Lok Sabha Elections 2024 : कैसे सियासी दलों का गणित बनाते-बिगाड़ते हैं मुस्लिम वोटर्स ?

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बस कुछ महीने और... फिर देश में नई लोकसभा का गठन हो जाएगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में अब जब ज्यादा वक्त नहीं रह गया है। ऐसे में चुनावी मौसम आते ही हर गली-मोहल्ले में ये चर्चा तेज हो गई है कि इस बार कौन किसको वोट देगा और क्यों? बता दें देश में कम से कम 101 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर्स जीत-हार में प्रभावी हो सकते हैं, लेकिन क्या वो एकमुश्त वोट करते हैं? अभी तक के चुनावों में उन्होंने क्या किया है? हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े वरिष्ठ शोधकर्ता फेवाद अली ने इसे लेकर एक रिपोर्ट जारी की है। उस रिपोर्ट के बारे में भी जानेंगे साथ ही 2024 के लोकसभा चुनाव में देश की सियासत में मुसिलमों की भागीदारी कितनी अहम होने वाली है। इस पर भी बात करते हैं।  

2019 के आम चुनाव में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के बाद से रीसर्चर ने मुसलमानों के वोट का करीब से स्टडी की है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि विधानसभा चुनावों में मुसलमानों ने बड़े पैमाने पर बीजेपी के खिलाफ उन पार्टियों के पक्ष में वोट दिया, जो बीजेपी को चुनौती दे सकती हैं। हालांकि, इस स्टडी के कई पहलू भी हैं। मुस्लिम वोटों के इस ध्रुवीकरण के साथ-साथ मुस्लिम आबादी के बीच कई सामाजिक और राजनीतिक भेद एक साथ सामने आए हैं। जैसे मुस्लिम समाज में मौजूद कई जातियां अब मुख्यधारा की राजनीतिक चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बन गई हैं। आगामी चुनाव को देखते हुए इस समाज के लोग किसे वोट देंगे ये सवाल गंभीर होता जा रहा है। क्या एकमुश्त मुस्लिम वोट के विचार को खारिज कर दिया जाना चाहिए? गौर करने वाली बात है कि लोकप्रिय चुनाव विश्लेषणों में मुसलमानों को अक्सर एक सजातीय मतदान समूह के रूप में माना जाता है। हालांकि, मुसलमान शायद ही कभी मिलकर एक साथ मतदान करते हों। दरअसल, हिंदुओं की तरह मुसलमान भी कई वर्ग, संप्रदाय, जाति और क्षेत्रीय आधार पर बंटे हुए हैं।

BJP की मुस्लिम वोटर्स को साधने की कोशिश

हालांकि साल 2019 से पहले भी मुस्लिम वोटिंग काफी हद तक विभाजित थी, पहले भी किसी एक राजनीतिक दल के पीछे जाने के साफ संकेत नहीं थे, लेकिन खासकर 2019 में बीजेपी की जीत के बाद मुस्लिम वोटिंग का मुद्दा और ज्यादा जटिल हो गया है। राजनीतिक विशेषज्ञ आम तौर पर वोटों के बंटवारे की सटीक जांच के लिए हेरफिंडाहल-हिर्शमैन इंडेक्स (HHI) नाम के माध्यम का इस्तेमाल करते हैं। इस इंडेक्स पर शून्य के करीब स्कोर का मतलब है कि सभी मुसलमानों ने अलग-अलग पार्टियों को वोट दिया, जबकि 1 का स्कोर एक ही पार्टी को दिए गए समर्थन को दर्शाता है। 2019 के आम चुनावों में हिंदू बहुसंख्यकवाद बढ़ने के बावजूद मुस्लिम वोटों के बंटने का पता चलता है। इसके अलावा, राज्यों के बीच भी काफी भिन्नता है। पार्टियों और गठबंधनों के हिसाब से भी मुस्लिम वोटों का बंटवारा भी जगजाहिर है।

कहीं गेम बदला, कहीं बिगाड़ा खेल...

तुलनात्मक रूप से 2019 के आम चुनावों के बाद से राज्य विधानसभा चुनावों में मुस्लिम वोटिंग की स्टडी दिलचस्प है। CSDS-लोकनीति के सर्वे से पता चलता है कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में करीब 77 प्रतिशत मुसलमानों ने बीजेपी के खिलाफ बने गठबंधन को वोट दिया था। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 75 प्रतिशत मुसलमानों ने तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया था। साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 79 प्रतिशत मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी को वोट दिया था। कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुसलमान किसी राज्य की चुनावी स्थिति या किसी व्यक्तिगत उम्मीदवार की संभावनाओं के मुताबिक वोट करते हैं। हालांकि कई राजनीतिक विशेषज्ञ इस पहलू को नजरअंदाज करते हैं।

पसमांदा मुसलमान कौन हैं?

मुस्लिम समुदाय की पहचान तीन श्रेणियों में विभाजित है। अशराफ़, अजलाफ़ और अरज़ाल। अशराफ मुस्लिम आप्रवासियों के स्वयंभू वंशज हैं, जो मानते हैं कि वो मध्य पूर्व और मध्य एशिया से भारतीय उपमहाद्वीप में आए थे। इस समूह में सैय्यद, शेख, मुगल और पठान शामिल हैं। वहीं अजलाफ और अरजाल मुख्य रूप से ऐसे मुसलमानों के समूह हैं जो पहले हिंदू थे। उन्होंने अपना नए मजहब को स्वीकार किया, लेकिन अपनी पुरानी जाति को अपने साथ ले गये। इन समूहों में भी हिंदुओं की तरह कई जातियों का प्रभाव है। 1990 के दशक से, गैर-अशराफ मुसलमानों अजलाफ (ओबीसी) और अरजाल (दलित) मुसलमानों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने मुख्यधारा की राजनीति में अशराफ के प्रभुत्व के खिलाफ लामबंदी होने की अपील की है। ये समूह खुद को सामूहिक रूप से पसमांदा कहते हैं। आज पसमांदा मुस्लिम शब्द का इस्तेमाल ओबीसी और दलित मुसलमानों के लिए किया जाने लगा है। 2006 की सच्चर समिति की रिपोर्ट को अक्सर मुसलमानों और हिंदुओं के बीच शैक्षिक और आर्थिक अंतर को उजागर करने के लिए उद्भुत किया जाता है, लेकिन ये मुस्लिम आबादी के भीतर, खास तौर पर जाति के आधार पर भेद और दूरियों की भी जांच करती है।

 बीजेपी की पहली पसंद पसमांदा मुस्लिम

जहां एक तरफ बीजेपी ने तीन तलाक के खिलाफ कानून लाकर मुस्लिम महिलाओं के वोटों में सेंधमारी का काम किया है। वहीं, साल 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने पसमांदा मुसलमानों पर ज्यादा ध्यान दिया, बीजेपी कार्यकर्ताओं से पसमांदा मुसलमानों तक पहुंचने को कहा गया। प्रधानमंत्री ने पसमांदा मुसलमानों के साथ कई कार्यक्रम आयोजित किए। वैसे बीजेपी ने पहले भी पसमांदा मुसलमानों के लिए काम किया है। मिसाल के लिए, समाजशास्त्री खालिद अनीस अंसारी ने कहा कि 2013 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने कुछ पसमांदा मुसलमानों को शामिल करने के लिए एक बुनकर सेल का गठन किया और 2017 में ओडिशा में पार्टी ने पसमांदा मुसलमानों को ओबीसी के समान लाभ देने की जरूरत बताई थी।

बीजेपी से सावधान रहने की सलाह दी

हालांकि, बीजेपी ने पसमांदा मुसलमानों तक पहुंच जरूर बनाई, लेकिन उसे कोई खास फायदा नहीं मिला। वैसे कई मुस्लिम समूहों ने पसमांदा समुदाय के लोगों को बीजेपी से सतर्क रहने की सलाह भी दी है। अखिल भारतीय पसमांदा मुस्लिम महाज ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी राजनीतिक दल को पसमांदा मुसलमानों का समर्थन हल्के में नहीं लेना चाहिए। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन पार्टी के नेता असदुद्दीन ओवैसी, ने भी बीजेपी की आलोचना की है और तर्क दिया है कि बीजेपी सरकार के दौरान भी पसमांदा मुसलमान कई बार हिंसा का शिकार हुए हैं।  

विपक्ष के वोटबैंक में बीजेपी लगा रही सेंध

आरोपों से परे जमीनी हालात को समझने के लिए 2022 में उत्तर प्रदेश में मुसलमानों और हिंदुओं के बीच एक सर्वे किया गया था। जब 2012 में उत्तर प्रदेश में राज्य चुनावों के बारे में पूछा गया, तो मुस्लिम वोटर्स के एक छोटे प्रतिशत ने बताया कि उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को वोट दिया था। साल 2017 तक 12.6 प्रतिशत सामान्य मुसलमानों और 8 प्रतिशत पसमांदा मुसलमानों ने बीजेपी का समर्थन करने की सूचना दी। दिलचस्प बात ये है कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक सामान्य मुसलमानों के बीच बीजेपी का समर्थन गिरकर 9.8 प्रतिशत हो गया, जबकि पसमांदा मुसलमानों के बीच समर्थन बढ़कर 9.1 प्रतिशत हो गया है।

35 मुस्लिम MLA में से 30 पसमांदा

यूपी में 2022 में जीतकर विधानसभा पहुंचे 35 मुस्लिम विधायकों में 30 पसमांदा हैं। इनमें भी वेस्ट यूपी के ज्यादा हैं। सीएसडीएस लोकनीति सर्वे 2022 में पता चला है कि 8 प्रतिशत पसमांदा मुस्लिमों ने 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को वोट दिया। जिन सीटों पर कम अंतर से जीत मिली, वहां पसमांदा मुस्लिमों की भूमिका अहम रही। आगामी चुनावों में बीजेपी के लिए पसमांदा समर्थन हासिल करना संभव है, लेकिन अगर बीजेपी हिंदू वोट के लिए कोशिश की, तो मुसलमानों के लिए जाति की परवाह किए बिना बीजेपी को वोट देना मुश्किल हो सकता है। खैर, इसमें कोई शक नहीं कि मुसलमानों ने अपने व्यापक हितों को देखना शुरू कर दिया है। 

पिछले 10 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं। वैश्विक और राजनीतिक के साथ-साथ ऐसी खबरें लिखने का शौक है जो व्यक्ति के जीवन पर सीधा असर डाल सकती हैं। वहीं लोगों को ‘ज्ञान’ देने से बचता हूं।

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