगी, वैसी लिखावट

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हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार शैलेंद्र ने 800 गीत लिखे। तीन बार फिल्म फेयर जीता। इनकी जिंदगी में सफलता की बुलंदी है तो मुफलिसी और गरीबी भी है। शोहरत है तो पिछड़ी जाति का तमगा भी है। अपनों का इलाज न करने की कसक है तो अपनों के धोखे का दर्द भी है।

'अब ऐसे लोग भी हॉकी खेलेंगे'

अमला शैलेंद्र एक इंटरव्यू में बताती हैं कि पिताजी (गीतकार शैलेंद्र) को हॉकी खेलना अच्छा लगता था। लेकिन एक बार उन्होंने हॉकी स्टिक तोड़कर फेंक दीवजह थी उन्हें हॉकी खेलते हुए देख कुछ लोगों ने मजाक उड़ायाकहाकि - अब ऐसे लोग भी हॉकी खेलेंगे।’

कम उम्र मेंं छोड़ दी दुनिया

जिन्होंने 'आवारा', 'श्री 420', 'संगामऔर 'गाइड' जैसी 171 हिंदी और 6 भोजपुरी फिल्मों में करीब 800 फिल्मी गीत लिखे। तीन बार फिल्म फेयर का बेस्ट लिरिसिस्ट का अवार्ड जीता। जिनकी जिंदगी में सफलता की बुलंदी है तो मुफलिसी और गरीबी भी है। खूब सारी शोहरत है तो पिछड़ी जाति का तमगा भी है। अपनों का इलाज न करने की कसक है तो अपनों के धोखे का दर्द भी है। दो वक्त का खाना नसीब नहीं है लेकिन इन्होंने शराब इतनी पी की बेहद कम उम्र में दुनिया छोड़ गए। इन्होंने एक फिल्म भी बनाई। उस फिल्म को उनके जीते जी नाकारा गया, लेकिन जब वो नहीं रहे जब उसे एक कल्ट और क्लासिक फिल्म कहा गया।

पाकिस्तान से पहुंचे मुबंई 

ये वो वक्त थाजब देश आजाद नहीं हुआ था। मूल रूप से बिहार के आरा जिले के धूसपुर गांव निवासी केसरीलाल तब पाकिस्तान के रावलपिंडी में अपनी पत्नी पार्वती देवी के साथ रहते। दलित समुदाय से ताल्लुक रखते और आर्मी हॉस्पिटल में ठेकेदारी करते। इन्हीं के घर 30 अगस्त साल 1923 को शंकरदास केसरीलाल यानी शैलेंद्र का जन्म हुआ। पिता केसरीलाल रिटायर हुए तो एक दोस्त के कहने पर परिवार लेकर यूपी के मथुरा आ गए।

दो वक्त का खाना भी नहीं था नसीब 

थुरा में ही शैलेंद्र का बचपन गरीबी और मुफलिसी में गुजरा। दो वक्त का खाना भी नहीं था। इसलिए बीड़ी पीते ताकि भूख मर जाए। एक वक्त इससे भी ज्यादा दुख आया। दरअसलमां पार्वती देवी और एकलौती बहन का बीमारी से निधन हो गया। भगवान से विश्वास इसलिए उठा की वो पैसों की तंगी के कारण इलाज तक नहीं करा पाए। इस सब हालात के बाद भी साल 1939 में 16 साल की उम्र में मथुरा के 'राजकीय इंटर कॉलेजसे हाईस्कूल किया और पूरे यूपी में थर्ड पोजिशन पाई। कॉलेज गए तो कविता लिखने लगे। 

रेलवे कारखाने में नहीं लगता था मन

साल 1942, भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया तो जेल जाना पड़ा। पिता केसरी लाल ने कहाकि 'साहित्य प्रेम छोड़कर रेलवे में नौकरी करो।' परीक्षा दी पास हुए, पहली पोस्टिंग झांसी और बाद में उनका ट्रांसफर हुआ मुंबई में। शैलेंद्र रेल कारखाने जातेलेकिन काम में मन नहीं लगता। घंटों अकेले बैठ कर कविता लिखते। उनके साथी कहते - 'काम करोइससे घर चलेगाकविता से नहीं।' दरअसल जब शैलेंद्र लिखते तो सब भूल जाते। वो अपनी जिंदगी के दर्द कागज पर उतार देते। इन वजहों से नौकरी चली गई। इसके बाद वो 'इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन' यानी (IPTA) से जुड़े।

'मेरी कविता बिकाऊ नहीं है'

क्त था जब देश आजाद हो रहा था तो दूसरी तरफ बंटवारे का दंश भी झेल रहा था। तब शैलेंद्र ने एक मुआशरे में अपनी कविता 'जलता है पंजाब साथियों... ' पढ़ी।मुशायरे में शो मैन राज कपूर भी मौजूद थे। उन दिनों राजकपूर फिल्म ‘आग’ बना रहे थे। उन्होंने शैलेंद्र से कहा कि ये कविता में अपनी फिल्म में शामिल करना चाहता हूं। इसके लिए 500 रुपये भी ऑफर किए। पर शैलेंद्र ने कहा ‘मेरी कविता बिकाऊ नहीं है।’ लेकिन राज कपूर ने शैलेंद्र की प्रतिभा को पहचान लिया था इसलिए शैलेंद्र के इस तरह से मना करने पर वो अचंबित तो हुए पर ये भी कहा कि - मेरा ऑफर हमेशा खुला हैजब मन बदले, तब आप आ सकते हैं। ऐसा हुआ भी शैलेंद्र को मजबूरी वश राज कपूर के पास जाना पड़ा।

अपने पहले ही गीत से हो गए हिट

दरअसलशैलेंद्र की शंकुलता देवी से अब शादी हो चुकी थी। मुंबई में गृहस्थी जमाने की चुनौती थी। दो बेटे – मनोजदिनेश और तीन बेटियां – शैलीअमलागोपा थीं। बेटी अमला ने एक इंटरव्यू में बताया था कि 'जब मेरी मां गर्भवती थी। पिताजी (शैलेंद्र) की आर्थिक जरूरतें बढ़ रही थीं। डिलीवरी के लिए पैसे नहीं थे। तब वो राज अंकल (राज कपूर) के पास गए। उन दिनों वो फिल्म 'बरसात' (1949) बना रहे थे। फिल्म लगभग पूरी हो चुकी थी। लेकिन उन्होंने कहाकि दो गानों की गुंजाइश हैआप लिखो। पिताजी ने तब दोनों गाने लिखे।' पहला था – 'बरसात में हमसे मिले तुम सजनतुमसे मिले हम' और दूसरा – 'पतली कमर हैतिरछी नजर है' दोनों गाने हिट हुए। शैलेंद्र इसके बाद से ही राज कपूर की टीम का हिस्सा बनें। राज कपूर उन्हें 'कविराज' कहते। इन दोनों का साथ अगले 16-17 सालों तक बना रहा। 

राज कपूर की फिल्मों के थीम गीत लिखे

'बरसातसे लेकर 'मेरा नाम जोकर' तक राज कपूर की सभी फिल्मों के थीम गीत शैलेंद्र ने ही लिखे। साल 1951 की फिल्म 'आवारा’ ने राजकपूर को दुनिया भर में मशहूर किया। फिल्म का गीत आवारा हूं शैलेंद्र ने ही लिखा था। हालांकि इस गीत को फिल्म में शामिल करने के लिए पहले राज कपूर ने मना कर दिया था।

'मैंमेरा कवि और मेरे गीत'

एक पत्रिका में छपे शैलेंद्र के लेख 'मैंमेरा कवि और मेरे गीतके मुताबिक – 'आवारा की कहानी सुने बिनाकेवल नाम से प्रेरित होकर मैंने ये गीत लिखा। मैंने जब सुनाया तो राज कपूर साहब ने गीत को अस्वीकार कर दिया। फिल्म पूरी बन गई तो उन्होंने मुझे फिर से गीत सुनाने को कहा और इसके बाद अब्बास साहब को गीत सुनाया। अब्बास साहब की राय हुई कि ये तो फिल्म का मुख्य गीत होना चाहिए।'

साहिर करते थे शैलेंद्र का सम्ममन

शैलेंद्र ने जीवन के अनुभवों को ही कागज पर उतारा। एक से एक सुपरहिट गीत दिए। इनके समकालीन गीतकार भी उनका सम्मान करते। जब साहिर लुधियानवी ने साल 1963 का फिल्म फेयर अवार्ड ये कह कर लेने से इनकार कर दिया था कि उनसे बेहतर गाना तो शैलेंद्र का लिखा बंदिनी का गीत 'मत रो माता लाल तेरे बहुतेरेहै।

फिल्म की नकामी ने शैलेंद्र को तोड़ा

शैलेंद्र अब एक फिल्म बनाना चाहते थे – ये फिल्म फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी - मारे गए गुलफ़ाम पर बेस्ड थी। फिल्म बनी - 'तीसरी कसमके नाम से साल 1966 में रिलीज हुई। बासु चटर्जी भट्टाचार्या फिल्म के डायरेक्टर थे। बतौर प्रोड्यूसर शैलेंद्र ने फिल्म बनाने के लिए काफी उधार लिया। पर फिल्म बॉक्स ऑफिस में कमाल नहीं कर पाई। इस नाकामी ने शैलेंद्र को तोड़ दिया। कहा जाता है कि इस वजह से उनकी मौत भी हुई। लेकिन बेटी अमला ने इस बात को एक इंटरव्यू में खारिज किया था। कहा कि 'फिल्म बनाने में काफी पैसे लग गए थे। घर में पैसे नहीं थे। लेकिन उस दौर में पिताजी (शैलेंद्र) सबसे ज्यादा पैसा पाने वाले गीतकार थे। ये बात गलत है कि फिल्म के फ्लॉप होने और पैसों के नुकसान की वजह से पिताजी का निधन हुआ है।'

'कोई नहीं बचा जिसने लूटा नहीं'  

अमला कहती हैं कि – 'फिल्म को बनाने के दौरान उनके मन

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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