Maharishi Mahesh Yogi : खुश रहने वाला सिखाया योग

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महर्षि महेश योगी (Maharishi Mahesh Yogi)। भारतीय योग साधना को दुनियाभर में फैलाया। उनकी ख्याति देश से लेकर अमेरिका और यूरोप तक फैली।

जब ब्राह्मण न होने की वजह से नहीं मिली गद्दी

साल 1953, शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती ने संसार त्यागा। उनकी वसीयत में लिखा था कि 'मैं अपनी गद्दी अपने शिष्य महेश योगी को देना चाहता हूं।' लेकिन, काशी विद्वत परिषद का कहना था कि 'इस गद्दी पर सिर्फ एक ब्राह्मण का ही अधिकार हो सकता है। जन्म से कायस्थ होने की वजह से महेश योगी गद्दी पर नहीं बैठ सके।'

दुनियाभर में भारतीय योग साधना को फैलाया 

क्योंकि महेश योगी की जिंदगी राह अलग थी। वो महर्षि महेश योगी बने। भारतीय योग साधना को दुनियाभर में फैलाया। उनकी ख्याति देश से लेकर अमेरिका और यूरोप तक फैली। हजारों शिष्यों में से एक पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी थीॆ। ऐसा कहा जाता है कि इनके पास ध्यान साधना की खास तकनीक थी। वो दावा करते थे कि योग के माध्यम से उड़ा भी जा सकता है। गुजरते वक्त के साथ इनका इतना प्रभाव हो गया कि इन्होंने अपनी एक अलग करेंसी भी चलवाई जिसका नाम भगवान श्री राम के नाम पर 'राम' रखा गया था।

जन्म स्थान और नाम को लेकर विवाद

12 जनवरी, साल 1917 जन्मे महर्षि महेश योगी का मूल नाम महेश श्रीवास्तव था। वो कायस्थ समाज के थे, इस पर लोग एक मत नहीं हैं। ऐसा कहा जाता है कि उनका एक नाम - महेश प्रसाद वर्मा भी था। जन्म स्थान को लेकर भी दो बातें हैं। एक वर्ग उन्हें छत्तीसगढ़ के राजिम शहर का तो दूसरा मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर का मानता है।

जब अध्याम की ओर चल निकले कदम 

महर्षि योगी के पिताजी राजस्व विभाग में थे। तबादला जबलपुर हुआ तो वो अपने परिवार को भी साथ लाए। यही पर महर्षि महेश योगी बचपन से बड़े हुए। शुरुआती पढ़ाई करने के बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीएससी और फिलॉसफी से एमए किया। रोजी रोटी चलाने के लिए छोटी-मोटी नौकरी की। लेकिन, एक दिन जिंदगी से इनका मोह भंग हो गया और इनके कदम अध्याम की ओर चल पड़े।

ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन से सिखाते खुश रहने का तरीका

एक दिन उन्होंने शंकराचार्य स्वामी ब्रम्हानंद सरस्वती के प्रवचन सुने। जिनसे वो प्रभावित हुए। उनके मन में वैराग्य जाग्रत हो गया। स्वामी ब्रम्हानंद सरस्वती को गुरु बनाकर आध्यात्मिक शिक्षा ली। दुनिया भर में घूमे। इस दौरान उन्होंने योग और ध्यान के माध्यम से पूरे विश्व में वैदिक संस्कृति का परिचय दिया। इसके बाद विश्व के नामचीन लोग उनसे बेहतर स्वास्थ्य और आध्यात्मिक ज्ञान सीखने लगे। वो लोगों को ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन सिखाते थे, ताकि लोग अपने अंदर झांक सकें। ताकि लोग अपनी खुशी को महसूस कर सकें और अपने हर पल का आनंद उठा सकें।

शिष्यों को 'उड़ना सिखानेका किया दावा 

महर्षि महेश योगी की चर्चा दुनियाभर में होने लगी। उनके शिष्यों में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी शामिल थीं। विदेशों से लेकर भारत में भी उनके शिक्षण संस्थान चलते। वो तब सुर्खियों में और आए जब जब उन्होंने अपने शिष्यों को 'उड़ना सिखाने' का दावा किया था। इस योग में उनके भक्त फुदकते हुए उड़ने की कोशिश करते थे।

'राम' नाम की मुद्रा चलवाई

महर्षि महेश योगी का प्रभाव इतना बढ़ गया कि उन्होंने राम नाम की एक नई मुद्रा भी चलन में ला दी थी, जो यूरोप के कुछ हिस्सों में आज भी चलन में हैं। नीदरलैंड्स ने साल 2003 में इसे कानूनी मान्यता दी थी। राम नाम की इस मुद्रा में चमकदार रंगों वाले एक, पांच और दस के नोट थे। इस मुद्रा को महर्षि की संस्था ग्लोबल कंट्री वर्ल्ड पीस ने साल 2002 के अक्टूबर में जारी किया था। नीदरलैंड्स के कुछ शहरों और गांवों की दुकानों पर ये नोट चलने लगे थे। 05 फरवरी, साल 2008 91 साल की उम्र में महर्षि महेश योगी का नीदरलैंड उनके घर में निधन हो गया।

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं।

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