Lyricist Yogesh : कभी हंसाया, कभी रुलाया

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गीतकार योगेश गौड़ ने दो दशकों तक एक से बढ़कर एक गीत रचे। उन्हें एक अफसोस था उन्हें भुला दिए जाने का। जिंदगी के आखिरी 24 सालों में सिर्फ दो फिल्मों के लिए उन्होंने गीत लिखे।

 

कुछ तुम करो, कुछ हम करें, मिलजुल के कुछ गम कम करें

पर कैसे करें?

रूखी-सूखी, जो भी मिले, बांटके खा लें अगर

कैसी भी हो दुख की घड़ी, हंसते हुए जाए गुजर

साथ है जब, परिवार हमारा

फिर क्यों दुख से हम डरें?

जिनके गीत दुखी मन पर लगाते मरहम 

जिंदगी के हर दुख और सुख बांटकर जीने की फिलॉसफी देने वाला ये गीत साल 1979 की फिल्म 'हमारे-तुम्हारे' का है। किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने गाया है। संगीत आर डी बर्मन का है। पर जिन्होंने ये गीत लिखा है ये वो गीतकार थे जिनके गीत दुखी मन पर मरहम लगाते। जीने की प्रेरणा देते और अंधेरों में रोशनी की लकीर खींचते। ये गीतकार मुंबई आए थे बड़े – बड़े सपने लेकर, पर उसे पूरा करने में 11 सालों का लंबा वक्त लगा। झोपड़ी में रहे। काम की तलाश में दर-दर भटके। रिश्तेदारों ने धोखा दिया। एक दोस्त न होता तो शायद वो टिक न पाते। आज कहानी धुनों पर गीत लिखने में माहिर योगेश गौड़ की। जिन्होंने दो दशकों तक एक से बढ़कर एक गीत रचे। उन्हें एक अफसोस था उन्हें भुला दिये जाने का।जिंदगी के आखिरी 24 सालों में सिर्फ दो फिल्मों के लिए उन्होंने गीत लिखे।

जब मुंबई जाने के लिए सोचा 

उत्तर प्रदेश के नवाबों के शहर लखनऊ में 19 मार्च, साल 1943 को योगेश गौड़ का जन्म हुआ। पिता पीडब्ल्यूडी में इंजीनियर। घर में किसी भी तरह का कोई अभाव नहीं। अच्छी परवरिश के साथ बचपन से जवानी की दहलीज में कदम रखा। पर अभी 12वीं की ही थी की जिंदगी ने करवट ले ली। उनके पिता का अचानक निधन हो गया। किसी भी रिश्तेदार ने साथ नहीं दिया। एक इंटरव्यू में योगेश गौड़ बताते हैं, 'बैंक में सिर्फ 500 रुपये थे। मेरा परिवार बड़ा था। मुंबई में एक फुफेरा भाई था बृजेंद्र गौर, जो फिल्मों में डायलॉग लिखते थे। मुझे लगा कि फिल्म मेकिंग में कई डिपार्टमेंट होते हैं, मुझे भी उसकी मदद से कोई न कोई काम मिल जाएगा।'

जब दोस्त ने बांधी हिम्मत 

दरअसल, योगेश गौड़ कविता रचते थे। साल 1960, 17 साल की उम्र में फुफेरे भाई बृजेंद्र गौड़ की मदद की उम्मीद लिए वो लखनऊ से मुंबई जाने के लिए ट्रेन में बैठ गए। पर वो अकेले नहीं थे। उनके साथ थे उनके बचपन के दोस्‍त सत्यप्रकाश। जिन्हें वो प्यार से सत्तू कहते। दोनों बड़े-बड़े सपने सजा कर मुंबई पहुंचे, पर बृजेंद्र गौड़ ने उनकी मदद के लिए कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। फिर किराए में अंधरी में एक चॉल ली जहां न बिजली थीन पानी का कनेक्शन। कुछ दिन बीते, साथ लाए पैसे भी खर्च हो गए। फिर रहने का ठिकाना मंदिर बना। खाना भी कभी एक वक्त का मिलता। योगेश गौड़ सोचने लगे लखनऊ लौट जाऊं। पर दोस्त सत्‍तू ने कहा कि 'नहीं योगेश, अब किसी भी हाल में वापस नहीं जाना है। तुमको कुछ करके दिखाना होगा। तुम्हारे लिए मैं नौकरी करूंगा। तुम्हारा खर्चा मैं चलाऊंगा।' खैर समय बीता। सत्य प्रकाश को एक मिल में नौकरी मिल गई। एक इंटरव्यू में योगेश गौड़ ने बताया था कि ‘अगर मेरा दोस्त सत्तू मेरे साथ नहीं होता तो मैं मुम्बई में टिक नहीं पाता।’

हर गीत के लिए मिलते थे 25 रुपये

मुंबई आए हुए दो साल गुजर चुके थे। दोस्त सत्यप्रकाश ने घर खर्च संभाल लिया था। योगेश गौड़ काम की तलाश में भटक रहे थे। फिर उनकी मुलाकात रॉबिन बनर्जी से हुई। साल था 1962, और फिल्म थी 'सखी रॉबिन'जिसमें योगेश गौड़ को गीत लिखने का पहला मौका मिला। इस फिल्म के लिए उन्होंने छह गीत लिखे और हर एक गीत के लिए 25 रुपये भी मिले। ये गीत थोड़े-बहुत हिट हुए तो रॉबिन बनर्जी ने अपनी पांच-छह फिल्मों के गीत भी उन्हीं से लिखवाए। उन्हें हर गीत के लिए मेहताना तो 25 रुपये ही मिलता पर फायदा ये रहा उन्हें धुनों पर गीत लिखना आ गया। वक्त गुजर रहा था। संघर्ष जारी था। वो काम तो कर रहे थे पर उन्हें अभी कोई पहचान नहीं मिली थी।

जब सलिल चौधरी ने गीत लिखने के लिए कहा 

ये 60 का दशक था। एक दिन उनकी मुलाकात महान म्यूजिक डायरेक्टर सलिल चौधरी की पत्नी सिंगर सविता बनर्जी से हुई। वो बेहद प्रभावित हुईं। उन्होंने योगेश गौड़ को अपने पति सलिल चौधरी से मिलवाया। पर सलिल चौधरी ने योगेश गौड़ से कोई बात नहीं की। निराश होकर योगेश गौड़ वहां से चले आए। 14 दिसंबर, साल 1966। सलिल दा के दिल के सबसे ज्यादा करीब गीतकार शैलेंद्र का निधन हो गया। वो अपने ज्यादातर गीत शैलेंद्र से लिखवाते थे। शैलेंद्र के जाने के बाद सलिल दा को योगेश गौड़ की याद आई। अपनी पहचान बनाने की जद्दोजहद कर रहे योगेश गौड़ को सलिल दा हारमोनियम पर एक धुन सुनाई। कहा कि 'अभी एक घंटे के लिए मैं बाहर जा रहा हूं, जब तक मैं लौटकर आता हूं, तुम इस धुन पर गीत लिखो।'

वो बात जो दिल में चुभ गई

सलिल दा के जाने के बाद वो गीत लिखने की कोशिश करने लगे, पर इस दौरान धुन उनके दिमाग से निकल गई। तब उन्होंने पास बैठे सलिल दा के असिस्टेंट से अनुरोध किया कहा 'वो धुन एक बार फिर से सुना सकते हैं।' ये बात सुनते ही असिस्टेंट साहब तो झल्ला उठे, बोले – 'ये काम तुमसे न हो पाएगा। यहां शैलेंद्र, गुलजार और आनंद बख्शी जैसे बड़े-बड़े गीतकार आते हैं।’ ये बात दिल में चुभी योगेश गौड़ वहां से उठकर घर जाने लगे। अभी आधे रास्ते पहुंचे ही थे कि वो धुन उन्हें याद आ गई। फिर क्या था अपने अपमान के बारे में बिना कुछ सोचे वो फटाफट लौटे और अपना गीत सलिल दा को सुनाया –'जिंदगी, कैसी ये पहेली हाय, कभी ये हंसाए, कभी ये रुलाए।

आनंद से चमका किस्मत का सितारा

साल था 1971 और फिल्म थी 'आनंद'। सलिल दा की धुनों में योगेश गौड़ ने 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' और 'ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय' जैसे गीत रचे। तो 11 साल संघर्ष के बाद योगेश ने पहली बार सफलता का स्वाद चखा। साल दर साल साल 1972 की फिल्म 'अनोखा दान' का गीत – आए घिर-घिर सावन की, काली-काली घटाएं हो या फिर साल 1972 की फिल्म 'मेरे भैया' का गीत ‘मेरे भैया, मेरे चंदा, मेरे अनमोल रतन' हो साल 1974 की 'रजनीगंधा' का गीत ‘कई बार यूं ही देखा हैं' या साल 1975 की फिल्म ‘मिली’ का ‘बड़ी सूनी सूनी है, जिंदगी ये जिंदगी’। साल 1976 की फिल्म ‘छोटी सी बात’ का ‘न जाने क्यों, होता है ये जिंदगी के साथ’ हो या फिर साल 1979 की फिल्म 'बातों बातों में' का 'न बोले न तुम, न मैंने कुछ कहा’ या साल 1979 की फिल्म 'मंजिल' का ‘रिमझिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाए मन’ हो या साल 1995 की फिल्म 'सनम बेवफा' का – 'अच्छा सिला दिया तूने, मेरे प्यार का'ये ऐसे जो पारम्परिक गीतों से अलग थे इन गीतों में नई शब्दावली थी नए भावबोध थे। इन गीतों ने योगेश गौड़ को बुलंदियों पर पहुंचाया।

'दूर जाऊंगा तो कैसे लिखूंगा' 

एक इंटरव्यू में योगेश गौड़ ने बताया था कि, 'जो देखता था, जो जिया था, वही लिखा है। मैंने अपने आस-पास के लोगों के बारे में लिखा। उनके बीच रहकर। दूर जाऊंगा तो कैसे लिखूंगा।' पर वक्त के साथ योगेश गौड़ पीछे छूटते चले गए। या उन्हें छोड़ दिया गया था। साल 1996 की फिल्म 'अपने दम पर' के लिए गीत लिखने के बाद उन्हें काम मिलना बंद हो गया। अगले 24 सालों में सिर्फ दो फिल्में साल 2003 की फिल्म 'श्श' और साल 2018 की फिल्म 'अंग्रेजी में कहते हैं' के लिए उन्होंने गीत लिखे।

'लोग मुझे भूल गए' 

अपने एक इंटरव्यू में ये दुख साझा भी किया। उन्होंने कहा था कि 'बरसों हो गए जब कोई मुझसे गाना लिखवाने आया हो। मुझे लगता है इंडस्ट्री और लोग मुझे भूल गए।' जिंदगी के आखिरी वक्त वो मुंबई के फ्लैट में रहते। एकदम अकेले। कभी कभार किसी का फोन आ जाता। पीठ में दर्द की परेशानी थी। एक बेटा ऑस्ट्रेलिया में और बहू अपने मायके में थी। जब 29 मार्च, साल 2020 को 78 साल की उम्र में योगेश गौड़ को जिंदगी से अलविदा कह गए।

जिंदगी जीने की उम्मीद

जाते – जाते, साल 1979 की फिल्म बातों बातों मेंका वो गीत जिसे किशोर कुमार ने गाया है। राजेश रोशन ने अपनी धुन से सजाया है और योगेश ने अपने इस गीत से जिंदगी जीने की उम्मीद दी है। 

कभी सुख कभी दुख, यही जिंदगी है

ये पतझड़ का मौसम, घड़ी दो घड़ी है

नए फूल कल फिर, डगर में खिलेंगे

कहां तक ये मन को, अंधेरे छलेंगे

उदासी भरे दिन, कभी तो ढलेंगे।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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