Mayawati ने Akash Anand को घोषित किया उत्तराधिकारी, परिवारवाद की लगी BSP पर भी मुहर !

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'जब भी मैं अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करूंगींवो मेरे भाई-बहनों या रिश्तेदारों के बीच से नहीं होगामेरा उत्तराधिकारी सबसे उत्पीड़ित अनुसूचित जातिमेरी जाति से होगा. वो मुझसे 30-35 साल छोटे होंगे ताकि वो अपने नेतृत्व में इस आंदोलन को लंबे समय तक आगे बढ़ा सकें'

15 साल पहले 15 जनवरी 2008 को रिलीज हुई ब्लू बुक में मायावती ने ये खुद लिखा था. ये उनकी अपनी आत्मकथा के तीसरे खंड 'मेरे संघर्षमय जीवन का सफरनामा' में लिखा हुआ है. हालांकि जैसे-जैस समय बदला वैसै-वैसे ख्याल भी बदल गए. मायावती जो परिवावादभाई-भतीजावाद को लेकर हमेशा विरोधियों से मुखर रहती थी वो खुद अब परिवारवाद के जाल में जकड़ चुकी है. दरअसल मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है. लेकिन यूपी-उत्तराखंड का प्रभार ख़ुद अपने पास रखा है. 

भतीजे आकाश को सौंपी मायावती ने विरासत

लंदन से MBA कर लौटे 28 साल के आकाश आनंद की राजनीतिक शुरुआत तब हुई जब उन्हें दलित-ठाकुर संघर्ष के बाद सहारनपुर दौरे पर मायावती के साथ देखा गया था. आकाश और पिता आनंद को 2017 में मेरठ में एक रैली के दौरान मायावती ने बसपा कार्यकर्ताओं से मिलवाया था. मायावती जो एक वक्त सोशल मीडिया से दूरी बनाकर रखती थी उनके सोशल मीडिया पर एक्टिव होने का श्रेय भी आकाश आनंद को जाता है क्योंकि आकाश ने ही मायावती के ट्विटर को लॉन्च किया था और वो बसपा-सपा के बाद 2019 में लोकसभा चुनावों के दौरान नजर आए. इस बीच तीन राज्यों में भी आकाश आनंद पार्टी की बैठकोंयात्राओं और रैलियों में एक्टिव दिखेलेकिन अब उनको उत्तराधिकारी बनाने पर मायावती पर सवाल उठने लगे है. सियासी जानकारों का कहना है एक तो परिवारवाद को मायावती ने बढ़ावा दिया तो वहीं अपने सबसे खास नेता सतीश चंद्र मिश्रा को लोकसभा चुनाव से पहले साइडलाइन करने से पार्टी को नुकसान हो सकता है.

2024 के लोकसभा चुनाव में दिखेगा असर

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो मायावती ने भी 28 साल की उम्र में पहला चुनाव लड़ा थामगर उनके हिस्से हार आई वहीं, 1995 में जन्मे उनके भतीजे आकाश आनंद भी इस समय 28 साल के हैं. सियासी जानकारों का मानना है कि मायावती की पार्टी की लगातार राजनीतिक महकमे में घटती सक्रियता को लेकर ये फैसला लिया गया है. अब आकाश आनंद जैसे युवा चेहरे के पीछे खड़े होकर मायावती एक बार फिर बसपा को बहुजन समाज के बीच स्थापित करने की मंशा दिखाई है. साथ ही 2024 चुनाव से पहले जो दांव खेला है उसका असर 24 में देखने को मिलता है या नहीं ये तो वक्त बतााएगा. लेकिन हाल फिलहाल हुए 5 राज्यों में जिस तरह बसपा को मजबूत किया उसका तोहफा मायावती ने दे दिया है. अब ऐसी चर्चा है कि अब आकाश आनंद 28 साल की उम्र में ही अपने जीवन का पहला लोकसभा लड़ सकते हैं. अब देखना ये दिलचस्प रहेगा कि मायावती के भतीजे 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ते हैं या नहीं? लेकिन मायावती पर जो दाग अभीतक परिवावाद का नहीं लगा था वो अब लग गया है. अब ये कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि देश की सभी सियासी पार्टियां परिवारवाद से घिरी हुई है. उत्तर से लेकर दक्षिण तक की राजनीति में तेजी से परिवारवाद बढ़ता जा रहा है. कांग्रेस पर वंशवाद का सवाल खड़ी करने वाली बीजेपी भी अछूती नहीं है.

परिवारवाद का लगा मायावती की पार्टी पर दाग

पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक राजनीति में परिवारवाद लोकतंत्र को खोखला कर रहा है. ऐसे में ये भी जानते है कि आखिर परिवारवाद किस दल में किस हद तक जमा बैठा है. सबसे पहले बात करते है देश के सबसे बड़े सियासी कुनबे की. दरअसल देश में सबसे बड़ा सियासी कुनबा मुलायम सिंह यादव का हैमुलायम परिवार के करीब दो दर्जन से ज्यादा लोग राजनीति में एक्टिव है. यहां तक की सांसद से लेकर पंचायत तक में काबिज हैं. नेता जी के बेटे अखिलेश यादव UP के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और फिलहाल पार्टी के अध्यक्ष हैं. सपा के साथ-साथ राष्ट्रीय लोक दल भी इसका नमूना हैं.

UP में मुलायम तो बिहार में लालू के परिवार का दबदबा

वहीं बिहार की सियासत में लालू प्रसाद यादव का सबसे बड़ा राजनीतिक कुनबा है. लालू की पार्टी में उनकी पत्नी राबड़ी देवी उनके जेल जाने के बाद मुख्यमंत्री रहीं थीबेटी भी राज्यसभा सांसद रही है. इसके अलावा लालू के दोनों बेटे तेज प्रताप यादव मंत्री और तो तेजस्वी यादव नीतीश के नेतृत्व वाली सरकार में डिप्टी CM है. इसी तरह रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा में भी है. पासवान के बेटे चिराग पासवान भी राजनीति में 2014 में उतरे और सांसद बने.

ठाकरे परिवार नहीं परिवारवाद से अछूता

इसके साथ ही महाराष्ट्र की सियासत में बीजेपी की सहयोगी रह चुकी शिवसेना में पूरी तरह से परिवारवाद का कब्जा है. बालासाहेब ठाकरे ने ये पार्टी बनाई और अपने बेटे उद्धव ठाकरे को राजनीतिक विरासत सौंपी. उद्धव ने अपने बेटे आदित्य को युवा विंग की कमान सौंप दी.

पंजाब में बादल परिवार का रसूख

हरियाणा पंजाब की भी कुछ ऐसा ही है. पंजाब में सियासी घराने ही राजनीति में अहम भूमिका अदा करते रहे हैं. अकाली दल की कमान जहां बादल परिवार के हाथों में हैइसके साथ बलराम जाखड़ और मजीठिया तक के परिवार राज्य की सियासत में दखल रखते है. जबकि हरियाणा में भी परिवारवाद किसी से अछूता नहीं हैदेवी लालबंसी लाल और भजन लाल का कभी हरियाणा की राजनीति पर दबदबा हुआ करता था. ये तीनों नेता अब नहीं रहेलेकिन प्रदेश की राजनीति पर उनके परिवारों का असर बना हुआ है.  

घाटी में अब्दुल्ला और मुफ़्ती परिवार का वंशवाद

जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला का परिवार और मुफ़्ती परिवार का वंशवाद तो इस क़दर बढ़ा कि पिता-पुत्र और बाप-बेटी ही कई बार एक-दूसरे के आड़े आए. दोनों प्रमुख पार्टियां वंशवाद से ग्रसित हैं. जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार की नेशनल कॉन्फ्रेंस की तीसरी पीढ़ी उमर अब्दुला के हाथों में पार्टी की कमान है. उनके पिता फारुक अब्दुला सांसद हैं. इस तरह मुफ्ती मुहम्मद सईद की पार्टी पीडीपी की कमान उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती के हाथों में है. उत्तर भारत में तो परिवारवाद देखने को मिलता ही है इसके साथ ही  दक्षिण भारत की राजनीति में परिवारवाद हावी है. दक्षिण भारत की पार्टियों में भी परिवारवाद की जड़ें काफी गहरी हैं. तमिलनाडु की महत्वपूर्ण पार्टी डीएमके जिसे करुणानिधि ने स्थापित किया है. करुणानिधि के परिवार के लोग डीएमके पर पूरी तरह से काबिज हैं. मौजूदा समय में डीएमके की कमान करुणानिधि के बेटे स्टालिन के हाथों में है. इसके साथ ही उदयनिधि स्टालिन के बेटे हैं. वर्तमान में वो चेपॉक-थिरुवल्लिकेनी विधानसभा से विधायक हैं. राजनीति में आने के बाद से उन्हें रायजिंग सन कहा जा रहा है क्योंकि वो स्टालिन परिवार की तीसरी पीढ़ी के नेता हैं.

कांग्रेस पार्टी में सबसे ज्यादा परिवारवाद


राहुल गांधी नेहरू-गांधी परिवार की 5वीं पीढ़ी से हैं. राहुल के परनाना जवाहर लाल नेहरू से लेकर दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी तक देश के प्रधानमंत्री और पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं. राहुल परिवार के छठे शख्स हैंजो कांग्रेस को संभाल रहे है. मौजूदा दौर में राहुल की मां सोनिया गांधी जहां कांग्रेस से सांसद हैं तो वहीं चाची मेनका गांधी और चचेरे भाई वरुण गांधी बीजेपी से सांसद हैं. जबकि प्रियंका गांधी पार्टी से महासचिव पद पर है. इतना ही नहीं कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के बच्चे भी राजनीति में दखल रखते है. जैसे कमलनाथ के बेटे नकुलनाथदिग्विजय सिंह के बेटे जयंत सिंह. समेत तमाम कई नेता है. जिसके चलते कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगता है.

बीजेपी के दिग्गज नेता नहीं परिवारवाद से अछूते

राष्ट्रीय दल बीजेपी भी अब परिवारवाद से अछूती नहीं है. उनके यहां भी दिग्गज नेताओं के बेटा-बेटी-बहू ही राजनीति में हावी हैं. कहा जाता है कि पार्टी विद द डिफरेंस के टैगलाइन के साथ जब बीजेपी ने अपना राजनीतिक सफर शुरू कियातभी से परिवारवाद और जातिवाद का विरोध पार्टी के एजेंडे में शामिल हो गया. अटल-आडवाणी युग के बाद 2000 के बाद जब पार्टी में नई पीढी आईतो बीजेपी पर भी वंशवाद के आरोप लगे. कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल वसुंधरा राजेदुष्यंत सिंहराजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंहकल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंहप्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन और हुकुमदेव नारायण के बेटे अशोक यादव और अनुराग ठाकुर के नाम गिनवाने से नहीं चूकते. पार्टी के बाहर भी बीजेपी खुद परिवारवादी पार्टी से चुनावी समझौतों में कभी नहीं हिचकी. देखा जाए तो बीजेपी की सियासत में लंबी चौड़ी फौज परिवारवाद से आई है. विजयाराजे सिंधिया की एक बेटी वसुंधरा राजे सिंधिया राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं तो उनकी दूसरी बहन यशोधरा राजे सिंधिया शिवराज सिंह चौहान की कैबिनेट में मंत्री रही है. जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मोदी कैबिनेट केंद्रीय मंत्री है. देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह नोएडा से बीजेपी विधायक हैं. हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पीके धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर बीजेपी से सांसद हैं. दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा पश्चिमी दिल्ली से सांसद हैं.

अब मायावती ने जिस तरह से आकाश आनंद को उत्तराधिकारी घोषित किया है उसके बाद से ये साफ हो गया है कि अब हर दल कहीं ना कहीं परिवारवाद की राजनीति से जरूर घिरा हुआ है. इस स्टोरी को तैयार किया हमारे मंचकार साथी ऋषभ ने. आपकी इस पर क्या राय है कमेंट्स करके जरूर बताएं और वीडियो को लाइक और शेयर जरूर करें

 

 

कानपुर का हूं, 8 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं, पॉलिटिक्स एनालिसिस पर ज्यादा फोकस करता हूं, बेहतर कल की उम्मीद में खुद की तलाश करता हूं.

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