माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना आखिर क्यों इतना मुश्किल, पर्वतारोहियों को क्यों खींचती है ये चोटी?

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मुंबई की रहने वाली 48 साल की सुजेन जीसस की ये चाहत थी कि वो दुनिया की पहली ऐसी महिला बने जोकि पेस मेकर लगा होने के बाद भी माउंट एवरेस्ट पर चढने में सफल रही,लेकिन ऐसा हो न सका। 8848 मीटर ऊंची माउंट एवरेस्ट की चोटी पर चढाई की शुरुआत करते ही उनकी हालत बिगड़ने लगी। वे बमुश्किल 250 मीटर ही चढ़ सकीं जिसमें उन्हें 12 घंटे लग गए। आम तौर पर पर्वतारोही इस दूरी को 20 मिनट से आधे घंटे में तय कर लेते हैं। हालत बिगड़ने के बाद उन्हें लुकला कस्बे के एक अस्पताल ले जाया गया जहां उनकी मौत हो गई।

माउंट एवरेस्ट पर चढाई करने के लिए सबसे मुफीद सीजन मार्च से मई के बीच का माना जाता है। इस बार नेपाल की सरकार ने 478 पर्वतारोहियों को माउंट एवरेस्ट पर चढने के लिए परमिट जारी किया है, लेकिन इस सीजन में अब तक 8 पर्वतारोहियों की मौत हो चुकी है। आखिर माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करना इतना खतरनाक क्यों है? और ऐसी कौन सी चुंबकीय शक्ति है जिसके लिए हर पर्वतारोही इस चोटी पर चढने के लिए अपनी जान भी दांव पर लगा देता है। और उस रास्ते से समिट की ओर जाता है जहां उसके जैसे सैकड़ों पर्वतारोहियों के शव सालों से जैसे के तैसी हालत में पड़े हुए हैं।

 साल 1921 में इस चोटी पर चढने का पहली बार असफल प्रयास हुआ। जिसमें पर्वतारोही दल के 11 लोगों की मौत हो गई। इसके बाद साल 1953 में इस चोटी पर पहली बार एडमंड हिलेरी और तेनजिंग शेरपा ने चढने में कामयाब रहे। तब से अब तक 11 हजार से ज्यादा लोग इस चोटी पर चढने का प्रयास कर चुके हैं। जिसमें से काफी लोगों की मौत भी हुई। ऐसा माना जाता है कि माउंट एवरेस्ट पर आज भी 300 से ज्यादा पर्वतारोहियों के शव पड़े हुए हैं। जिन्हें नीचे नहीं लाया जा सका। पर्वतारोहियों को इन शवों के आसपास से गुजरते हुए ही समिट तक जाना होता है,लेकिन सवाल उठता है कि माउंट एवरेस्ट पर चढने के दौरान ऐसे कौन से खतरे होते हैं जिनकी वजह से जान चली जाती है। अगर जान बच भी गई तो ठंड के कितने खतरनाक दुष्परिणाम सामने आते हैं।

 

 

8848 मीटर ऊंचे एवरेस्ट में सबसे ज्यादा मौतें 8000 मीटर या उसके ऊपर से शुरू होती हैं। इसे डेथ जोन कहते हैं। एवरेस्ट पर मरने वाले पर्वतारोहियों के शव के ऐसी ऊंचाई से वापस लाना बेहद मुश्किल होता है। इसलिए उन्हें वहीं छोड़ दिया जाता है.

 

 

 रुसी पर्वतारोही जॉन क्राकाउर माउंट एवरेस्ट पर चढाई के अनुभवों को लेकर अपनी किताब इनटू थिन एयर में लिखते हैं कि 10 मई, 1996 की दोपहर माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचे, तो वे 57 घंटों से नहीं सोए थे और ऑक्सीजन की कमी के कारण दिमाग पर अलग प्रेशर था। जैसे ही वे 29,028 फीट से जब नीचे आ रहे थे तब 20 अन्य पर्वतारोही समिट पर जाने के लिए लाइन में थे। किसी ने ये ध्यान नहीं दिया कि आसमान में बादल घिर रहे हैं। 6 घंटे बाद और 3,000 फीट नीचे, 70 नॉट की स्पीड से चल रही हवाओं और अंधाधुंध बर्फ के बीच क्राकाउर अपने टेंट में किसी तरह पहुंचे। ठंड, थकावट और हाइपोक्सिया की वजह से दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था,लेकिन वे अभी जिंदा थे। अगली सुबह, उन्हें पता चला कि उनके 6 साथी पर्वतारोही अपने कैंप में वापस नहीं आए हैं और वे अपने जीवन के लिये संघर्ष कर रहे हैं। जब तूफान आखिरकार गुजर गया, तो उनमें से पांच की मौत हो चुकी थी। जबकि, छठे पर्वतारोही पर ठंड का ऐसा असर हुआ कि उसका दाहिना हाथ काटना पड़ा।

 

 

आइये जानते हैं कि माउंट एवरेस्ट पर इतनी मौतें होने की वजहें क्या है ?

 

एवलांच आना, पहाड़ से गिरने की वजह से,एक्सपोजर,एल्टीट्यूड सिकनेस,आक्सीजन की कमी,

दिल का दौरा, थकान, अन्य।

 

एवरेस्ट के किस हिस्से में सबसे ज्यादा मौतें होती हैं और उनकी मुख्य वजह क्या होती है?

 

समिट के पास - 50 फीसदी की गिरने से, 10 फीसदी की दिमाग में सूजन आने से और 40 फीसदी की अन्य कारणों से  

साउथ काॅलम - 7906 मीटर की ऊंचाई पर- 55.6 फीसदी की एक्सपोजर से, 11 फीसदी की दिमाग मंे सूजन आने से ,11 फीसदी की थकान की वजह से और 22 फीसदी की गिरने से

लोसे फेस- 7400 मीटर की ऊंचाई- 42 फीसदी की एवलांच से, 14 फीसदी की गिरने से ,14 फीसदी की बर्फ गिरने से,14 फीसदी की नुकीले पत्थरों से और 14 फीसदी की अज्ञात वजहों से

 नाॅर्थ काॅलम- 7020 मीटर- 100 फीसदी मौतें सिर्फ एवलांच से

 बेस कैंप- 30 फीसदी की गिरने से और 15 परसेंट की हार्ट अटैक से

 

 

दरअसल माउंट एवरेस्ट को पहली बार 1856 में 8840 मीटर लंबा मापा गया था। 1955 में ऊंचाई को 8848 मीटर तक देखा किया गया था, जो अभी भी नेपाली सरकार की ओर से जारी आधिकारिक ऊंचाई है। हालाँकि, चीनी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई 8844 मीटर घोषित करते हैं। वैज्ञानिक वर्तमान में दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत को फिर से मापने की प्रक्रिया में हैं, खास तौर से ऐसा भी माना जाता है कि 2015 के भूकंप के बाद ऊंचाई बदल गई होगी।

 

माउंट एवरेस्ट पर चढने में आम तौर पर 80 लाख रुपए तक का खर्च आता है। इससे नेपाल सरकार की भी काफी कमाई होती है। वहीं माउंट एवरेस्ट पर चढने में आम तौर पर 40 दिनों तक का वक्त लगता है। इसमें एवरेस्ट बेस कैंप तक ट्रेकिंग में बिताया गया वक्त शामिल नहीं है, जिसमें 10-14 दिन लग सकते हैं। एवरेस्ट पर चढ़ने में इतना समय लगने का कारण यह है कि आपका शरीर ऊंचाई पर जाने पर मौसम के अनुसार एडजस्ट हो सके। शिखर पर समुद्र के स्तर की तुलना में उपलब्ध ऑक्सीजन की मात्रा का केवल एक तिहाई है। पर्वतारोही आमतौर पर बोतलबंद ऑक्सीजन का उपयोग ज्यादा ऊंचाई के प्रभावों का सामना करने में मदद करने के लिए करते हैं। इसके ठंडे और अप्रत्याशित मौसम के कारण, पर्वतारोहियों को सलाह दी जाती है कि वो दोपहर 2 बजे तक शिखर पर पहुंचने की कोशिश करें। अगर इस समय तक आप नहीं पहुंच पाते हैं, तो आपको वापस आने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इस समय के बाद तापमान में गिरावट या खराब मौसम से जान जा सकती है।

 

 

दरअसल मार्च से मई तक के बीच का वक्त एवरेस्ट पर चढने के लिए सबसे बेहतर माना जाता है। 2019 में एक ऐसा भी दौर आया कि एवरेस्ट पर इतने पर्वतारोही चढे कि वहां जाम की स्थिति हो गई। रात में माउंट एवरेस्ट पर लाइन से खड़े पर्वतारोहियों की एक तस्वीर भी उस वक्त वायरल हुई थी। वहीं इस बार माउंट एवरेस्ट पर एक अलग तरह होड़ दिख रही है। ये होड़ अमेरिका और चीन के बीच है कि इनमें से किस देश के ज्यादा से ज्यादा पर्वतारोही माउंट एवरेस्ट समिट तक पहुंचेंगे। इस साल एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए नेपाल के पर्यटन विभाग से अब तक 96 चीनी और 87 अमेरिकी पर्वतारोहियों को नेपाल एवरेस्ट पर चढ़ने की इजाजत दी गई है। नेपाल की सबसे बड़ी पर्वतारोहण आयोजक संस्था सेवेन समिट ट्रेक्स के अध्यक्ष मिंगमा शेरपा के मुताबिक चीन ने अपने पर्वतारोहियों के लिए एक नया नियम लागू किया है। इसके तहत उन्हें एवरेस्ट पर चढ़ने की कोशिश करने के पहले आठ हजार मीटर की ऊंचाई वाली चोटी तक चढ़ना होगा।

 

 

 

 

 

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