Maharaja Ranjit Singh : प्रथा बंद होने के बाद भी इस सिख महाराजा के साथ सती हुईं थी रानियां

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उस दौर में पंजाब कई टुकड़ों में बंटा था। जिनको मिस्ल कहा जाता था। इन मिस्ल पर सिख सरदारों की हुकूमत चलती थी। ऐसे ही एक मिस्ल सुकरचकिया के कमांडर महा सिंह जिसका मुख्यालय गुजरांवाला था उनका निधन हो गया। इसके बाद उनके बेटे जो महज 12 साल के थे उन्होंने गद्दी संभाली। इससे पहले से वे 10 साल की उम्र से ही युद्ध में जाते रहे थे। लेकिन अब उन पर पिता का साया नहीं था ऐसे में सैन्य अभियान की बागडोर संभाली। चेत सिंह की सेना को हराकर लाहौर पर कब्जा किया और जब वे मेन गेट से किले के अंदर गए तो उन्हें तोपों की शाही सलामी दी गई। 12 अप्रैल साल 1801 जब 20 साल की उम्र में रणजीत सिंह की पंजाब के महाराजा के तौर पर ताजपोशी हुई।

जब भी देश के इतिहास में महान राजाओं के बारे में बात होगी तब 13 नवंबर 1780 को महा सिंह और राज कौर के परिवार में तब के पंजाब के गुजरांवाला में जन्मे शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह का नाम जरूर आएगा। गुजरांवाला जगह अब पाकिस्तान में आती है।

जब महाराजा रणजीत सिंह पंजाब की गद्दी पर बैठे थे तो उसी समय 5000 किमी की दूरी पर फ्रांस पर नेपोलियन बोनापार्ट का शासक था। 

सर लेपेल ग्रिफिन अपनी किताब 'रणजीत सिंह' में लिखते हैं कि ‘दोनों ही नाटे कद के थे। दोनों ने ही बड़े युद्ध जीते, लेकिन दोनों ही अपनी ताकत दूसरों को देने में असफल रहे।’

 ‘रणजीत सिंह देखने में अच्छे नहीं थे। बचपन में चेचक होने से एक आंख की रोशनी चली गई थी, उनके चेहरे पर गहरे निशान थे। कद 5 फिट 3 इंच से ज्यादा नहीं था। कंधे चौड़े थे, सिर बड़ा था। लंबी लहलहाती हुई सफेद दाढ़ी की वजह से वे अपनी उम्र से काफी बड़े लगते थे। साधारण कपड़े पहनते और कभी भी अपने सिंहासन पर नहीं बैठते।’

ब्रिटिश इतिहासकार जे टी व्हीलर के मुताबिक, अगर महाराजा एक पीढ़ी पुराने होते, तो पूरे हिंदुस्तान को ही फतह कर लेते। खुद अनपढ़ थे, लेकिन उन्होंने अपने राज्य में शिक्षा और कला को प्रोत्साहन दिया।

पंजाब में कानून-व्यवस्था कायम की, कभी भी किसी को मौत की सजा नहीं दी। कभी भी किसी को सिख धर्म अपनाने के लिए जोर नहीं किया। 

तख्त सिंह पटना साहिब और तख्त सिंह हजूर साहिब का निर्माण कराया। अमृतसर के हरमंदिर साहिब गुरुद्वारे में संगमरमर और सोना मढ़वाया, तभी से उसे स्वर्ण मंदिर कहा जाने लगा। वहीं साल 1835 में काशी के विश्वनाथ मंदिर के दो शिखरों पर 22 टन सोना लगवाया।

महाराजा से उनकी जनता बहुत प्यार करती थी। रणजीत सिंह ने 20 शादियां कीं। उनकी पत्नियों में पांच सिख, तीन हिंदू और दो मुस्लिम महिलाएं थीं। वहीं बाकी 10 शादियां चादर रस्म से की थीं।

एक दिन रणजीत सिंह का दिल एक 13 साल की नाचने वाली मुस्लिम लड़की मोहरान पर आ गया और उन्होंने उससे शादी करने का फैसला किया।

सरबप्रीत सिंह अपनी किताब 'द कैमल मर्चेंट ऑफ फिलाडेल्फिया' में लिखते हैं, ‘उस नाचने वाली लड़की के परिवार में प्रथा थी कि होने वाले दामाद को तभी स्वीकार किया जाता था जब वो अपने ससुर के घर में चूल्हा जलाए।’

‘मोहरान के पिता अपनी बेटी की शादी रणजीत सिंह से नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने ये शर्त रख दी। लेकिन रणजीत सिंह मोहरान के प्यार में इस हद तक डूब चुके थे कि उन्होंने ये बात मान ली। इस बात का कई लोगों ने विरोध किया। महाराजा को अकाल तख्त के सामने पेश होने के लिए कहा गया। रणजीत सिंह ने माना उनसे गलती हुई है उन्होंने माफी मांगी। फिर भी सौ कोड़े मारने की सजा सुनाई गई। उनके कपड़े उतार कर एक पेड़ से बांध दिया गया।’

तभी अकाल तख्त के जत्थेदार फूला सिंह ने ऐलान किया कि महाराजा ने अपनी गलती मान ली है। वे महाराजा हैं और सम्मान के हकदार हैं, इसलिए इस सजा को सौ कोड़ों से घटा कर सिर्फ एक कोड़ा किया जाता है। फिर फिर फूलों का कोड़ा तैयार किया गया और सजा को पूरा किया गया। बाद में रणजीत सिंह ने मोहरान के लिए एक मस्जिद बनवाई जिसे आज मस्जिद-ए-मोहरान के नाम से जाना जाता है।

रणजीत सिंह ने कई शक्तिशाली दुश्मनों को हराकर अपना साम्राज्य बनाया था। 1802 में अमृतसर को अपने साम्राज्य में मिला लिया और 1807 में अफगानी शासक कुतुबुद्दीन को हराकर कसूर पर कब्जा किया। 1818 में मुल्तान और 1819 में कश्मीर पर कब्जा कर उसे भी सिख साम्राज्य का हिस्सा बन गया।

अफगानों और सिखों के बीच 1813 से 1837 के बीच कई युद्ध हुए। उन्हें पश्चिमी पंजाब की ओर खदेड़ दिया। अब पेशावर समेत पश्तून क्षेत्र पर महाराजा रणजीत सिंह का कब्जा था। उन्होंने "सिख खालसा सेना" गठित की और पंजाब अब बहुत शक्तिशाली सूबा था। इसी ताकतवर सेना ने लंबे अर्से तक ब्रिटेन को पंजाब हड़पने से रोके रखा। एक ऐसा मौका भी आया जब पंजाब ही एकमात्र ऐसा सूबा था, जिस पर अंग्रेजों का कब्जा नहीं था।

एक बार एक अफगान शासक शाह शुजा की पत्नी ने महाराजा से आग्रह किया। अगर महाराजा शाह शुजा की रक्षा करेंगे और उनको लाहौर सुरक्षित ले आएंगे तो वो उनको कोहएनूर हीरा देंगी। महाराजा ने वादा पूरा किया तो 1 जून, 1813 को शाह शुजा की पत्नी ने उनको कोहिनूर गिफ्ट किया। ये हीरा उनके खजाने की शान बना।

दशकों तक शासन के बाद 27 जून 1839 को महाराजा रणजीत सिंह ने अंतिम सांस ली।

भारत में तब सती प्रथा पर प्रतिबंध लगे 10 साल बीत चुके थे और सिख धर्म में सती प्रथा को कोई मान्यता नहीं दी गई है फिर भी उनकी चार महारानियों के साथ सात गुलाम लड़कियों ने ऐलान किया कि वो उनके साथ सती होंगी। इसका वर्णन करते हुए सरब प्रीत सिंह अपनी में लिखते हैं कि महारानी महताब देवी जो गुड्डन के नाम से भी मशहूर थीं, नंगे पैर हरम से बाहर निकलीं। पहली बार उन्होंने किसी सार्वजनिक जगह पर पर्दा नहीं किया हुआ था। उनके साथ तीन रानियां जो धीमे-धीमे चल रही थीं। उनके कुछ आगे एक व्यक्ति उनकी तरफ मुंह उलटा कर चल रहा था। उसके हाथ में एक आइना था ताकि रानी उसमें अपना चेहरा देख कर ये इत्मिनान कर सकें कि सती होते समय उनके चेहरे पर कोई खौफ नहीं था। चिता पर रानियां महाराजा के सिरहाने बैठ गईं जबकि गुलाम लड़कियां उनके पैर की तरफ बैठीं।’

जैसी ही उनके बेटे खड़क सिंह ने उनकी चिता में आग लगाई, महाराजा रणजीत सिंह को 180 तोपों की अंतिम सलामी दी गई। दो दिनों बाद जब उनकी अस्थियां लाहौर की सड़कों से गुजरीं, सारे लोग सड़कों पर उमड़ पड़े। तो कुछ लोगों ने अपने घरों की छतों पर खड़े होकर ऊपर फूल बरसाए।

महाराजा के निधन के साम्राज्य की बागडोर खड़क सिंह के हाथ आई। लेकिन वे रणजीत सिंह के मजबूत सिख साम्राज्य को संभालने में नाकाम रहे। सिख और अंग्रेजों के बीच हुए साल 1845 के युद्ध के बाद महान सिख साम्राज्य पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया। साल 2019 में बीबीसी वर्ल्ड हिस्ट्री मैगजीन के एक सर्वे में महाराजा रणजीत सिंह को दुनिया का सर्वकालिक महानतम नेता चुना गया।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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