जापानी तकनीक से भारत में बसा रहे हैं मियावाकी जंगल

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विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर हम कानपुर शहर के अर्बन जंगल में मौजूद हैं। ये खास तरह का जंगल है, जो कि शहर के बीचोबीच है। इस जंगल को मियावाकी जंगल की पद्धति पर बनाया गया है। जिसकी खोज जापान के अकीरा मियावाकी ने की थी। तो आइए समझते हैं क्या होते हैं मियावाकी जंगल और भारत के शहरों में इस मियावाकी पद्धति से प्रदूषण को कम करने में कितने कारगर साबित हो रहे हैं।  

कानपुर जो कि कभी विश्व का सबसे प्रदूषित शहर माना गया। यहां पर एयर पॉल्यूशन को कंट्रोल करने और ग्रीनरी बढ़ाने के लिए मियावाकी पद्धति से पौधे लगाकर जंगल बनाए जा रहे हैं। ऐसा ही एक जंगल कानपुर के विजय नगर में चिल्ड्रेन पार्क की 2 हेक्टेअर जमीन में करीब 1.80 लाख पौधे लगाकर तैयार किया गया है, यूपी की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने इस जंगल का लोकार्पण किया। इस जंगल को डवलेप करने वाले कानपुर नगर निगम के अधिकारियों का दावा है कि इस अर्बन जंगल की वजह से इस क्षेत्र में पॉल्यूशन का स्तर तो कम हो ही रहा है बल्कि ऑक्सीजन की मात्रा भी बढ़ रही है। इस अर्बन जंगल में जामुन, नाशपाती, शहतूत, करौंदा, मेहंदी, तुलसी, अर्जुन, शीशम, गूलर, आम, बांस, कनैर, पारस पीपल, अशोक, अमरूद, नींबू, किन्नू, जैसे पेड़ लगाए गए हैं।

क्या है मियावाकी पद्धति?

मियावाकी जंगल की खोज जापान के अकीरा मियावाकी ने की थी। मियावाकी की तकनीक के पीछे एक अनुभव था, जिसमें उन्होंने पाया कि जापान में सिर्फ .06 फीसदी ही ऐसे पेड़ हैं, जिन्हें कुदरती कहा जा सकता है। इसके अलावा अलग से उगाए गए जंगल में ऐसे पेड़ पौधे हैं, जो वहां की मिट्टी और वातावरण के अनुकूल नहीं होते हैं। इसी आधार पर बनी मियावाकी तकनीक है। इन जंगलों को विशेष तरीके से उगाया जाता है, ताकि इन्हें लंबे समय तक हरा-भरा रखा जा सके। मियावाकी जंगल की खासियत है की ये कम समय में अधिक हरियाली फ़ैलाते हैं और इनसे निकलने वाली ऑक्सीजन की मात्रा भी ज्यादा होती है। मियावाकी जंगल की तकनीक से केवल 2-3 सालों में ही एक घना जंगल बनाया जा सकता है, जबकि सामान्य तौर पर एक घना जंगल तैयार करने में 20-30 साल का समय लगता है।

तेजी से जंगल उगाने की तकनीक

इस जापानी मियावाकी पद्धति से बने जंगल में बहुत कम दूरी पर पौधे लगाए जाते हैं। इससे पौधे सूर्य की रोशनी पाकर ऊपर की ओर बढ़ते रहते हैं। इसमें तीन प्रजातियों के पौधे लगाए जाते हैं, जिनकी ऊंचाई पेड़ बनने पर अलग-अलग होती है। इसमें एक पेड़ ऊंचाई वाला, दूसरा कम ऊंचाई वाला और तीसरा घनी छायादार पौधा चुना जाता है। मियावाकी जंगल के लिये जरूरी है कि जिस जमीन पर पौधे लगाए जा रहे हैं, वहां के वातावरण के अनुकूल ही पौधे लगाये जाएं, जिससे ये जल्दी हरे-भरे हो जाएंगे, जितनी कम जगह होगी, उतने ही ज्यादा पेड़ उगेंगे और उतनी ही तेजी से बढ़ेंगे।  

शहरों की कम पड़ती जमीन में इस तरह के अर्बन जंगल एयर पॉल्यूशन को कम करने में बेहद कारगर साबित हो सकते हैं। आज प्रदूषण की वजह से मानव जीवन खतरे में पड़ गया है। प्रकृति से मिलकर चलने और सुरक्षित रखने की जरूरत है। इसलिए ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाकर हम मानव के अस्तित्व को बचा सकते हैं।

 

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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