स्पेस वॉर की तैयारी कर रहे हैं कई देश, एंटी सैटेलाइट वेपन्स की बढ़ा रहे ताकत

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स्पेस वॉर अब कोरी कल्पना नहीं रहा गया। फिल्मी पर्दे पर दिखने वाली ये जंग अब हकीकत के करीब पहुंच चुकी है। अमेरिका, रूस, चीन और भारत जैसे बड़े देशों के स्पेस वेपन बना चुके हैं। तो कुछ देश बनाने की कोशिश में हैं। आइए जानते हैं क्या होते हैं स्पेस वेपन और भारत को ऐसे वेपन की कितनी है जरूरत। भविष्य में सेनाएं भले ही आमने सामने ना हों, लेकिन युद्ध का तरीका पूरी तरह से बदल जाएगा। आने वाले समय में स्पेस वॉर इसका अहम हिस्सा होगा..इसी को लेकर इंडियन एयरफोर्स के चीफ मार्शल वी आर चौधरी ने कहा कि इंडियन एयर फोर्स को ‘एयर पावर’ से ‘एयरोस्पेस पावर’ की दिशा में बढ़ना होगा। 

स्पेस वेपन स्पेस वॉर में इस्तेमाल होने वाले हथियार हैं। जो स्पेस में सैटेलाइट या स्पेस स्टेशन पर हमला कर सकते हैं। इनमें सबसे मेन एंटी सैटेलाइट वैपन शामिल हैं। कुछ हथियार ऐसे भी होते हैं, जो अंतरिक्ष से पृथ्वी पर हमला कर सकते हैं या अंतरिक्ष से गुजरने वाली मिसाइलों को डिस्ट्रॉय  कर सकते हैं। इन्हें ही स्पेस वेपन कहा जाता है। 

एंटी-सेटेलाइट हथियार दो तरह से बांटा जा सकता है। काइनेटिक और नान काइनेटिक हथियार, काइनेटिक हथियार एंटी सेटेलाइट हथियार भी कहते हैं जो काइनेटिक ऊर्जा का उपयोग कर दुश्मन की सेटेलाइट को खत्म कर देते है। नान-काइनेटिक हथियार इसमें किसी तरह की मिसाइल, राकेट या ड्रोन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है, बल्कि साइबर अटैक किया जाता है।  सेटेलाइट को लेजर के जरिए बेकार किया जाता है।  ऐसे हमले हवा, धरती की लोवर ऑर्बिट या फिर जमीन से भी किया जा सकता है।

अगर भारत की बात करें साल 2019 में भारत ने अपनी एंट्री सेटेलाइट मिसाइल का सफल टेस्ट किया। भारत के पास एंटी-सैटेलाइट मिसाइल के लिए पृथ्वी एयर डिफेंस (पैड) सिस्टम है। इसे प्रद्युम्न बैलिस्टिक मिसाइइल इंटरसेप्टर भी कहते हैं। ये एक्सो-एटमॉसफियरिक (पृथ्वी के वातावरण से बाहर) और एंडो-एटमॉसफियरिक (पृथ्वी के वातावरण से अंदर) के टारगेट पर हमला करने में सक्षम हैं। पहले से मौजूद पैड सिस्टम को अपग्रेड कर तीन स्टेज वाला इंटरसेप्टर मिसाइल बनाया गया फिर मिशन शक्ति के परीक्षण में उसी मिसाइल का इस्तेमाल किया गया।

भारतीय ASAT मिसाइल की रेंज 2000 किमी है। ये 1470 से 6126 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से सैटेलाइट की तरफ बढ़ती है। हालांकि, बाद में इसे अपग्रेड कर ज्यादा ताकतवर और घातक बनाया जा सकता है। डीआरडीओ ने बैलिस्टिक इंटरसेप्टर मिसाइल के जरिए 300 किमी की ऊंचाई पर मौजूद उपग्रह को मार गिराया। 

सबसे ज्यादा स्पेश वेपन, अमेरिका, रूस और चीन के पास हैं..शीत युद्ध के दौरान रूस ने दुनिया के पहले सैटेलाइट स्पुतनिक का टेस्ट साल 1957 में किया था। हालांकि रूस ने सैटेलाइट परीक्षण से पहले 1956 में ही उसकी सुरक्षा के लिए काम शुरू कर दिया था। इसे एंटी सैटेलाइट वेपन कार्यक्रम ओकेबी-1 नाम दिया गया था। जिसका सफल टेस्ट साल 1970 में हुआ। इस मिशन में रूस ने कुल 23 टेस्ट किए इसके बाद अमेरिका और फिर चीन ने 2007 में एंटी सैटेलाइट मिसाइल टेस्ट किया। 

अब सवाल उठता है कि आखिर स्पेस वॉर होता है तो इसके दुनिया पर क्या असर पड़ेगा। बता दें कि लो अर्थ ऑर्बिट में बड़ी संख्या में सैटेलाइट मौजूद हैं। अगर इन सैटेलाइट पर हमला होता है तो कई तरह की दिक्कत हो सकती है. नेवीगेशन सेटैलाइट पर अटैक तो मोबाइल की जियो लोकेशंस खत्म हो जाएंगी। नॉर्मल पैसेंजर फ्लाइट्स पर भी असर पड़ेगा और माना जा रहा है कि इससे हाईस्पीड रेल नेटवर्क भी जाम होने की आशंका बढ़ जाएगी। इसी तरह स्पेस वॉर से काफी असर हो जाएगा।

 

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